कभी अज़ान में, कभी आरती की
आवाज़ में खोजते रहे सुकून।
यादों से भागे फिरते रहे फ़िज़ूल।
पलकों के दहलीज़ पर चमकते रहे
कुछ सितारे और टूट कर बरसते रहे।
इंद्रधनुष के रंग, बेरंग हो गए।
यादों के चराग़ मज़ारों में टिमटिमाते रह गए।

कभी अज़ान में, कभी आरती की
आवाज़ में खोजते रहे सुकून।
यादों से भागे फिरते रहे फ़िज़ूल।
पलकों के दहलीज़ पर चमकते रहे
कुछ सितारे और टूट कर बरसते रहे।
इंद्रधनुष के रंग, बेरंग हो गए।
यादों के चराग़ मज़ारों में टिमटिमाते रह गए।

टूट कर मुहब्बत करो
या मुहब्बत करके टूटो.
यादों और ख़्वाबों के बीच तकरार चलता रहेगा.
रात और दिन का क़रार बिखरता रहेगा.
कभी आँसू कभी मुस्कुराहट का बाज़ार सजता रहेगा.
यह शीशे… काँच की नगरी है.
टूटना – बिखरना, चुभना तो लगा हीं रहेगा.
गुलाबी डूबती शाम.
थोड़ी गरमाहट लिए हवा में
सागर के खारेपन की ख़ुशबू.
सुनहरे पलों की ….
यादों की आती-जाती लहरें.
नीले, उफनते सागर का किनारा.
ललाट पर उभर आए नमकीन पसीने की बूँदें.
आँखों से रिस आए खारे आँसू और
चेहरे पर सर पटकती लहरों के नमकीन छींटे.
सब नमकीन क्यों?
पहले जब हम यहाँ साथ आए थे.
तब हो ऐसा नहीं लगा था .
क्या दिल ग़मगिन होने पर सब
नमकीन…..खारा सा लगता है?
जब जिंदगी से कोई आजाद होता है,
किसी और को यादों की कैद दे जाता है.
सीखना चाह रहे हैं कैद में रहकर आजाद होना।
काँच के चश्मे में कैद आँखों के आँसू ..अश्कों की तरह.
अपने आप को आईने में ढूँढा,
परछाइयों में अक्सों….
चित्रों में खोजा,
लोगों की भीड़ में ,
किसी की आँखों में खोजा,
यादों में, बातों में खोजा,
भूल गई अपने दिल में झाँकना.
कोई रंग नहीं
विचारों, यादों का
पानी की तरह .
ना जाने कहाँ से
कभी काले उदास रंग से और
कभी ख़ुशनुमा सतरंगे रंगो से
रंग जातें है सब .

टेढी -मेढी बल खाती पगङंङी, ऊँची- नीची राहें ,
कभी फूलों कभी कांटों के बीच,
तीखे मोड़ भरे जीवन का यह सफ़र
मीठे -खट्टे अनुभव, यादों,
के साथ
एक अौर साल गुज़र गया
कब …..कैसे ….पता हीं नहीं चला।
कभी खुशबू, कभी आँसू साथ निभाते रहे।
पहेली सी है यह जिंदगी।
अभिनंदन नये साल का !!!
मगंलमय,
नव वर्ष की शुभकानायें !!!!

फिज़ा
में बिखरी खुशबू खिसकती सरकती
ना जाने कब
पास पहुँच कर
गले में बाँहें डाल
अतीत की ओर खीँच ले गई .
किसी के यादों के साये और गुलाबों के बीच ले गई .
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