प्रतिबिंब

ज़िंदगी के अनुभव, दुःख-सुख,

पीड़ा, ख़ुशियाँ व्यर्थ नहीं जातीं हैं.

देखा है हमने.

हाथ के क़लम से कुछ ना भी लिखना हो सफ़ेद काग़ज़ पर.

तब भी,

कभी कभी अनमने हो यूँ हीं पन्ने पर क़लम घसीटते,

बेआकार, बेमतलब सी लकीरें बदल जाती हैं

मन के अंदर से बह निकली स्याही की बूँदों में,

भाव अलंकारों से जड़ी कविता बन.

जिसमें अपना हीं प्रतिबिंब,

अपनी हीं परछाईं झिलमिलाती है.

आज – २२ मार्च, जनता कर्फ़्यू

आज सुबह बॉलकोनी में बैठ कर चिड़ियों की मीठा कलरव सुनाई दिया

आस-पास शोर कोलाहल नहीं.

यह खो जाता था हर दिन हम सब के बनाए शोर में.

आसमान कुछ ज़्यादा नील लगा .

धुआँ-धूल के मटमैलापन से मुक्त .

हवा- फ़िज़ा हल्की और सुहावनी लगी. पेट्रोल-डीज़ल के गंध से आजाद.

दुनिया बड़ी बदली-बदली सहज-सुहावनी, स्वाभाविक लगी.

बड़ी तेज़ी से तरक़्क़ी करने और आगे बढ़ने का बड़ा मोल चुका रहें हैं हम सब,

यह समझ  आया.

लोग

एक नरम मुलायम धूप

हौले हौले चलती कांच के दरवाजे से

गुजर कर पैरों तक आ गई.

गुनगुनी सी धूप सर्द मौसम में

नरम रजाई सी तलवों को ढक कर सुकून देने लगी .

कुछ ही देर में धूप की तेज़ होती गरमाहट चुभने लगी ।

कुछ लोग भी ऐसे होते हैं,

शुरू में नरम और बाद में चुभने वाले।

ज़िंदगी के रंग – 194

ज़िंदगी कट गई भागते दौड़ते.

थोड़ा रुककर कर,

ठहर कर देखा – चहचहातीं चिड़ियों को,

ठंड में रिमझिम बरसती बूँदे,

हवा में घुली गुलाबी ठण्ड……

खुशियाँ तो अपने आस-पास हीं बिखरीं हैं,

नज़रिया और महसूस करने के लिए फ़ुर्सत….

वक़्त चाहिए.

आँधी और दिया

अतीत की  स्मृतियों का बोझ दम घोटने लगता है . अौर उनमें जीने की चाहत भी होती है।

यह कोशिश, कुछ ऐसी बात है जैसे – आँधियाँ भी चलती रहें, और दिया भी जलता रहे..।

कोलाहल में शांति की खोज !

दुनिया की महफ़िलों से सीखने को कोशिश में हैं

दुनियादारी के क़ायदे और

इस दुनिया के शोर शराबे, कोलाहल के बीच,

मन और आत्मा में शांति बनाए रखने की रीत.

कई बातें अक्सर भूल जातें

बहुत सी चीज़ें रख कर अक्सर भूल जातें है.

कई नाम, कई काम अक्सर भूल जातें हैं.

पर जो यादें मायूस करतीं हैं,

वे क्यों याद रहतीं हैं?

जबकि कई बातें अक्सर भूल जातें हैं.

स्याही वाली क़लम

अब स्याही वाली क़लम से लिखना छोड़ दिया है.

कब टपकते  आँसुओं से 

 पन्ने पर पर अक्षर अौ शब्द फैल जाते  हैं।

 कब आँखें धुँधली हो जातीं हैं।  

पता हीं नहीं चलता है।

 

इंतज़ार

कहते हैं, जो कुछ  खोया हैं,

वह वापस आता है।

पर कब तक करें इंतज़ार यह तो बता दो?

Don’t grieve. Anything you lose comes round in another form.

Rumi ❤️

 

दिन

अपना आज का दिन बनाने के लिए अक्सर

गुजरे दिन की शामें याद कर लेते हैं।