अपने अंदर के खालीपन को भरने के लिये
हमने कागज़ पर उकेरे अपने शब्द अौर भाव।
पर धरा का खालीपन कौन भरेगा?
पेङों, घासोँ को काट कागद…कागज़ बनने के बाद?
जीवन है इसलिए परेशनियाँ हैं.
जीवन का अर्थ है सीखना अौर आगे बढ़ना ।
हम सजीव हैं, इसलिए चुनौतियाँ हैं.
बदलते रहते जीवन की चुनौती है हर पल में हौसला बनाये रखना।
हम हैं, क्योंकि अपनों ने हमें ऐसा बनाया.
अतः जीवन सार है अौरों की मदद करना।
दुःख है, इसलिए ख़ुशियों का मोल है.
जीवन का रहस्य है खुश रहना।
प्यार है इसलिए जीवन का अस्तित्व है.
अतः जीवन का सौंदर्य प्रेम है।
जिंदगी में हर रिश्ते एक दूसरे से
मुकाबला,आज़माइशें या
बराबरी करने के लिये नहीं होते हैं।
कुछ रिश्ते एक- दूसरे के हौसले इज़ाफ़ा करने अौर
कमियों को पूरा करने के लिये भी होते हैं।।
तभी ये रिश्तों को दरख्तों के जड़ों की तरह थामे रखते हैं।
जीवन की परीक्षाओं को हँस कर,
चेहरे की मुस्कुराहट के साथ झेलना तो अपनी-अपनी आदत होती है.
जीवन ख़ुशनुमा हो तभी मुस्कुराहट हो,
यह ज़रूरी नहीं.
संगेमरमर से पूछो तराशे जाने का दर्द कैसा होता है.
सुंदर द्वार, चौखटों और झरोखों में बदल गई,
साधारण लकड़ी से पूछो काटे जाने और नक़्क़ाशी का दर्द.
सुंदर-खरे गहनों से पूछो तपन क्या है?
चंदन से पूछो पत्थर पर रगड़े-घिसे जाने की कसक,
कुन्दन से पूछो आग की तपिश और जलन कैसी होती है.
हिना से पूछो पिसे जाने का दर्द.
कठोर पत्थरों से बनी, सांचे में ढली मंदिर की मूर्तियां से पूछो चोट क्या है.
तब समझ आएगा,
तप कर, चोट खा कर हीं निखरे हैं ये सब!
हर चोट जीना सिखाती है हमें.
अौर बार-बार ज़िंदगी परखती है हमें।
शाम के धुँधलके में एक बड़ा चमगादड़,
अपने विशाल पंख फैलाए,
इतराता, उड़ता हुआ ऐसे गुज़रा,
जैसे रातों का राजा हो …..
कहा हमने – बच्चू यहाँ हो इसलिए इतरा रहे हो,
चीन में होते तो सूप के प्याले में मिलते …….
पास के पेड़ पर उलटा लटक कर वह हँसा और बोला-
हम भी कुछ कम तो नहीं.
एक झटके में सारी दुनिया उलट-पलट दी.
अब चमगादड़ का सूप पीनेवालों को
अपनी छोटी-छोटी पैनी आँखों से चिकेन भी चमगादड़ दिखेगा.

ज़िंदगी बङी सख़्त और ईमानदार गुरु है.
अलग-अलग तरीक़े से पाठ पढ़ा कर इम्तिहान लेती है…..
और तब तक लेती है,
जब तक सबक़ सीख ना जाओ.
अभी का परीक्षा कुछ नया है.
रिक्त राहें हैं, पर चलना नहीं हैं.
अपने हैं लेकिन मिलना नहीं है.
पास- पड़ोस से घुलना मिलना नहीं है.
इस बार,
अगर सीखने में ग़लती की तब ज़िंदगी पहले की तरह पाठ दुहराएगी नहीं …
और फिर किसी सबक़ को सीखने की ज़रूरत नहीं रह जाएगी.
कोरोना के टेस्ट में फ़ेल होना हीं पास होना है.
पर किसी के पास-पास नहीं होना है.
ज़िंदगी के अनुभव, दुःख-सुख,
पीड़ा, ख़ुशियाँ व्यर्थ नहीं जातीं हैं.
देखा है हमने.
हाथ के क़लम से कुछ ना भी लिखना हो सफ़ेद काग़ज़ पर.
तब भी,
कभी कभी अनमने हो यूँ हीं पन्ने पर क़लम घसीटते,
बेआकार, बेमतलब सी लकीरें बदल जाती हैं
मन के अंदर से बह निकली स्याही की बूँदों में,
भाव अलंकारों से जड़ी कविता बन.
जिसमें अपना हीं प्रतिबिंब,
अपनी हीं परछाईं झिलमिलाती है.
आज सुबह बॉलकोनी में बैठ कर चिड़ियों की मीठा कलरव सुनाई दिया
आस-पास शोर कोलाहल नहीं.
यह खो जाता था हर दिन हम सब के बनाए शोर में.
आसमान कुछ ज़्यादा नील लगा .
धुआँ-धूल के मटमैलापन से मुक्त .
हवा- फ़िज़ा हल्की और सुहावनी लगी. पेट्रोल-डीज़ल के गंध से आजाद.
दुनिया बड़ी बदली-बदली सहज-सुहावनी, स्वाभाविक लगी.
बड़ी तेज़ी से तरक़्क़ी करने और आगे बढ़ने का बड़ा मोल चुका रहें हैं हम सब,
यह समझ आया.

एक नरम मुलायम धूप
हौले हौले चलती कांच के दरवाजे से
गुजर कर पैरों तक आ गई.
गुनगुनी सी धूप सर्द मौसम में
नरम रजाई सी तलवों को ढक कर सुकून देने लगी .
कुछ ही देर में धूप की तेज़ होती गरमाहट चुभने लगी ।
कुछ लोग भी ऐसे होते हैं,
शुरू में नरम और बाद में चुभने वाले।
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