प्रतिपदा का चाँद

प्रतिपदा का कमज़ोर, क्षीण चाँद

थका हारा सा अपनी

पीली अल्प सी चाँदनी ,

पलाश के आग जैसे  लाल फूलों पर

बिखेरता हुआ बोला –

बस कुछ दिनो की बात है .

मैं फिर पूर्ण  हो जाऊँगा।

मेरी चाँदी सी चाँदनी हर अोर बिखरी होगी .

 

प्रतिपदा – पक्ष की पहली तिथि।

दीवाली अौर दीये !

हमने खुद जल कर उजाला किया.

अमावास्या की अँधेरी रातों में,

 बयार से लङ-झगङ कर…

तुम्हारी ख़ुशियों के लिए सोने सी सुनहरी रोशनी से जगमगाते रहे.

और आज उसी माटी में पड़े हैं…..

उसमें शामिल होने के लिए

जहाँ से जन्म लिया था.

यह थी हमारी एक रात की ज़िंदगी.

क्या तुम अपने को जला कर ख़ुशियाँ बिखेर सकते हो?

कुछ पलों में हीं जिंदगी जी सकते हो?

  सीखना है तो यह सीखो। 

 

 

Image courtesy- Aneesh

जिंदगी के रंग- 193

हम कभी क़ैद होते है ख्वाबों, ख्वाहिशों , ख्यालों, अरमानों में।

कभी होते हैं अपने मन अौर यादों के क़ैद में।

हमारी रूह शरीर में क़ैद होती है।

क्या हम आजाद हैं?

या पूरी जिंदगी ही क़ैद की कहानी है?

 

 

ज़िंदगी के रंग – 191

हमसे ना उम्मीद रखो सहारे की.

ख़ुद हीं लड़ रहे हैं नाउम्मीदी से.

वायदा है जिस दिन निकल आए,

पार कर लिया दरिया-ए-नाउम्मीद को.

सबसे बड़े मददगार बनेंगे.

 

वक़्त

समय कब कहता है – वह सही है?

शिद्दत से सही वक्त ढूँढना पङता है।

कई बार सही समय ढूँढने में

वक्त हीं फिसल जाता है हाथों से।

 

मुस्कुराते है….

मुस्कुराते है….

अपने दर्द को छुपाने के लिए,

अपनों का हौसला बढ़ाने के लिए,

ग़मों से दिल को बहलाने के लिए.

पर  क्यों इससे भी शिकायत है?

 

सोने का मुल्लमा

किताब-ए-ज़िंदगी

का पहला सबक़ सीखा।

रिश्तों को निभाने के लिए,

अपनों की गिलाओ पर ख़ामोशी के

सोने का मुल्लमा चढ़ना अच्छा है।

पर अनमोल सबक़ उसके बाद के

पन्नों पर मिला –

सोने के पानी चढ़ाने से पहले

देखो तो सही…

ज़र्फ़….सहनशीलता तुम्हारी,

कहीं तुम्हें हीं ग़लत इल्ज़ामों के

घेरे  में ना खड़ा कर दे.

अक्स-ए-किरदार

चटकी लकीरें देख समझ नहीं आया

आईना टूटा है या

उसमें दिखने वाला अक्स-ए-किरदार?

 

अंश

कई बार मर- मर कर जीते जीते,
मौत का डर नहीं रहता.
पर किसी के जाने के बाद
अपने अंदर कुछ मर जाता है.
….शायद एक अंश अपना.
वह ज़िंदगी का ना भरने वाला
सबसे बड़ा ज़ख़्म, नासूर  बन जाता है.

 

तारीखें चुभती है!!

जाना जरूरी था,
तो कम से कम इतनी राहत
इतना अजाब तो दे जाते…
आँखों में सैलाब दे जानेवाले,
कैलेंडर के जिन पन्नों के साथ हमारी जिंदगी अटकी है।
उसमें से कुछ तारीखें तो मिटा जाते ।
ये तारीखें चुभती है।