ज़िंदगी के रंग – 214

ख़्वाब था, ख़्वाहिशें थीं या हक़ीक़त …. मालूम नहीं!

लगता था जैसे जागती अँधेरी रातों में,

नींद आते कोई आ बैठा पायताने, सहलाता तलवों को.

जहाँ उग आए थे फफोले, ज़िंदगी के दौड़ में भागते-दौड़ते .

दर्द देते,  फूट गए थे कुछ छाले…. फफोले…… .

क्या जागती ज़िंदगी में भी कोई मलहम लगाने आएगा?

ज़िंदगी बुनती रहती है सपने !!

ज़िंदगी बुनती रहती है सपने

धागे के ताने-बाने से,

 रेशम सी बनाती ।

तभी,जब सुहानी बयार 

रुख बदल आँधी बन जाती है.

रेशम के ताने बाने तार-तार कर जाती है।

यादें हलकी हो भी जायें।

दर्द कहाँ कम होता है?

 

दिल तक !!!

चंद शब्दों … लफ़्ज़ों में

जब आग  की तपिश दिखे,

समझ लो ये दिल से निकलें हैं

और दिल तक जायेंगे!!

फ़िज़ा में !!!

सोन्धी-सोन्धी ख़ुश्बू बिखर गई फ़िज़ा में.

कहीं बादल बरसा था या आँखें किसी की?

कहा था –

ना कुरेदो अतीत की यादों को.

माज़ी…..अतीत के ख़ाक में भी बड़ी आग होती है.

 

वन-वे राहें

आदतें भी बड़ी अजीब होतीं हैं.

इनमे भी नशा वाजिब होते है.

ना कोई वायदा, ना लौटने के इरादे.

ना जाने कौन सा अनजान सफ़र अौर राहें.

मालूम है, वे हैं वन-वे राहें.

मालूम है दरवाज़ा खड़का होगा हवा से,

मगर उम्र कट रही है इंतज़ार में.

 

तुमने हमारे साये में हमें हीं काट डाला!

दरख़्तों…पेड़ों को कटाते,

पसीने से तर-ब-तर पेशानी और चेहरा पोछते,

छाया खोजती निगाहे ऊपर उठीं,

था खुला आकाश और चिलचिलाती धूप !

कटे कराहते दरख़्तों और डालियों ने कहा,

अब तपिश से बचाने को हमारा साया….छाया नहीं.

करो इंतज़ार धूप ढलने का.

तुमने हमारे साये में हमें हीं काट डाला!

 

image- Aneesh

रूह से रूह तक

बिखरी पड़ी है तेरी रौशनी हर ओर।

 हम ढूँढते रहते हैं मंदिरों-मस्जिदों-गिरजों में।

आवाज़ें देते रहते हैं माजरों-समाधियों पर।

 सुनते नहीं लौट कर आती सदायें….गूँज अपने अंदर की.

क्यों भूल जातें हैं-

मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा है।

बस तेरी अमानतें हैं, जो लौटनीं है।

 रूह से रूह तक प्रेम पहुँचाना है।

अतीत


यादों में,

माज़ी….अतीत में

डूब कर

कभी कभी लगता है,

हम, हम नहीं रहे,

तुम हो गए!!!!!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Image courtesy – Aneesh

 

ज़िन्दगी के रंग – 213

जो बनते रहें हैं अपने.

कहते हैं पहचान नहीं पाए तुम्हें !

आँखों पर गुमान की पट्टी ऐसी हीं होती है.

अच्छा है अगर लोंग पहले पहचान लें  ख़ुद को।

ज़िंदगी के राहों में,

हम ने बख़ूबी पहचान लिया इन्हें!

 

मित्र

खोज रहें हैं, एक सुदामा सा कोई मिल जाए !

वैसे तो मीत बनाने को

ना जाने कब से ढूँढ रहें हैं कान्हा को भी.

अभी तक वो तो मिले नहीं.

कहते हैं, अहंकार सेकृष्ण को पाया नहीं जा सकता.

अब मीरा-राधा सा निश्छल हृदय कहाँ से लायें?

जो कृष्ण मिल जायें?

इसलिए खोज रहें हैं,

एक सुदामा सा तो कोई मित्र मिल जाए !

 

शुभ मित्रता दिवस !!!!