डर

सब खो दिया।

अब क्यों डरें?

कुछ और अब

ना चाहिए।

वरना फिर डरना

सीख जाएँगें।

गुरु

ज़िंदगी में ज़ख़्म

लगते रहेंगे।

उन्हें भूल जाओ

तो कोई बात नहीं।

पर सबक़ ना भूलना।

ग़र भूल गए तो

ज़िंदगी गुरु बन

फिर-फिर सिखाएगी।

मोतियाँ

लेखक, कवि औ

कलाकार कल्पना और

ख़्वाबों की दुनिया से

मोतियाँ चुन

सजाते हैं अपनी रचायें।

यह ख़ज़ाना खुली आँखों

से नहीं दिखता।

दिल से हीं महसूस

किया जा सकता है,

ख़्वाबों की यह तिज़ारत।

मुनाफ़ा-नुक़सान में

उलझने वाले क्या जाने

दिल की ये ख़ूबसूरत बातें?

गीता

महाभारत युद्ध के समय

श्री कृष्ण उपदेश देते है।

कर्म-धर्म के सच्चे ज्ञान की,

जब अर्जुन अपनों से युद्ध करने

से हिचकिचाता हैं तब।

क्या महाभारत और गीता

नहीं है, हम सब के अंदर।

मानसिक द्वन्द के समय

हमारा दिल कृष्ण बन

समझाता है,

दिमाग़ अर्जुन बन

दुविधा में घिर जाता है।

शुभ गीता जयंती!!

Happy Geeta Jayanti !!!

मार्गशीर्ष महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी को गीता जयंती मनाई जाती है। इस दिन मोक्षदा एकादशी भी कहते है। इस बार गीता जयंती 14 दिसंबर को मनाई जा रही है। मान्यता है गीता ग्रंथ का प्रादुर्भाव मार्गशीर्ष मास में शुक्लपक्ष की एकादशी को हुआ था।

ज़िंदगी के रंग – 220

घर के छत की ढलाई

के लिए लगे बल्ले, बाँस

और लकड़ियों के तख़्ते ने

बिखरे रेत-सीमेंट को

देख कर कहा –

हम ना हो तो तुम्हें

सहारा दे मकान का

छत कौन बनाएगा?

कुछ दिनों के बाद

मज़बूत बन चुका छत

बिन सहारा तना था।

और ज़मीन पर बिखरे थे

कुछ समय पहले

के अहंकार में डूबे बाँस,

बल्ले और तख़्तियाँ।

ज़िंदगी रोज़ नए रंग दिखाती है ।

भरोसा और यक़ीं

उनसे सच की

क्या उम्मीद करना,

जो ख़ुद से भी झूठ बोलतें हैं?

बड़े सलीक़े से झूठ बोलते हैं।

तय है, हर लफ़्ज़ से, बेख़ौफ़ टपकते झूठ का हुनर ,

मुद्दतों में सीखा होगा।

वे हमें नादाँ कहते हैं।

हैं नादान क्योंकि

हमने भी भरोसा करना ,

यक़ीं करना अरसे

से सीखा है।

कसक

ठंड में बढ़ जाती है,

गुम चोट की कसक।

रातों में बढ़ जाती हैं,

गुम और भूली-बिसरीं

यादों की कसक।

दिल-ओ-दिमाग़

चोट से टूटे दिल से,

दिमाग़ ने पूछा –

तुम ठीक हो ना?

तुम्हें बुरा नहीं,

ज़्यादा भला होने की

मिली है सज़ा।

ऐसे लोगों की

दुनिया लेती है मज़ा।

पेश नहीं आते दिल से,

दिमाग़ वालों से।

प्यार करो अपने आप से,

मुझ से।

ज़िंदगी सँवर जाएगी।

इनायत

इनायत

अँधेरे पल हो या उजाले,

ज़िंदगी की सारी लड़ाईयाँ

हम ने तुम्हारे भरोसे लड़ी,

तुम्हारी रज़ा और

इनायत के साये में।

ना किया तुमने

कभी कोई वादा,

पर दर्मियान हमारे-तुम्हारे

भरोसे का वो रिश्ता है

कि तुमने कभी

निराश नहीं किया।

मंज़िल

मंज़िल

यक़ीं करो अपने आप पर।

और नज़र रखो मंज़िल पर।

इस दुनिया में इतना

है टोका-टोकी।

ग़र लोगों की बातें

सुनते रहे,

मंज़िल तक नहीं

पहुँच पाएँगे कभी।