
दे कर चुभन और
हाल पूछते हैं।
ना मिलने पर
सवाल पूछतें हैं।
कुरेदतें हैं,
ज़ख्मों को
मलहम के बहाने।
उन लोगों का
क्या किया जाए?

दे कर चुभन और
हाल पूछते हैं।
ना मिलने पर
सवाल पूछतें हैं।
कुरेदतें हैं,
ज़ख्मों को
मलहम के बहाने।
उन लोगों का
क्या किया जाए?

लोग
ज़िंदगी की राहों में
लोगों को आने दो
….. जाने दो।
सिर्फ़ उनसे मिले
सबक़ अपना लो।
राहों में मिले टेढ़े-मेढ़े
लोग सीधे चलने की
सबक़ औ समझ दे जाएँगे।

कुंदन
ज़िंदगी के इम्तहानों में
तप कर सोना बने,
कुंदन हुए या
हुए ख़ाक।
यह तो मालूम नहीं।
पर अब महफ़िलें
उलझतीं नहीं।
बेकार की बातें
रुलातीं नहीं।
ना अपनी ख़ुशियाँ
कहीं और ढूँढते हैं ,
ना देते है किसी
को सफ़ाई ।
हल्की सी
मुस्कान के साथ,
अपनी ख़ुशियों पर
यक़ीं करना सीख रहें हैं।

ख़्वाब और तितलियाँ
रात के आँचल में,
कई ख़्वाब रंग-बिरंगी
तितलियों से आतें हैं।
बंद आँखों में
खेल जातें हैं।
हाथ बढ़ाते,
आँखें खुलते,
कुछ अधूरी यादें
छोड़ जातें है।
जैसे तितलियों को
पकड़ने की कोशिश में,
उनके परों के कुछ
रंग अंगुलियों पर
छूट जातें हैं।

मिथ्यारहित सत्य
चाँद को चाँद कह दिया,
ख़फ़ा हो गई दुनिया ।
जब सच का आईना
सामने आया।
सौ-सौ झूठों का
क़ाफ़िला सजा दिया।
ना खुद से ना खुदा से
बोलना सच।
और कहते हैं जीवन का
अंतिम पड़ाव है सच ….
….. मिथ्यारहित सत्य।

रौशनी
सूरज डूबेगा नहीं,
तब निकलेगा कैसे?
चाँद अधूरा नहीं होगा,
तब पूरा कैसे होगा?
अँधेरा नहीं होगा,
तब रौशनी का मोल कैसे होगा?
अमावस नहीं होगा,
तब पूर्णिमा कैसे आएगी।
यही है ज़िंदगी।
इसलिय ग़र चमक कम हो,
रौशनी कम लगे।
बिना डरे इंतज़ार करो।
फिर रौशन होगी ज़िंदगी।

तहरीर
कभी ज़िंदगी की हर
लहर डराती थीं।
लगता था बहा ले जाएँगी
अपनी रवानी में।
एक दिन दरिया
कानों में फुसफुसाया –
मैं तो दरिया हूँ ।
कभी कभी ज़िंदगी
समुंदर लगेगी।
पर डरो नहीं।
ज़िंदगी की तहरीरों….
लिखावट को पढ़ना सीखो लो।
समय पर, अपने आप पर
भरोसा करना सीख लो।
अपने आप से प्यार
करना सीख लो।
मज़बूत बनाना सीख लो।
हर दरिया समुंदर में गिरता है,
सागर दरिया में नहीं।
दरिया की बातें सुन,
ज़िंदगी की दरिया में
तैरना सीख रहें हैं।
अब गोते लगा कर डूबते
नहीं, उभर जातें हैं ।
अब लोग परेशान है –
यह अक्स किस का है?
क्यों इतनी रौशनी है
पानी में ….
इनकी ज़िंदगानी में।
इम्तिहान
ज़िंदगी क्या तुझे
ख़बर है?
कितनी बार टूट कर
यहाँ पहुँचें है?
तू बस परखते रह,
नए-नए इम्तिहान
लेती जा।

ज़िंदगी की किताब
ज़िंदगी के किताब
के पुराने पन्ने
कब तक है पढ़ना?
बीते पलों को
बीत जाने दो।
अतीत को
अतीत में रहने दो।
ज़िंदगी में आगे बढ़ो।
नए पन्नों पर कुछ
नया अफ़साना लिखो।

ज़िंदगी की राहें
मज़बूत दिखने वालों
की सच्चाई यह होती है,
कि वे कई बार टूट
कर बने होते हैं।
ज़िंदगी की राहों पर,
वे अकेला चलना
सीख चुके होतें हैं।
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