“गुरु मतंग और शबरी” Happy Guru Purnima!

“इंतज़ार आत्मा से हो तो पूरी होती हैं” – शबरी से राम ने कहा। “रावण तो बहाना है। कुछ कहानियाँ रची जातीं हैं, युगों-युगों तक कहे जाने के लिए। वे इतिहास बन जाती हैं । लीला तो रची जाती हैं, इंसानों को समझाने के लिय। रावण तो बस बहाना है। मुझे तेरे पास आना था।”

फिर कहा राम ने – “पशु बली से द्रवित होते हैं क्या वनों में बसे भील? क्यों हुई द्रवित तू? क्यों यौवन में किया गृह त्याग? तेरी पुकार कैसे करता मैं अनसुनी। चल कर आया तुम तक। बताने तुझे, ना रहता है यौवन-सौंदर्य, ना ऊँच-नीच।सिर्फ़ रह जाती है अटूट भक्ति, जब श्रमणा बन जाती है शबरी।”

तेरे एक रक्त बूँद से दरिया हुआ रक्ताभ और तेरे हीं चरण रज से जल हुआ स्वच्छ। तब भी नहीं जाना तुने क्या अपना तप और बल? ना तूने मुझे देखा, ना जाना। बरसों से, मेरे जन्म पूर्व से ताकती रही राहें मेरी। चखती-चुनती मीठे बेर, सजाती रोज़ पुष्प। सोंच, ना जाने किस पल आ जायें राम? समाधिस्थ होते गुरु मतंग के आशीष के भरोसे प्रतिक्षारत – “राम करेंगे तेरी चिंता और धरेंगे ध्यान और दिलाएँगे मोक्ष। ना ढूँढ उन्हें, वे ढूँढेंगे तुझे।”

शबरी, काल को तुने नहीं जाना क्या? देता नहीं किसी को एक पल ज़्यादा, ना एक पल कम। आयु पूरी होते ले जाने का बना लेता है बहाना।ना भ्रम में रह। रावण भी जाता किसी ना किसी विधि संसार से। रावण तो एक बहाना था। अम्मा, मुझे तो तेरे पास आना था।

शुभ गुरु पूर्णिमा !!

रेत-औ-रज

पैरों में लगे धूल झड़ाते, पूछा उनसे-

क्यों बिखरे हो यूँ? राहों में पड़े हो पैरों तले?

खिलखिला कर राहों के रज ने कहा –

कभी बन जाओ ख़ाक…माटी।

हो जाओ रेत-औ-रज,

ईश्वर और इश्क़ की राहों पर।

समझ आ जाएगा,

ना खबसूरती रहती है, ना जुनून।

जब अहं खो जाए, हो जाए इश्क़ उससे।

दुनिया हसीन बन जाती है गर्द बन कर।

ज़र्रा-ज़र्रा मुस्कुरा उठता है।

शुभ रथ यात्रा! Happy Rath yatra!!

पुरी, धरा का बैकुंठ, पूर्ण करता यात्रा चार-धाम।

जहाँ निकलते है भाई-बहन

जगन्नाथ, सुभद्रा, , बलराम

नगर भ्रमण को, शुक्ल पक्ष, द्वितीया आषाढ़ मास।

जगन्नाथ दारु -नीम काष्ठ बने रथ गरुड़ध्वज पर,

बलराम तालध्वज, सुभद्रा दर्पदलन’- पद्म रथ पर।

रूप मनभावन, विशाल नेत्र मंगल आशिष परिपूर्ण।

रथों को खींचते भक्त भाग्यवान।

ढोल, नगाड़ों, तुरही, शंखध्वनि से गूंजे धाम।

Ratha Jatra/ yatra is a Hindu festival associated with Lord Jagannath held at Shri Kshetra Puri Dham in the state of Odisha, India. It is the oldest Ratha Yatra, whose descriptions can be found in Brahma Purana, Padma Purana, and Skanda Purana and Kapila Samhita. 

ज़िंदगी के हक़दार हैं हम सब

अक्सर लड़कियाँ को सबक़ – ढके रहना सीखो।

सहना-चुप रहना सीखो, कहना नहीं।

लड़कों के सबक़ होतें हैं – लड़के हो, रोना नहीं,

आँसू नहीं बहाना, ज़िम्मेदार और मज़बूत रहना।

अंदर हीं अंदर घुटती भावनाओं

और दर्द के नासूर का क्या करना?

अपनी तकलीफ़-पीड़ा किसे है बतानी?

अपने लिए खड़े होना कौन सिखायेगा?

सच तो यह है –

भावनाओं और दर्द से भरा बारूद ना बन,

पहले ख़ुद से, अपने दिल-दिमाग़-रूह से प्यार कर।

खुशहाल ज़िंदगी के हक़दार है हम सब।

O MEN PAUSE

देखा है क्या गौर से उसे, महसूस किया है क्या?
वह हर रोज़ बदलती है।
ना यह नज़ाकत, जादू या अदा है उसकी।
यह वह नहीं, हैं उसके हार्मोन।
कभी उसे ख़ूबसूरत, talkative, intuitive
कभी creative, चिड़चिड़ा बनाते।
दर्द-चोट- conflict- aggression से बचती-बचाती,
है ये उसके ज़्यादा responsive दिल-औ-दिमाग़।
मूड on-off, pregnant brain, mommy brain….
पर नहीं उसका क़ाबू।
इतने बदलावों के बाद भी है नाज़ुक, सुकुमार।
ग़र तुमने उसे पढ़ना सीख लिया तो
है खुली किताब वरना पहेली सी।
खुद में ही उलझी, है सरल सर्वोत्तम कृति ख़ुदा की।
जान गए, पहचान गए तो ठीक, वरना है ख़ुदा ही मालिक।
Caution – she is fragile ! handle with care to get the best.

Women goes through adolescence twice,( MEN-O-PAUSE). Primenopause in their 40s is called second adolescence”. It starts around age 43 and reaches its pinnacle by 47/48/52.

लफ़्ज़ और अल्फ़ाज़

कभी ग़ौर किया क्या?

शुक्रिया अदा करते वक्त,

दिल होता है पाक-साफ़।

शिकायतें-शिकवे आते नहीं ज़ेहन में।

एहसानमंद अल्फ़ाज़ों में होती है रूहानियत।

वे नहीं करते दिल दुखाने का गुनाह।

क़ुसूरवार तो होते हैं कड़वे-कृतघ्न दिलों से

निकलते चासनी डूबे, हिजाब ओढ़ें लफ़्ज़।

Gratitude is the healthiest of all human emotions.”

Zig Ziglar

ख़ुशियों भरा बदलाव

एकांत में रम कर समझ आता है,

किसे प्यार है, किसे कहते है ज़रूरत।

एकांत परिचय करता है अपने आप से।

यह पहचान कराता है –

सच्चे अपनों और तथाकथित अपनों से।

ख़ुशियों भरा बदलाव लाता है बाहर से।

धीरे-धीरे अंदर भी बहुत कुछ बदलने लगता है।

मनोवैज्ञानिक तथ्य – जब आप खुद के साथ

ज्यादा समय अकेले बिताने लगते हैं तब आप

अपने साथ-साथ दूसरे की मनःस्थिति बड़ी

आसानी से समझने लगते हैं ।

तहज़ीब

कुछ से दूरी है ज़रूरी,

अपने आप से इश्क़ करने के लिए।

ये तहज़ीब सिखाते है,

ख़ामियों के परे ज़िंदगी देखने की।

आपने भी

कविताएँ है शब्द और भाव।

पहुँचती है दिलों तक तब,

जब कुछ अधूरी ख्वाहिशें कुछ बिखरी,

ज़िंदगी देखी हो आपने भी।

इनका लुत्फ़ मिलेगा तब,

जब कुछ अधुरे अरमान जाग रहे हों,

दिलों की गहराई में।

जहाँ छु सके इन्हें सिर्फ़ शब्दों की गहराइयाँ।

इनसे गुफ़्तगू हो, जुड़ाव महसूस हो।

कुछ अपना सा,

अपनी ज़िंदगी का हिस्सा सा लगे।

वरना तो कविताएँ शब्दों का बुना जाल है।

वक्त की कहानी

यह तो वक़्त वक़्त की बात है।

टिकना हमारी फ़ितरत नहीं।

हम तो बहाव ही ज़िंदगी की।

ना तुम एक से रहते हो ना हम।

परिवर्तन तो संसार का नियम है।

पढ़ लो दरिया में

बहते पानी की तहरीरों को।

बात बस इतनी है –

बुरे वक़्त और दर्द में लगता है

युग बीत रहे और

एहसास-ए-वक़्त नहीं रहता

सुख में और इश्क़ में।