अप्रैल फूल – कहानी.

मँजुल और बीनू बड़ी अच्छी  साखियाँ थी. मँजुल की शादी पैसेवाले घर में हुई. तत्काल उसने बीनू की दोस्ती अपने देवर कुमार से करवा दी. पहली होली मनाने  मँजुल पति  और देवर के साथ मैके पहुँची. रंग और भंग के नशे में डूबे बीनू और कुमार को मँजुल ने  अपने कमरे में एकांत भी उपलब्ध करा दिया.

अगले वर्ष कुमार के बैंक  पीओ बनने के साथ मँजुल को एक ख़बर बीनू ने भी दिया  – वह कुमार के बच्चे की कुंवारी माँ बनने वाली है और कुमार ने उसे शादी का आश्वासन दिया है.काफी सोंचा विचार कर  बीनू को मँजुला ने आश्वाशन दिया , घबराने की बात नहीँ है. बस, वह  अपनी  माँ बनने की ख़बर गुप्त रखे.  तकि वह अपने  रूढिवादी  ससुराल वालों को राजी कर सके. एक दिन शाम के समय मँजुल मिठाई के डब्बे के साथ बीनू के पास पहुँची.

छत पर, बीनू के  एकांत कमरे  में मँजुल ने हमेशा की तरह अपनी शादीशुदा खुशनुमा जीवन के रंगीन किस्से सुनायें. साथ ही उसे एक खुशखबरी दी. जल्दी ही कुमार उसके घरवालो से उनके शादी की बात करने आने वाला है.

मँजुल आनेवाले एक अप्रैल को अपने पति को अप्रैल फूल बनाने की योजना बना रही थी. दोनो हँसती -खिलखिलाती सखियों ने तय किया, मँजुल अपने पति को अपने  आत्महत्या की झूठी  चिठ्ठी  भेजेगी और जब  वह डर कर  भागता- दौड़ता आयेगा तब उसका चेहरा देखने में बड़ा मज़ा आयेगा.

मँजुल ने बीनू को चट कलम पकड़ा दिया. बीनू ने दो पंक्तियों में आत्महत्या की धमकी लिख दी. चिट्ठी पूरी होती मँजुल ने उसकी प्रतिलिपि अपने लिखावट में  बनाई और नीचे अपना नाम लिख दिया.  तभी ,मँजुल को मिठाई के डब्बे की याद आई. उसने डब्बे से लड्डू निकाल बीनू के मुँह में दो -तीन लड्डू ठूँस दिये और दोनो साखियाँ जेठानी – देवरानी बनने के सपने सजाने लगीं.

थोड़ी देर  में  मँजुल जाने के लिये उठ खड़ी हुई  और बोल पड़ी – ” मेरा नकारा पति अपने पिता के काले पैसों पर जीता है  और तुम  पीओ की पत्नी बनोगी ? मुझे तुम्हारी  अच्छाईयाँ हमेशा चुभती थी. जान बुझ कर  मैंने   कुमार से तुम्हारी दोस्ती करवाई थी. उसे तुममें कोई दिलचस्पी नहीँ है. वह तो हमेशा से ढीले चरित्र का है.”

तभी बीनू अपना पेट पकड़ कर छटपटा कर अर्ध बेहोशी में ज़मीन पर गिर पड़ी. मँजुल ने  कुटिल हँसी के साथ कहा – “ओह … लड्डूओं वे अपना काम कर दिया ?” बचे लड्डुओ के डब्बे को बैग में रख , बीनू की  लिखावट में लिखी आत्महत्या की  चिठ्ठी  टेबल पर  पेपर वेट से दबा वह  चुपचाप निकल गई.

नरक द्वार- कविता Door to Hell -Poem

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In Turkmenistan (1971)  a natural gas field  of Methane  was found. To prevent the spread of methane gas, geologists set it on fire and it has been burning continuously since then. It is known as the Gate to Hell/ Door to Hell / the Crater of Fire/  Darvaza Crater

तुर्कमेनिस्तान में 1971 में शक्तिशाली ग्रीन हाउस  व महत्वपुर्ण उर्जा स्त्रोत  गैस ” मीथेन ” का  एक बहुत बङा भंङार मिला। संभाल ना पाने पाने पर इसमें आग लगा दिया गया। आज इसे विभिन्न ङरावने नामों से पुकारा जाता है – नरक द्वार / ज्वालामुखी का जलता मुख / नरक के दरवाजे  /पाताल का द्वार .

प्रकृति ,धरती अौर सागर,

ने दिया इतना कुछ।

धरा का सीना चीर करते रहे दोहन।

अौर जब संभ्भाल नहीं पाये हम.

तब बचने के लिये लगा दिया आग।

अौर ४० वर्ष से इस जलते धधकते आग के

गोलाकार , ज्वालामुखी के मुख को

हमने दे दिया नाम “नरक का द्वार”

आश्चर्य  है,  समय-समय यहाँ आने वाली हजारों  मकड़ियां,

क्या वे भी हमारी तरह  यहां घूमने चली आती हैं?

पर्यटक हैं?

या बनाती हैं हमारी नासमझी का उपहास अौर मातम?

Image from internet.

आशु की जादुई घड़ी ( बाल मनोविज्ञान और बॉडी क्लॉक पर आधारित कहानी ) #ChildrensDay

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(यह कहानी बच्चों को बॉडी क्लॉक और इच्छा शक्ति के बारे में जानकारी देती है। यह कहानीबच्चों के साथ-साथ बड़ों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह कहानी बतलाती है कि, बाल मनोविज्ञान को समझते हुए मनोवैज्ञानिक तरीके से बच्चों को अच्छी बातें सरलता से सिखलायी जा सकती हैं। सही तरीके और छोटी-छोटी प्रेरणाओं की सहायता से बच्चों को समझाना बहुत आसान होता है। यह कहानी इन्ही बातों पर आधारित है। बाल दिवस – १४ नवंबर, के अवसर पर ।)

नन्हा आशु थोड़ी देर पहले ही जागा था। वह कमरे से बाहर आया, तभी उसने दादी को बाहर से आते देखा। दादी ने मुस्कुराते हुए कहा- “अरे, तू जाग गया है?” आशु ने पूछा- दादी तुम सुबह-सुबह कहाँ गई थी? दादी ने कहा- “मैं रोज़ सुबह मंदिर जाती हूँ बेटा। ये ले प्रसाद।” दादी ने उसके हथेली पर बताशे और मिश्री रख दिये। आशु को बताशे चूसने में बड़ा मज़ा आ रहा था। यह तो नए तरह की टाफ़ी है। उसने मन ही मन सोंचा।

उसके मन में ख्याल आया कि अगर वह दादी के साथ मंदिर जाए, तब उसे और बताशे-मिश्री खाने के लिए मिलेंगे। कुछ सोचते हुए उसने दादी से पूछा – ‘दादी, मुझे भी मंदिर ले चलोगी क्या?” दादी ने उसे गौर से देखते हुए कहा –“तुम सुबह तैयार हो जाओगे तो जरूर ले चलूँगी।‘ दादी पूजा की थाली लिए पूजा-घर की ओर बढ़ गईं। “दादी मेरी नींद सुबह कैसे खुलेगी? बताओ ना”- आशु ने दादी की साड़ी का पल्ला खींचते हुए पूछा। तुम रोज़ सुबह कैसे जाग जाती हो?

दादी ने हँस कर पूछा-“और बताशे-मिश्री चाहिए क्या?” आशु ने सिर हाँ में हिलाया। दादी ने उसके मुँह में बताशे डाल कर कहा – ‘मेरे तकिये में जादुई घड़ी है बेटा। वही मुझे सुबह-सुबह जगा देती है। अगर तुम्हें सुबह जागना है। तब रात में मुझ से वह तकिया ले लेना। सोते समय सच्चे मन से तकिये को अपने जागने का समय बता कर सोना। वह तुम्हें जरूर जगा देगा। लेकिन एक बात का ध्यान रखना। रात में देर तक मत जागना। क्यों दादी?– आशु ने पूछा। दादी ने जवाब दिया – “वह इसलिए ताकि तुम्हारी नींद पूरी हो सके। वरना तकिये के जगाने के बाद भी तुम्हें बिस्तर से निकलने का मन नहीं करेगा।“

आशु मम्मी-पापा के साथ दादा-दादी के पास आया था। उसके स्कूल की छुट्टियाँ चल रही थी। वह दादी के जादुई तकिये की बात से बड़ा खुश था क्योंकि उसे रोज़ सुबह स्कूल के लिए जागने में देर हो जाती थी। जल्दीबाजी में तैयार होना पड़ता। मम्मी से डांट भी पड़ती। कभी-कभी स्कूल की बस भी छूट जाती थी।

रात में वह दादी के पास पहुँचा। बड़े ध्यान से उनके बिस्तर पर रखे हुए तकियों को देख कर सोंच रहा था – इनमें से कौन सा तकिया जादुई है? देखने में तो सब एक जैसे लग रहे हैं। तभी मम्मी ने पीछे से आ कर पूछा – ‘तुम यहाँ क्या कर रहे हो आशु? तुम्हारा प्रिय कार्टून कार्यक्रम टीवी पर आ रहा है।“ आशु ने जवाब दिया – “नहीं मम्मी, मैं आज देर रात तक टीवी नहीं देखूंगा। आज मुझे समय पर सोना है।“ मम्मी हैरानी से उसे देखती हुई बाहर चली गईं।

आशु ने दादी की ओर देखा। दादी ने एक छोटा तकिया उसकी ओर बढ़ाया और पूछा – “तुमने खाना खा लिया है ना?” आशु ने खुशी से तकिये को बाँहों में पकड़ लिया और चहकते हुए कहा –“हाँ दादी। मैंने खाना खा कर ब्रश भी कर लिया है दादी।“ वह अपने कमरे में सोने चला गया। वह तकिये को बड़े प्यार से सवेरे जल्दी जगाने कह कर सो गया।

अगले दिन सचमुच वह सवेरे-सवेरे जाग कर दादी के पास पहुँच गया। दोनों तैयार हो कर मंदिर चले गए। मंदिर में एक बड़ा बरगद का पेड़ था। बरगद के लंबी-लंबी जटाएँ जमीन तक लटकी हुईं थीं। पेड़ पर ढेरो चिड़ियाँ चहचहा रहीं थी। बगल में गंगा नदी बहती थी। आशु को यह सब देखने मे बड़ा मज़ा आ रहा था। दादी नदी से लोटे में जल भरने सीढ़ियों से नीचे उतर गईं। आशु बरगद की जटाओं को पकड़ कर झूला झूलने लगा। दादी लोटे में जल ले कर मंदिर की ओर बढ़ गईं। आशु दौड़ कर दादी के पास पहुँच कर पूछा – ‘दादी तुम मेरे लिए जल नहीं लाई क्या?” दादी मुस्कुरा पड़ी। उन्होंने पूजा की डलिया से एक छोटा जल भरा लोटा निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दिया। वह दादी का अनुसरण करने लगा। पूजा के बाद दादी ने उसे ढेर सारे बताशे और मिश्री दिये।

आशु दादी के साथ रोज़ मंदिर जाने लगा। जादुई तकिया रोज़ उसे समय पर जगा देता था। दरअसल आशु को सवेरे का लाल सूरज, ठंडी हवा, पेड़, पंछी, नदी, प्रसाद और मंदिर की घंटिया सब बड़े लुभावने लगने लगे थे। आज मंदिर जाते समय दादी ने गौर किया कि आशु कुछ अनमना है। उन्हों ने आशु से पूछा – आज किस सोंच मे डूबे हो बेटा?” आशु दादी की ओर देखते हुए बोल पड़ा – “दादी, अब तो मेरी छुट्टियाँ समाप्त हो रही है। घर जा कर मैं कैसे सुबह जल्दी जागूँगा? मेरे पास तो जादुई तकिया नहीं है।‘

दादी उसका हाथ पकड़ कर नदी की सीढ़ियों पर बैठ गईं। दादी प्यार से उसके बालों पर हाथ फेरते हुए कहने लगी – “आशु, मेरा तकिया जादुई नहीं है बेटा। यह काम रोज़ तकिया नहीं बल्कि तुम्हारा मन या दिमाग करता है। जब तुम सच्चे मन से कोशिश करते हो , तब तुम्हारा प्रयास सफल होता है। यह तुम्हारे मजबूत इच्छा शक्ति का कमाल है। जब हम मन में कुछ करने का ठान लेते है, तब हमारी मानसिक शक्तियाँ उसे पूरा करने में मदद करती हैं। हाँ आशु, एक और खास बात तुम्हें बताती हूँ। दरअसल हमारा शरीर अपनी एक घड़ी के सहारे चलता है। जिससे हम नियत समय पर सोते-जागते है। हमें नियत समय पर भोजन की जरूरत महसूस होती है। जिसे हम मन की घड़ी या बॉडी क्लॉक कह सकते हैं। यह घड़ी प्रकृतिक रूप से मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों सभी में मौजूद रहता है। इसे अभ्यास द्वारा हम मजबूत बना सकतें हैं।“

आशु हैरानी से दादी की बातें सुन रहा था। उसने दादी से पूछा –“ इसका मतलब है दादी कि मुझे तुम्हारा तकिया नहीं बल्कि मेरा मन सवेर जागने में मदद कर रहा था? मैं अपनी इच्छा शक्ति से बॉडी क्लॉक को नियंत्रित कर सवेरे जागने लगा हूँ?” दादी ने हाँ मे माथा हिलाया और कहा – “आज रात तुम अपने मन में सवेरे जागने का निश्चय करके सोना। ताकिया की मदद मत लेना। रात में सोते समय आशु नें वैसा ही किया, जैसा दादी ने कहा था। सचमुच सवेरे वह सही समय पर जाग गया। आज आशु बहुत खुश था। उसने अपने मन के जादुई घड़ी को पहचान लिया था।

आशु की जादुई घड़ी ( बाल मनोविज्ञान और बॉडी क्लॉक पर आधारित कहानी ) #ChildrensDay

(यह कहानी बच्चों को बॉडी क्लॉक और इच्छा शक्ति के बारे में जानकारी देती है। यह कहानीबच्चों के साथ-साथ बड़ों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि  यह कहानी बतलाती है कि, बाल मनोविज्ञान को समझते हुए मनोवैज्ञानिक तरीके से बच्चों को अच्छी बातें सरलता से सिखलायी जा सकती हैं। सही तरीके और छोटी-छोटी प्रेरणाओं की सहायता से बच्चों को समझाना बहुत आसान होता है। यह कहानी इन्ही बातों पर आधारित है। बाल दिवस – १४  नवंबर, के अवसर पर ।)

नन्हा आशु थोड़ी देर पहले ही जागा था। वह कमरे से बाहर आया, तभी उसने दादी को बाहर से आते देखा। दादी ने मुस्कुराते हुए कहा- “अरे, तू जाग गया है?” आशु ने पूछा- दादी तुम सुबह-सुबह कहाँ गई थी? दादी ने कहा- “मैं रोज़ सुबह मंदिर जाती हूँ बेटा। ये ले प्रसाद।” दादी ने उसके हथेली पर बताशे और मिश्री रख दिये। आशु को बताशे चूसने में बड़ा मज़ा आ रहा था। यह तो नए तरह की टाफ़ी है। उसने मन ही मन सोंचा।

उसके मन में ख्याल आया कि अगर वह दादी के साथ मंदिर जाए, तब उसे और बताशे-मिश्री खाने के लिए मिलेंगे। कुछ सोचते हुए उसने दादी से पूछा – ‘दादी, मुझे भी मंदिर ले चलोगी क्या?” दादी ने उसे गौर से देखते हुए कहा –“तुम सुबह तैयार हो जाओगे तो जरूर ले चलूँगी।‘ दादी पूजा की थाली लिए पूजा-घर की ओर बढ़ गईं। “दादी मेरी नींद सुबह कैसे खुलेगी? बताओ ना”- आशु ने दादी की साड़ी का पल्ला खींचते हुए पूछा। तुम रोज़ सुबह कैसे जाग जाती हो?

दादी ने हँस कर पूछा-“और बताशे-मिश्री चाहिए क्या?” आशु ने सिर हाँ में हिलाया। दादी ने उसके मुँह में बताशे डाल कर कहा – ‘मेरे तकिये में जादुई घड़ी है बेटा। वही मुझे सुबह-सुबह जगा देती है। अगर तुम्हें सुबह जागना है। तब रात में मुझ से वह तकिया ले लेना। सोते समय सच्चे मन से तकिये को अपने जागने का समय बता कर सोना। वह तुम्हें जरूर जगा देगा। लेकिन एक बात का ध्यान रखना। रात में देर तक मत जागना। क्यों दादी?– आशु ने पूछा। दादी ने जवाब दिया – “वह इसलिए ताकि तुम्हारी नींद पूरी हो सके। वरना तकिये के जगाने के बाद भी तुम्हें बिस्तर से निकलने का मन नहीं करेगा।“

आशु मम्मी-पापा के साथ दादा-दादी के पास आया था। उसके स्कूल की छुट्टियाँ चल रही थी। वह दादी के जादुई तकिये की बात से बड़ा खुश था क्योंकि उसे रोज़ सुबह स्कूल के लिए जागने में देर हो जाती थी। जल्दीबाजी में तैयार होना पड़ता। मम्मी से डांट भी पड़ती। कभी-कभी स्कूल की बस भी छूट जाती थी।

रात में वह दादी के पास पहुँचा। बड़े ध्यान से उनके बिस्तर पर रखे हुए तकियों को देख कर सोंच रहा था – इनमें से कौन सा तकिया जादुई है? देखने में तो सब एक जैसे लग रहे हैं। तभी मम्मी ने पीछे से आ कर पूछा – ‘तुम यहाँ क्या कर रहे हो आशु? तुम्हारा प्रिय कार्टून कार्यक्रम टीवी पर आ रहा है।“ आशु ने जवाब दिया – “नहीं मम्मी, मैं आज देर रात तक टीवी नहीं देखूंगा। आज मुझे समय पर सोना है।“ मम्मी हैरानी से उसे देखती हुई बाहर चली गईं।

आशु ने दादी की ओर देखा। दादी ने एक छोटा तकिया उसकी ओर बढ़ाया और पूछा – “तुमने खाना खा लिया है ना?” आशु ने खुशी से तकिये को बाँहों में पकड़ लिया और चहकते हुए कहा –“हाँ दादी। मैंने खाना खा कर ब्रश भी कर लिया है दादी।“ वह अपने कमरे में सोने चला गया। वह तकिये को बड़े प्यार से सवेरे जल्दी जगाने कह कर सो गया।

अगले दिन सचमुच वह सवेरे-सवेरे जाग कर दादी के पास पहुँच गया। दोनों तैयार हो कर मंदिर चले गए। मंदिर में एक बड़ा बरगद का पेड़ था। बरगद के लंबी-लंबी जटाएँ जमीन तक लटकी हुईं थीं। पेड़ पर ढेरो चिड़ियाँ चहचहा रहीं थी। बगल में गंगा नदी बहती थी। आशु को यह सब देखने मे बड़ा मज़ा आ रहा था। दादी नदी से लोटे में जल भरने सीढ़ियों से नीचे उतर गईं। आशु बरगद की जटाओं को पकड़ कर झूला झूलने लगा। दादी लोटे में जल ले कर मंदिर की ओर बढ़ गईं। आशु दौड़ कर दादी के पास पहुँच कर पूछा – ‘दादी तुम मेरे लिए जल नहीं लाई क्या?” दादी मुस्कुरा पड़ी। उन्होंने पूजा की डलिया से एक छोटा जल भरा लोटा निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दिया। वह दादी का अनुसरण करने लगा। पूजा के बाद दादी ने उसे ढेर सारे बताशे और मिश्री दिये।

आशु दादी के साथ रोज़ मंदिर जाने लगा। जादुई तकिया रोज़ उसे समय पर जगा देता था। दरअसल आशु को सवेरे का लाल सूरज, ठंडी हवा, पेड़, पंछी, नदी, प्रसाद और मंदिर की घंटिया सब बड़े लुभावने लगने लगे थे। आज मंदिर जाते समय दादी ने गौर किया कि आशु कुछ अनमना है। उन्हों ने आशु से पूछा – आज किस सोंच मे डूबे हो बेटा?” आशु दादी की ओर देखते हुए बोल पड़ा – “दादी, अब तो मेरी छुट्टियाँ समाप्त हो रही है। घर जा कर मैं कैसे सुबह जल्दी जागूँगा? मेरे पास तो जादुई तकिया नहीं है।‘

दादी उसका हाथ पकड़ कर नदी की सीढ़ियों पर बैठ गईं। दादी प्यार से उसके बालों पर हाथ फेरते हुए कहने लगी – “आशु, मेरा तकिया जादुई नहीं है बेटा। यह काम रोज़ तकिया नहीं बल्कि तुम्हारा मन या दिमाग करता है। जब तुम सच्चे मन से कोशिश करते हो , तब तुम्हारा प्रयास सफल होता है। यह तुम्हारे मजबूत इच्छा शक्ति का कमाल है। जब हम मन में कुछ करने का ठान लेते है, तब हमारी मानसिक शक्तियाँ उसे पूरा करने में मदद करती हैं। हाँ आशु, एक और खास बात तुम्हें बताती हूँ। दरअसल हमारा शरीर अपनी एक घड़ी के सहारे चलता है। जिससे हम नियत समय पर सोते-जागते है। हमें नियत समय पर भोजन की जरूरत महसूस होती है। जिसे हम मन की घड़ी या बॉडी क्लॉक कह सकते हैं। यह घड़ी प्रकृतिक रूप से मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों सभी में मौजूद रहता है। इसे अभ्यास द्वारा हम मजबूत बना सकतें हैं।“

आशु हैरानी से दादी की बातें सुन रहा था। उसने दादी से पूछा –“ इसका मतलब है दादी कि मुझे तुम्हारा तकिया नहीं बल्कि मेरा मन सवेर जागने में मदद कर रहा था? मैं अपनी इच्छा शक्ति से बॉडी क्लॉक को नियंत्रित कर सवेरे जागने लगा हूँ?” दादी ने हाँ मे माथा हिलाया और कहा – “आज रात तुम अपने मन में सवेरे जागने का निश्चय करके सोना। ताकिया की मदद मत लेना। रात में सोते समय आशु नें वैसा ही किया, जैसा दादी ने कहा था। सचमुच सवेरे वह सही समय पर जाग गया। आज आशु बहुत खुश था। उसने अपने मन के जादुई घड़ी को पहचान लिया था।

 

 

 

Source: आशु की जादुई घड़ी ( बाल मनोविज्ञान और बॉडी क्लॉक पर आधारित कहानी )

स्वंयसिद्ध -कविता

क्या भविष्य को संजोने की लालसा

हमारी व्याकुलता अोर चिंता को बढ़ाती है?

नहीं, भविष्य के सपने सजाना

तो मनुष्य होने की

पहचान है।

यह व्यग्रता, उद्वेग तो

स्वंयसिद्ध , सर्वशक्तिमान   बन

भविष्य को नियंत्रित करने की कोशिश का परिणाम है…….

शून्य -कविता #Zero -Poem


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 हम शून्य से उपजे हैं

शून्य में मिल जायेंगे.

सिफर को सिफर नहीँ

जिंदगी का सफर मानो

यही हैं जीवन का गणित

सब में मिल सकता हैं यह

 अलग हो, फ़िर भी  अनमोल होगा .

 गणित को शून्य  दिया ……

पूज्यम आर्यभट्ट ने,

 हम शून्य से उपजे हैं

शून्य में मिल जायेंगे

शब्दार्थ –

शून्य – सिफर , पूज्यम , जीरो ,अनन्त.

अखरोट मखाना गुङ के स्वास्थवर्धक लङ्ङू – दिवाली के अवसर पर Healthy Walnut and Fox Nut laddoo


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त्योहारों में अक्सर गरिष्ठ मिठाइयोँ का प्रचलन है। इस दिवाली पर स्वादिष्ट, स्वस्थवर्धक लङ्ङूअों का मजा लिजीए। इसमे चीनी या घी बिलकुल नहीं है। इसे बनाना भी सरल है।

लङ्ङू
अखरोट- २०० ग्राम
मखाना – १०० ग्राम

बादाम – ५०ग्राम

चार मगज – १०० ग्राम ( तरबूज, सीताफल(कद्दू), खरबूजा और खीरे के बीज)

गुङ – २५० ग्राम

नारियल – १ कद्दुकस करें या मिक्सी में पीस लें

चाँदी का वर्क – ( अगर पसंद हो)

अखरोट , मखाना,बादाम,कद्दू के बीज अौर मगज अलग-अलग हलका भुनें। सूखा हीं मिक्सी में दरदरा पीस लें। गुङ को कद्दुकस करें। सभी सामग्री अच्छे से मिला कर थोङा मसलें। फिर इसे लङ्ङू बनाएँ।
वर्क लगायें। स्वादिष्ट, स्वस्थवर्धक लङ्ङू तैयार हैं।

अखरोट के फायदे – यह मस्तिष्क, नर्वस सिस्टम व दिमाग को तरावट देता है। इससे तनाव का स्‍तर घटता है। इसके सेवन से ब्‍लड़ प्रेशर नियंत्रित होता है अौर अच्‍छी नींद आती है। इसे बुद्धिवर्धक, लम्‍बे जीवन देने वाला अौर वजन घटाने वाला माना गया है। मधुमेह मे अखरोट लाभकारी होता है। गर्भवती महिलाओं के लिए भी अखरोट लाभप्रद है। यह बुरे कोलेस्ट्रोल को कम कर अच्छे कोलेस्ट्रोल को बढ़ाता है।
मखाना के फायदे – इसमें कैल्शियम, एटीं-आॉक्सीङेंट व एटीं-एजिंग गुण होते हैं। यह घुटनों, कमर दर्द व मधुमेह के लिये लाभदायक है। यह किङनी तथा दिल को सेहतमंद बनाता है।
बादाम के फायदे – इससे दिल हेल्दी रहता है। खराब कोलेस्ट्रॉल में राहत मिलती है और बढ़िया कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है।  इसमें मौजूद विटामिन ई  एंटीऑक्सीडेंट  है। बादाम में मौजूद फ्री रेडिकल उम्र के असर और सूजन को रोकता है।

कद्दू के बीज अौर मगज  के  फायदे – डायबिटीज रोगियों के लिए लाभकारी है। वजन घटाने को बढ़ावा देते हैं। बालों की ग्रोथ, सूजनरोधी, बेहतर नींद लेने में मददगार व एंटीऑक्सिडेंट से भरपूर हैं। दिल को स्वास्थ्य रखता है। मगज ब्लड प्रेशर नियंत्रित,  आंखों, बालों और नाखूनों को हेल्दी, इम्यून सिस्टम करता है स्ट्रांग बनाता है।यह गर्भवती महिलाओं के लिए फायदेमंद है। यह स्ट्रेस दूर करता है। यह कब्ज और एसिडिटी में भी फायदेमंद है।
 
नारियल के  फायदे  –  यह पोषक तत्‍वों का खजाना है। इसमें कॉपर, सेलेनियम, आयरन, फास्फोरस, पोटेशियम, मैग्नीशियम और जस्ता में जैसे खनिज मौजूद होते हैं। इसके अलावा, इसमें मौजूद वसा हेल्‍दी फैट में काउंट होती है।
 
 
 
नोट-

१ यह लङ्ङू मखाना के बिना सिर्फ अखरोट से भी बना सकतें है।
२ गुङ की मात्रा जरुरत अौर स्वाद के अनुसार ज्यादा भी ङाल सकतें हैं।
३ इस लङ्ङू का सेवन कम मात्रा में करें।
४ लङ्ङू की सामग्री को बारीक भी पीस सकतें हैं।

शुभ दिवाली!!!!

Happy diwali!!!!

दरवेश रक्स / नृत्य- कविता (whirling Darvesh/ sufi dance- Poem)


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जीवन एक नृत्य हैं.

शायद दरवेश रक्स की तरह ,

गोल गोल अपने  ही घेरे में

घूमते और झूमते.

चलती रहती हैं जिंदगी.

या दिये की लौ की तरह हैं.
ऊपर उठती खुशी से लपलपाती.

कभी जीवन के झँझावात जैसे

हवा  के झोंकों को झेलती.

कांपती , ठिठकती.

कभी लौ  के खुबसूरत रंग .

.पीले लाल सुनहरे रंग जैसी जिंदगी .

दीपायमान लौ या  दरवेश रक्स

क्या हैं ये  जिंदगी?

जागरूकता –  मानसिक स्वास्थ mental health awareness


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mh

Great initiative by Accio health – event on spreading mental health awareness.

What is psychosomatic problems ? Watch the video.

आज़ के भाग दौड़ के युग में  छोटी -छोटी मानसिक समस्याएँ बढ़ती जा रहीं हैं. जो आगे चल कर गम्भीर रुप लेने लगती हैं,  क्योंकि अक्सर हम इन समस्याओं पर उचित ध्यान नहीँ देते हैं. हमारे समाज में मानसिक समस्याओं को नकारात्मक रुप में देखा जाता हैं. इसलिये भी लोग इन समस्याओं   को  बताने  और सहायता लेने में झिझकते हैं.

Watch the video  – Conversation around mental health  

               जब कि,  मानसिक स्वस्थ पर भी शारीरिक स्वस्थ की  तरह ध्यान देना ज़रूरी हैं. बहुत सी स्वस्थ सम्बन्धित समस्याएँ साइकोसोमैटिक होतीं हैं. अर्थात मानसिक समस्याएँ गम्भीर शारीरिक बीमारियों का रुप लेने लगती हैं.

एकसीओ   हेल्थ ने  मनसिक स्वस्थ सम्बन्धित जागरूकता फैलने के लिये  ने एक सफल ऑनलाइन, लाईव कार्यक्रम आयोजित किया. जिसका लाईव शो फेस बुक पर भी आया.

इसमें अपने विचार स्मिता, समेँथा और डा रेखा ने प्रस्तुत किये हैं और  अनु के अपनी खूबसुरत कविता सुनाई . इसे आप इस लिंक पर देख सकते हैं –

Watch the video- Conversations around mental health

जिंदगी के रंग – कविता 10

कभी हमनें बिना सोंचे कुछ कह दिया।
उलझन में , कभी बिना बोले रह गये।

ना जाने इस  गलतफहमी में

कब कहाँ किसी का दिल दुखा दिया,

कब अपने दिल में छाले बना लिया………..