ज़िंदगी को नहीं फ़िक्र, तुम कौन हो?
वह सब को एक जैसे सबक़ देती है।
कि ज़िंदगी की ख्वाहिशों को पूरा
करने के लिए मूल्य चुकाना पड़ता है।

William Wordsworth was spot on when he said “Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings: it takes its origin from emotion recollected in tranquility.” When my pen meets the paper, it always captures the many moods and their wild swings and emotions and their detours which overflows from my heart spontaneously into the paper transmogrifying into verses!!
ज़िंदगी को नहीं फ़िक्र, तुम कौन हो?
वह सब को एक जैसे सबक़ देती है।
कि ज़िंदगी की ख्वाहिशों को पूरा
करने के लिए मूल्य चुकाना पड़ता है।

तन्हाईयाँ ख़्वाबों तक जाने की राहें बनातीं हैं।
हौसला हो एकांत से इश्क़ करने का।
तो तन्हाईयाँ मंज़िल पाना आसान बनातीं हैं।

मुझे हमेशा लगा
– यह तो मैं हूँ।
गौर किया,
तब पाया।
यह तो तुम हो,
मुझ में समाए।

सुकून भरा दिल और रूह
चंद बूँदे बरसे आसमान से।
खुला आकाश फुसफुसाया कानों में।
चैन पाने के लिए चंद क़तरे हम भी बरस जाने देते हैं,
कालिमा भरे नभ से, स्वच्छ नभ पाने के लिए।
आज़ाद छोड़ दे एहसासों औ दर्द को
बरस कर बह जाने के लिए।
ग़र पाना है सुकून भरा दिल और रूह।

Psychological fact –
Normal crying is emotional cathartic. It does have a soothing and relaxing effect. When we cry, our heart rate and breathing slow down a little and we start to calm down. We might even experience a mood boost after a good cry. Crying is useful for helping people release and express their suppressed or repressed emotions.
(Dr J Chan, a clinical psychologist at the Hong Kong Psychological Counselling Centre in Mong Kok)
चाँद, कई बार तुम आइने से लगते हो।
जिसमें अक्स झलक रहा हो अपना।
तुम्हारी तरह हीं अकेले,
अधूरे-पूरे और सुख-दुःख के सफ़र में,
दिल में कई राज़ छुपाए,
अँधेरे में दमकते,
अपने पूरे होने के आस में रौशन हैं।

धरती के दिल का दर्द जब फूट निकलता है। उबलते दर्द से पत्थर भी मोम सा पिघलता है। माणिक-पोखराज जैसे ख़ूबसूरत रंग लिए, आतशीं-लावा दमकता है। पास जाओ तो गरमाहट और आग बताती है, ज़मीं का क़तरा-क़तरा दर्द से लरज़ता है। दर्द भरा हर वजूद ऐसे हीं सुलगता है।



कहते हैं ग़र अफ़सानों को अंजाम तक मौन रख कर ले जाये तो कोशिशें कामयाब होतीं है। ना राज़ खोलें ज़बान से, ना नज़रों से। तो नज़रें नहीं लगेंगी। लक्ष्य पाना है, तो बातों को अपनों से और ग़ैरों से राज़ बना सीने में छुपा रखना हीं मुनासिब है।

एक दिन मिली राहों में उलझन बेज़ार, थोड़ी नाराज़ सी।
बोली – बड़े एहसान फ़रामोश हो तुम सब।
मैं ज़िंदगी के सबक़ सिखातीं हूँ
और तुम्हें शिकायतें मुझ से है?
जीना तुम्हें नहीं आता,
एक उलझन कम नहीं होती, दूसरी खड़ी कर देते हो।
हाँ! एक बात और सुनो –
ज़िंदगी है तो उलझने हैं! ना रहेगी ज़िंदगी ना रहेंगीं उलझने।
# this post is written on YourQuote topic.
दिया तुमने दर्द औ तकलीफ़।
ज़रूर कुछ सिखा रहे हो,
कुछ बता रहे हो।
डिग्री नहीं, सच्चे सबक़ नज़रों
के सामने ला रहे हो।
जानते हैं गिरने ना दोगे।
हाथ पकड़ कर चलना सीखा रहे हो।

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