जैसे चाहो, जी लो ज़िंदगी।
वापस लौटने की नहीं है गुंजाइश,
बस इतनी है शर्त-ए-ज़िंदगी।

William Wordsworth was spot on when he said “Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings: it takes its origin from emotion recollected in tranquility.” When my pen meets the paper, it always captures the many moods and their wild swings and emotions and their detours which overflows from my heart spontaneously into the paper transmogrifying into verses!!
जैसे चाहो, जी लो ज़िंदगी।
वापस लौटने की नहीं है गुंजाइश,
बस इतनी है शर्त-ए-ज़िंदगी।

सदियाँ और युग बीते,
रावण कभी नहीं मरा।
था अति विद्वान।
पर जीत नहीं सका अहंकार अपना।
विजया और रावण दहन सीख है,
जीत सको तो जीत लो अहंकार अपना।
ना रखो कई चेहरे,
दुनिया में कई चेहरे वाले कई रावण है,
इसलिये राम याद आतें हैं।

दहलीज़ पर जलता दीया,
पाथेय बन राहें
उनके लिए रौशन है करता,
जिन्हें वापस आना हो।
ज़ो लौटें हीं ना
उनके लिए क्यों दीया जलाना
रात की दहलीज़ पर?

थे राधा बनने की चाह में।
कई नज़रें उठी,
सिर्फ़ लालसा भरी चाह में।
माँगा इश्क़ भरी नज़रें,
मिला बदन भर चाह।
समझ ना आया, तह-दर-तह
तह-ए-इश्क़ में सच्चा कौन, झूठा कौन?
और हर इल्ज़ाम इश्क़ पर आया।
पर कृष्ण ना मिले।
महादुर्गाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

बँटवारा हो तब
ख़ुशियाँ तुम रख लो,
ग़म मेरे पास रहने दो।
अपने हिस्से की ख़ुशियाँ हम
ख़ुद रचेंगे, ख़ुद कमाएँगे।
अभी थोड़ी ख़ुशियाँ दे दो मुझे भी।
दुनिया को तुमसे मिले विरासत दिखाने के लिए।
चेहरे पर मुस्कान की मास्क लगा दुनिया
के सामने जाने के लिए।
बस इतनी सी है, तेरी मेरी कहानी।

topic by – yourQuote
उम्र-ए-रफ़्ता ना लौटे,
क्या फ़र्क़ है पड़ता?
उजालों का भी समय है ढलता।
सूरज भी है ढलता।
बस ज़िंदगी ख़ूबसूरत
और हो सुकून भरी।
यही है कामना।
उम्र-ए-रफ़्ता ना लौटे,
क्या फ़र्क़ है पड़ता?
The UN is marking IDOP by encouraging
countries to draw attention to and
challenge negative stereotypes and
misconceptions about older persons
and ageing, and to enable older persons
to realize their potential.
2022 Theme:Resilience of Older Persons
in a Changing World

ज़द्दोजहद में ज़िंदगी के,
थके, बेचैन दिन,
कट जाते है निशा के इंतज़ार में।
आ कर गुज़र जाती है रात भी,
किसी याद में।
रात की आग़ोश में,
थक कर सो जाते हैं ख़्वाब।
जागते रह जातें है
चराग़ और महताब…..चाँद।
जारी रहती है सफ़र-ए- ज़िंदगी।

जुस्तुजू
उलझी बातें, उलझी चालें।
दूसरों को गिराने के ख़्याल।
ईश्वर की अजीब मख़्लूक़… रचना है इंसान।
यह सब करके भी है जुस्तुजू
पाने के सीधे -सच्चे मख़्लूक़-ए-ख़ुदा…इंसान।
जो दुनिया को दोगे, वही मिलेगा।
क्यों नहीं आता ऐसा ख़्याल।



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