राख़ में दबी चिंगारी

चोट किसी की ख़्वाहिशों के

अन्दाज़ से नहीं भरता।

भरता है, अपने तरीक़े से,

अपने समय से।

कुरेदने से राख़ में दबी चिंगारी

आग भड़काती है फ़िज़ाओं में ।

अपने चोट, घाव ना कुरेद,

दो समय भरने का।

Wounds don’t heal the way we

want them to, they heal the way

they need to. It takes time to heal.

Be gentle with your wounds.

ए’तिबार

हम थे ख़फ़ा ख़फ़ा उन से।

और बेरुख़ी से वो चल दिए,

वहाँ जहाँ हम मना ना सके।

वफ़ा-जफ़ा, वफ़ाई-बेवफ़ाई,

के ग़ज़ब हैं अफ़साने।

ग़ज़ब हैं फ़साने।

हमें ऐतबार हीं नहीं रहा ज़माने पर।

सागर मंथन

गहरे सागर मंथन से अमृत मिला और गरल।

अपने अंदर के रौशनी-अंधकार समझ ऊपर उठना है,

अपनी भावनाओं-विकारों को देखना-समझना है,

तब दिल-औ-दिमाग़ का सागर मंथन है सबसे सरल।

सफ़र ज़िंदगी की

अपेक्षायें, सफ़ाई और

कई जज़्बा-ए-बेनाम,

आने लगे सफ़र-ए-ज़िंदगी के बीच।

जो चैन और सुकून छीन ले,

तब

लोगों को ना करे कोशिश बदलें की।

आसपास के लोगों को बदल दें।

अर्थ- जज़्बा-ए-बेनाम: अनाम अहसास / nameless emotions.

तुम चाहते हो….

चाहत मेरी या चाहत तेरी,

है क्या रूबरू हक़ीक़त से?

कहते हैं मिल जाती है कायनात,

चाहो ग़र शिद्दत से।

पर कुछ हसरतें, रह जातीं हैं हसरतें।

ग़र तुम चाहते हो किसी को रूह से

तब बनी रहेगी यह

मद्धम सी लौ-ए-चाहत अनंत तक।

आसमाँ और ज़मीं, सूरज और चाँद की उल्फ़त सी।

कुछ चाहतों में मिलन नहीं,

होती हैं ये चाहतें, चाहते रहने के लिये।

#TopicByYourQuote

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ख़ुशियों का समुंदर

अक्सर लगता है,

ग़ज़ब तनाव है ज़िंदगी में।

अजब ताव है फ़िज़ा में।

साया-ए-ग़म में साँसें है घुटी-घुटी।

हँसी की रौशनी जैसे लुटी-लुटी।

उदासी के अँधेरे में भाव बढ़ा जैसे चराग़ का।

सच यह है कि इसी उलझन का नाम है ज़िंदगी।

इसे मुस्कुरा कर जीना है बंदगी।

सामना करो, नाम दो पहचान दो एहसासों को।

भावनायें और दिलो-दिमाग़ ग़र सीख गए संभलना।

चाँद उतर आएगा फिर ख़ुशियों के समुंदर में।

International Stress Awareness Day-

Don’t become the slave of your emotions.

recognise your emotion and your triggers

and handle Them with care. Otherwise they’ll

Make you fragile.

विचलित नहीं होना मन मेरे

विचलित नहीं होना मन मेरे, देख कफ़न का सफ़ेद नूर।

यह तो है राह-ए-सुकून, दुनिया के दुःख-दर्द से दूर।

होते हैं कई बदकिस्मत बे-कफ़न

होते है कुछ जीते-जी मद में चूर।

भूल जाते है ज़िंदगी है रूहानियत,

समझदारी है, नही रखने में ग़ुरूर।

कफ़न में जेब नहीं होती, यह है मशहूर।

कर्मों की वसीयत होती है रूह पर ज़रूर।

#TopicByYourQuote

आदत

कहते हैं, आज़ाद छोड़ दो,

पंछी हो या इंसान।

ग़र वापस आना होगा,

अपने-आप आ जाएगे।

पर सच्चाई तो यह है कि

राह कोई भी, कभी भी भटक सकता है,

फिर ज़माना दोष देगा।

क्यों वापस आने की आदत ना लगाई,

क्यों राह-ए-नीड़ ना सिखलाई।

ख़्वाबों की इबादत

ज़िंदगी ख़्वाबों में मसरूफ़ ,

ख़्वाबों की इबादत में मसरूफ़।
नींद भरी आँखें अपनी

दर्द भरी कहानी किसे सुनायें?