
कई बार लगता है,
ऊपर वाला कुछ
लोगों को ज़िंदगी में
हमारा इम्तहान
लेने भेजता हैं।
जब तक हम अपने लिए
हौसले के साथ खड़ा होना
नहीं सीख लेते।
यह इम्तहान चलता रहता है।

कई बार लगता है,
ऊपर वाला कुछ
लोगों को ज़िंदगी में
हमारा इम्तहान
लेने भेजता हैं।
जब तक हम अपने लिए
हौसले के साथ खड़ा होना
नहीं सीख लेते।
यह इम्तहान चलता रहता है।

ज़िंदगी रोज़ एक ना एक
सवाल पूछती है।
सवालों के इस पहेली में
उलझ कर, जवाब ढूँढो।
तो ये सवाल बदल देती है।
ज़िंदगी रोज़ इम्तहान लेती है।
एक से पास हो या ना हो।
दूसरा इम्तहान सामने ला देती है।
अगर खुद ना ले इम्तहान,
तो कुछ लोगों को ज़िंदगी में
इम्तहान बना देती है।
बेज़ार हो पूछा ज़िंदगी से –
ऐसा कब तक चलेगा?
बोली ज़िंदगी – यह तुम्हारा
नहीं हमारा स्कूल है।
तब तक चलेगा ,जब तक है जान।
बस दिल लगा कर सीखते रहो।

समुंदर की लहरें,
जमीं का ज़ख़्म भरने की
कोशिश में मानो बार बार
आतीं-जातीं रहतीं है।
वक्त भी घाव भरने की
कोशिश करता रहता है।
ग़र चोट ना भर सका,
तब साथ उसके
जीना सिखा देता है।
कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए !
उसकी ख़ुशबुओं को ना पकड़ ,
वे फ़िज़ा में घुल गए।
हम ना किसी के साथ आए थे
ना साथ किसी के जाएँगे।
ना साथ खिले थे , ना साथ मुरझाएँगे।
कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए।
ना भूल थी बयार की,
ना भूल था नसीब का।
ना डाल दोष हवा पर,
ना डाल दोष बूँदों पर।
अख़्तियार ना था साँसों पर,
आग़ाह ना था मुस्तकबिल का।
नावाक़िफ़ थे आनेवाले कल से।
फूलों की इक डाली हवा से लचकी,
कई ज़िंदगियों को जुंबिशें दें
पंखुडियाँ बिखर गईं।
कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए।
कई पल बिना आवाज़ युगों से गुजर गए,
और हम बिखर गये।
ना पूछ बार बार वो मंजर।
फिर ले जातें हैं उसी ग़म के समंदर।
किसने सोचा था
बहारें आई है, पतझड़ भी आएगा ।
हम सँवरा करते, आईना सवाँरा करता था।
अब खुद हीं हैं ख़्वाबों की दुकाने सजाते,
खुद हीं ख़रीदार बन जातें ।ज़िंदगी हिसाब है वफ़ाओं, जफ़ाओं
और ख़ताओं की।
जो सदायें गूंजती हैं, गूंजने दे ।
फिर बहारें आएगी, गुलशन सजाएगी।
आफ़ताब फिर आएगा ,
गुनगुनी धूप का चादर फैलाएगा।
कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए !
उसकी ख़ुशबुओं को ना पकड़।
जो बिखर गये , वो बिखर गये।
रंजो मलाल में डूब नहीं ।
चलानी है कश्ती ज़िंदगी की।
ना ग़म कर, ना कम कर रौशनी अपनी।
फ़िज़ा में फैलने दे ख़ुशबू अपनी।
कुछ गुल खिले और हवा में बिखर गए !
उनक़ी ख़ुशबुओं को ना पकड़ ,
वे फ़िज़ा में घुल गए।

ज़िंदगी के सफ़र में लोग आते हैं।
कुछ दूर कुछ साथ निभाते हैं।
कुछ क़ाफ़िले में शामिल हो
दूर तलक़ जातें हैं।
कुछ मुस्कान और कुछ
आँसुओं के सबब बन जातें हैं।
कुछ ख़्वाबों में बस कर
रह जातें हैं।

जिस रौशनी को
हम खोज रहें हैं।
वह तो है हमारे अंदर।
हम सब हैं,
चमकते-दमकते सितारें
इस ख़ूबसूरत काया
के अंदर।

ॐ
ध्वनियाँ मानो तो शोर हैं,
जानो तो संगीत हैं।
नाद साधना हैं।
मंत्र हैं।
ॐ है हर ध्वनि का आधार।
ध्वनियों को ज्ञान से सजा दो,
तो ध्वनियाँ मंत्र कहलातीं हैं।
इन मंत्रों में माधुर्य, सुर,
ताल, लय मिला दो
तो संगीत बन जातीं हैं।
जो रूह में गूंज आध्यात्म
की राहें खोलतीं है।
ब्रह्मांड का हर आयाम
खोलतीं हैं।
ऊपरवाले को पाने का
मार्ग खोलतीं हैं।

चाँद झुका,
खुले वातायन से
झाँक मुस्कुराया।
बोला, हमें लगता था
हम हीं अकेले दमकते हैं।
यहाँ तो और भी है,
कोई तनहा, तन्हाई
में मुस्कुरा रहा है।

नज़रें झुका कर,
उठा कर,
पलकें झपका
कर अश्कों को क़ाबू
करना सीखा था, पर
आँखें ऐन वक्त पर
धोखा दे गईं।
जब आँखों को आँखें दिखाईं,
जवाब मिला
हमारी नहीं जज़्बातों
की ख़ता है।

ज़िंदगी ने कहा,
ध्यान से पढ़ो मेरा सबक़ ।
ये नसीहत
हमेशा काम आएँगे।
वरना इम्तहान
बार-बार होता रहेगा।
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