Topic by YourQuote

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रूह में कुछ जन्म ले रहा है…धुँधला सा ख़ामोशी से..
कोई ख़ामोश ख़्वाब, अधूरी दुआ, या कोई नया सफ़र—
❧ ❦ ☙
जो अभी नाजुक है,
पर वक़्त के साथ मुकम्मल होगा।
– Dr Rekha Rani


कल की छुई-मुई बेटियां कब बड़ी होकर घर-परिवार की जिम्मेदारी कंधों पर उठा लेती हैं, पता ही नहीं चलता। डॉ. रेखा सहाय की यह मर्मस्पर्शी कविता बेटियों के त्याग, ममता और उनके अटूट साहस को एक भावपूर्ण सलाम है। जरूर पढ़ें और साझा करें।
महिला दिवस का मतलब ये नहीं
कि नारी हो जाएं सर्वशक्तिमान।
और उसके सायों में लोग
बेज़ार हो ढूँढें अपना सम्मान।
ना ये है कोई ताक़त की जंग,
ना बाज़ुओं का इम्तिहान,
ये तो उन हाथों के लिए है दुआ,
जिन्हें सच में चाहिए सहारा और मान।
जो कमज़ोर, डरी और थकी हैं,
उनके लिए ये है रोशनी का पैग़ाम,
ताकि मिले बराबरी का हक़,
मोहब्बत, इज़्ज़त और आराम।
महिला दिवस का मतलब ये नहीं
कि महिलाएँ हो जाए सर्वशक्तिमान,
और उसके सायों में लोग
ढूँढें अपना सम्मान।



Topic by YQ


झोंके ने मुआफ़ी माँग भी ली तो क्या,
दरख़्त से टूटे पत्तों ने कहा —
हम तो बिखर ही गए यहाँ।
ज़ख़्म भर भी जाएँ तो क्या,
निशान तो रहते हैं सदा।
कौन सुने अनकही दिल की दास्ताँ,
हर कोई अपने आप में गुम यहाँ।
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