बिगड़ी बातों को बनाना ,
नाराज़गी को संभालना,
तभी होता हैं जब
बिगाड़ने या नाराज़ होने वाला चाहे .
यह छोटी पर गूढ़ बात
बड़ी देर से समझ आई….
कि एक हाथ से ताली नहीं बजती.
बिगड़ी बातों को बनाना ,
नाराज़गी को संभालना,
तभी होता हैं जब
बिगाड़ने या नाराज़ होने वाला चाहे .
यह छोटी पर गूढ़ बात
बड़ी देर से समझ आई….
कि एक हाथ से ताली नहीं बजती.
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Thank you 😊
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बिल्कुल ठीक कहा रेखा जी आपने ।
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धन्यवाद जितेंद्र जी .
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बिल्कुल सही कहा। चाहने से ही सबकुछ सम्भव है।
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शुक्रिया मधुसूदन.
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