ज़िंदगी के रंग – 101 (श्रद्धांजलि/ Tribute)

सूरज, चाँद

सब हैं अपनी जगह पर .

पर टूट गया कोई सितारा।

अंधेरी रातों में, सन्नाटों में ,

छोड़ गया

घाव गहरे।

खो गई

बूँद जैसे लहरों में सागर के।

महसूस किया वह श्वास……

आख़िरी साँसों की लहरें।

आँखें नम और

साँसे हैं धुआँ धुआँ।

होगा सहर …सवेरा ……?

निकलेगा क्या सूरज ?

इंतज़ार है।

बेहद अपने को खोने के बाद, कभी कभी कुछ कहना या लिखना दुष्कर और कठिन हो जाता है. ऐसे में फिर से लिखने का हौसला देने के लिए स्नेह और दिल से आभार …..

45 thoughts on “ज़िंदगी के रंग – 101 (श्रद्धांजलि/ Tribute)

  1. बिल्कुल सही कहा।बेहतरीन अभिव्यक्ति।

    अभी अभी था हँसता चोला
    अभी अभी गुमनाम
    कैसी है दुनियाँ
    कितनी बेबस है ये अपनी जान।

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  2. रेखा जी, कोई हमदर्द हमारे ग़म को बाँट ले तो भी ज़रूरी नहीं कि वो ग़म घट जाए । मैंने तो अपने ग़मों के तजुर्बात से यही जाना है कि – इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना, दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना ।

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    1. शब्दों अल्फ़ाज़ो को सम्भाला
फिर भी ना जाने कब वो मायूसी भरी
कविताएँ बन गईं.
शायद दर्दे ए दिल बेक़ाबू हो गया था .
लेकिन सच तो यह है
ज़िंदगी !
      तुम्हारे दिए दर्दे ए सबक़
कविता बना तुम्हें हीं लौटा रहीं हूँ .


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