Rules of love – Rule 32


Nothing should stand between you and God.

No imams, priests, rabbits or any other custodians of moral or religious leadership.

Not spiritual masters and not even your faith. Believe in your values and your rules, but never lord them over others.

If you keep breaking other people’s hearts, whatever religious duty you perform is no good. Stay away from all sorts of idolatry, for they will blur your vision.

Let God and only God be your guide. Learn the Truth, my friend, but be careful not to make a fetish out of your truths.

Shams Tabriz spiritual instructor of Rumi ❤️❤️

ज़िन्दगी के रंग -107

A 1946 love story: After 72 years of separation, 90-year-old man meets first wife-  An eight-month love story. After Narayanan Nambiar and Sarada were split in 1946, their children from second marriages decided to set up a meeting for the two.

English News – https://www.thenewsminute.com/article/1946-love-story-after-72-years-separation-90-year-old-man-meets-first-wife-94069

मेरी एक पुरानी सच्ची कहानी इसी खबर की तरह अजीब सी विङंबना पर आधारित है। जिसे यहाँ दे रहीं हूँ।

वह हमारे घर के पीछे रहती थी। वहाँ पर कुछ कच्ची झोपङियाँ थीं। वह वहीं रहती थी। कुछ घरों में काम करती थी। दूध भी बेचती थी। लंबी ,पतली, श्यामल रंग, तीखे नयन नक्श अौर थोङी उम्र दराज़। उसका चेहरा सौंदर्यपुर्ण, सलोना अौर नमकीन  था। उसकी बस्ती में जरुर उसे सब रुपवती मानते होंगे।
जब भी मैं उधर से गुजरती । वह मीठी सी मुस्कान बिखेरती मिल जाती। उसकी मुस्कान में कुछ खास बात थी। मोनालिसा की तरह कुछ रहस्यमयी , उदास, दर्द भरी हलकी सी हँसी हमेशा उसके होठों पर खेलती रहती। एक बार उसे खिलखिला कर हँसते देखा तब लगा मोनालिसा की मुस्कान मेरे लेखक मन की कल्पना है।
एक दिन उसकी झोपङी के सामने से गुजर रही थी। वह बाहर हीं खङी थी। मुझे देखते हँस पङी अौर मजाक से बोल पङी – मेरे घर आ रही हो क्या? मैं उसका मन रखने के लिये उसके झोपङी के द्वार पर खङे-खङे उससे बातें करने लगी। उसका घर बेहद साफ-सुथरा, आईने की तरह चमक रहा था। मिट्टी की झोपङी इतनी साफ अौर व्यवस्थित देख मैं हैरान थी। यह कहानी झाखण्ङ की है। यहाँ के आदिवासियों का रहन-सहन वास्तव में बङा साफ-सुथरा होता है। झोपङी के बाहर भी कलात्मक चित्र गोबर अौर मिट्टी से बने होतें हैं।

एक दिन, सुबह के समय वह अचानक अपने पति के साथ मेरे घर पहुँच गई। दोनों के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें थीं। पति के अधपके बाल बिखरे थे। उसके कपङे मैले-कुचैले थे। शायद उम्र में उससे कुछ ज्यादा हीं बङा था। पर वह बिलकुल साफ-सुथरी थी। तेल लगे काले बाल सलिके से बंधे थे। बहुत रोकने पर भी दोनों कुर्सी पर ना बैठ,  सामने ज़मीन पर बैठ गये।

पता चला, उनका बैंक पासबुक उसके पति से कहीं खो गया था। वह बङी परेशान सी मुझ से पूछ बैठी -“ अब क्या होगा? पैसे मिलेंगे या नहीं ?” दोनों भयभीत थे। उन्हें लग रहा था, अब बैंक से पैसे नहीं मिलेगें। वह पति से नाराज़ थी। उसकी अोर इंगित कर बोलने लगी – “देखो ना, बूढे ने ना जाने “बेंक का किताब” कहाँ गिरा दिया है।” जब उसे समझ आया, पैसे अौर पासबुक दोनों बैंक जा कर बात करने से मिल जायेंगें, तब उसके चेहरे पर वही पुरानी , चिरपरिचित मोनालिसा सी मुस्कान खेलने लगी।
एक दिन मैं उसके घर के सामने से गुजर रही थी। पर उसका कहीं पता नहीं था। मेरे मन में ख्याल आया, शायद काम पर गई होगी। तभी वह सामने एक पेंङ के नीचे दिखी। उसने नज़रें ऊपर आसमान की अोर थीं, जैसे ऊपरवाले से बातें कर रही हौ। उसकी हमेशा हँसती आँखोँ में आँसू भरे थे। मैं ने हङबङा कर पूछा – “ क्या हुआ? रो क्यों रही हो?” तब उसने अपने जिंदगी की विचित्र कहानी सुनाई।
***

बेहद कम उम्र में उसका बाल विवाह किसी छोटे अौर पिछङे गाँव में  हुआ था। कम वयस में दो बच्चे भी हो गये। वह पति अौर परिवार के साथ सुखी थी। उसके रुप, गुण अौर व्यवहार की हर जगह चर्चा अौर प्रशंसा होती थी। उसे जिंदगी से कोई शिकायत नहीं थी।

एक दिन उसका महुआ अौर ताङी का प्रेमी (शराबी) पति उसे जल्दी-जल्दी तैयार करा कर अपने साथ कचहरी ले गया। वहां एक अधेङ व्यक्ति को दिखा कर कहा – अब तुम इसके साथ रहोगी। मैं ने तुम्हें बेच दिया है। मुझे जमीन खरीदने के लिये पैसे चाहिये थे।“ वह जब रो -रो कर ऐसा ना करने की याचना करने लगी। तब पति ने बताया, यह काम कचहरी में लिखित हुआ है। अब कुछ नहीं हो सकता है।
उसकी कहानी सुन कर , मुझे जैसे बिजली का झटका लगा। मैं अविश्वाश से, चकित नेत्रों से उसे देखते हुए बोलने लगी – “ यह तो नाजायज़ है। तुम गाय-बकरी नहीं हो। तुम उसकी जायदाद भी  नहीं । जो दाव पर लगा दे या तुम्हारा सौदा कर दे। उसने तुम से झूठ कहा है। यह सब आज़ के समय के लिये कलकं है।”
उसने बङी ठंङी आवाज़ में कहा – “ तब मैं कम उम्र की थी। यह सब मालूम नहीं था। जब वह मुझे पैसे के लिये बेच सकता है। तब उसकी बातों का क्या मोल है। अब सब समझती हूँ। पर यह सब तो पुरानी बात हो गई।”

मैं अभी भी सदमें से बाहर नहीं आई थी। गुस्से से मेरा रक्त उबल रहा था। आक्रोश से मैं ने उससे पूछ लिया – “ फिर क्यों रो रही हो ऐसे नीच व्यक्ति के लिये?”

उसने सर्द आवाज़ में जवाब दिया – “ आज सुबह लंबी बीमारी के बाद उसकी यानि मेरे पहले पति की मृत्यु हो गई। उसके परिवार के लोगों ने खबर किया है । पर तुम्हीं बताअो, क्या मैं विधवा हूँ? मेरा बूढा तो अभी जिंदा है। मैं इस बात लिये नहीं रो रहीं हूँ। उसकी मौत की बात से मेरे बूढे ने कहा, अगर मैं चाहूँ, तो विधवा नियम पालन कर सकती हूँ। मैं रो रही हूँ , कि मैं किसके लिये पत्नी धर्म निभाऊँ? मैंने तो दोनों के साथ ईमानदारी से अपना धर्म निभाया है।

उसकी बङी-बङी आँखो में आँसू के साथ प्रश़्न चिंह थे। पर चेहरे पर वही पुरानी मोनालिसा की रहस्यमयी , उदास, दर्द भरी हलकी सी हँसी , जो हमेशा उसके होठों पर रहती थी।

संजीदा सागर

गहरे, संजीदा सागर से

ज़िंदगी का गहरा, गूढ़ सबक़

सीखा … ….,

तेज़ उठती -गिरतीं लहरें

अपने पास आने वालों को

गिरातीं तो हैं

पर उठना ख़ुद हीं

पड़ता है.

ज़िन्दगी के जंग में

भी यही फ़लसफ़ा काम आता है .