Pain- Quote

Even when you tear its petals off one after another,

the rose keeps laughing and doesn’t bend in pain.

“Why should I be afflicted because of a thorn?
It is the thorn which taught me how to laugh.”

Whatever you lost through fate,
be certain that it saved you from pain.

Rumi

Happiness

When I Asked God for Strength
He Gave Me Difficult Situations to Face
When I asked God for intelligence
He Gave Me Puzzles to Solve.
When I Asked God for Happiness
He Showed Me Some Unhappy People
When I Asked God for Wealth
He Showed Me How to Work Hard
When I Asked God for Favors
He Showed Me Opportunities to Work Hard
When I Asked God for Peace
He Showed Me How to Help Others
God Gave Me Nothing I Wanted
He Gave Me Everything I Needed.

Swami Vivekanand

Be grateful! – Quote

Whatever happens to you,

don’t fall in despair.

Even if all the doors are closed,

a secret path will be there for you that no one knows.

You can’t see it yet but so many paradises are at the end of this path.

Be grateful! It is easy to thank after obtaining what you want, thank before having what you want.

~ Shams Tabrizi

धोखा -कविता Trust

It takes years to build up trust, only seconds to destroy it. But betrayal has its positive side too.

“Out of suffering have emerged the strongest souls; the most massive characters are seared with scars.”
― Kahlil Gibran

 

 किसी ने धोखा क्या दिया ,

आंखे खुल गई।

                                गैरों अौर अपनों की पहचान मिल गई।

आँखों में धूल  झोंकी ,

     दुनिया और बेहतर नजर आने लगी………..

 

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वह कौन थी? ( अद्भुत अनुभव )

28 दिसंबर 2014 की सुबह थी। बीते हुए क्रिसमस की खुमारी थी। यहाँ-वहाँ सजावटी सितारे और क्रिसमस-ट्री नज़र आ रहे थे। आनेवाले नव वर्ष का उत्साह माहौल में छाया था। खुशनुमा गुलाबी जाड़ा पुणे के मौसम को खुशगवार बना रहा था। मैं, मेरे पति और पुत्री पुणे से मुंबई जाने के लिए टैक्सी से निकले थे। हल्की ठंड की वजह से हमें चाय पीने की इच्छा हुई। टैक्सी ड्राईवर ने पुणे के महात्मा गाँधी रोड के करीब एक ईरानी रेस्टरेंट के चाय-मस्के की बड़ी तारीफ की। हमारे कहने पर वह हमें वहाँ ले गया।

यह सैन्य क्षेत्र था।यहाँ चारो ओर बड़े-बड़े हरे-भरे पेड़ थे। सड़क के किनारे करिने से पौधे लगे थे। यहाँ की हरियाली भरी खूबसूरती और शांत वातावरण बड़ी अच्छा लगा। पर टैक्सी रुकते ही पास में एक भिखारिन नज़र आई। गंदे ऊँचे स्कर्ट और लटकी हुई शर्ट के ऊपर फटी पुरानी स्वेटर और बिखरे बाल में बड़ी अजीब लग रही थी। बेहद दुबली पतली थी। शायद पागल भी थी। सड़क के किनारे, रेस्टोरेन्ट के बगल में खड़ी थी। उसने नज़र उठा कर हमारी ओर देखा। मैं उससे बचते हुए तेज़ी से दूसरी तरफ से घूमते हुए रेस्टोरेन्ट की तरफ बढ़ी। वह भी शायद जल्दी में थी। अपनी धुन में वह दूसरी ओर बढ़ गई। मैं ने चैन की साँस ली। सड़कों पर ऐसे भीख माँगनेवाले लोग मुझे असहज बना देते हैं। पता नहीं यह भिक्षावृति कब हमारे देश से ख़त्म होगी। किसी भी खूबसूरत जगह पर ये एक बदनुमा धब्बे की तरह लगते हैं। मेरी समझ में नहीं आता है कि इन्हे भीख दे कर इस प्रवृति को बढ़ावा देना चाहिए या डांट कर हटा देना चाहिए?

रेस्टोरेन्ट के अंदर जा कर मैं उस भिखारिन को भूल गई। ईरानी रेस्टोरेन्ट की चाय सचमुच बडी अच्छी थी। मन खुश हो गया। पूरा रेस्टोरेन्ट चाय पीने वाले लोगों से भरा था। गर्मा-गर्म चाय और साथ मेँ मस्का बड़ा लाजवाब था। पर बाहर निकलते ही फिर वही औरत नज़र आई। मैं तेज़ी से कार की ओर बढ़ी। शायद मैं उसे अनदेखा करना चाहती थी।

तभी उसने शुद्ध अँग्रेजी मेँ मुझे आवाज़ दी और कहा- “मैम, मैं बहुत भूखी हूँ। मुझे कुछ पैसे मिल जाते तो मस्का खरीद लेती। मेरे पास चाय है।“ उसने अपने हाथ मे पकड़ी हुई प्लास्टिक की गंदी और टेढ़ी-मेढ़ी बोतल दिखलाई। उसमें चाय थी। उसने फिर शालीनता से सलीकेदार भाषा में अपनी बात दोहराई। मैं अवाक उसे देख रही थी। यह पागल सी दिखनेवाली भिखारिन कौन है? इसकी बोली और व्यवहार तो कुछ और ही बता रही थी। वह पढ़ें- लिखी, किसी अच्छे परिवार की तरह व्यवहार कर रही थी।

मैंने पीछे से आ रहे अपने पति  की ओर देखा अौर उस महिला को कुछ पैसे देने का इशारा किया। उन्होने पॉकेट से कुछ रुपये निकाल कर उस महिला को दे दिए। उस महिला ने मुस्कुरा कर मृदु स्वर में धन्यवाद दिया। फिर मेरी ओर देखा और मेरे खुले बालों की प्रशंसा करते हुए नव वर्ष की शुभ कामना दी और कहा –“हैप्पी न्यु ईयर  !! टेक केयर ….अपना ख्याल रखना।”

कार मेँ बैठते हुए मैंने अपना आश्चर्य प्रकट किया-“ इतनी सलीकेदार महिला इस हालत में क्यों है?” तब टैक्सी ड्राईवर ने बताया कि वह महिला किसी जमाने के वहाँ के अति समृद्ध, डर्बी किंग की पत्नी है। अति-धनी, जुआरी और रेस के शौकीन पति की वजह से उसका यह हश्र हुआ। जुआ सिर्फ महाभारत काल का कलंक नहीं है। आज भी कई निर्दोष परिवारों को इसका मुल्य चुकाना पड़ा है।

उस दिन पहली बार भिक्षावृति का औचित्य समझ आया और लगा कि ऐसे लोगों को मदद करने पर मन मेँ किसी तरह की दुविधा नहीं होनी चाहिये। दरअसल भिक्षावृति प्राचीन काल से जरूरतमंदों, विद्यार्थियों और संतों के आजीविका का साधन रहा है। पर आज-कल यह एक गलत प्रचलन बन गया है। कुछ बेजरूरत लोगों ने इसे पेशा बना लिया है। 

Source: वह कौन थी? ( अद्भुत अनुभव )

Rusty Heart- quote

Do not let your heart,

get rusty with grief.

and do not stay long with those ….

who are not in the presence.

Rumy

 

 

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बर्न-आउट (एक मनोवैज्ञानिक समस्या)Burn out

Burnout is a state of emotional, mental, and physical exhaustion caused by excessive and prolonged stress. It occurs when you feel overwhelmed, emotionally drained, and unable to meet constant demands.

बर्न-आउट क्या है ?

ज़िंदगी की भागम-भाग, तनाव, काम की अधिकता अक्सर हमे शारीरिक और मानसिक रूप से थका देती है। जब यह थकान और परेशानी काफी ऊंचे स्तर तक चला जाता है तब ऐसा लगने लगता है जैसे जिंदगी की सामान्य समस्याओ को भी सुलझाना कठिन हो गया है। बर्न-आउट मानसिक या शारीरिक कारणो से हो सकता है। यह लंबे दवाब तथा थकान का परिणाम होता है।बर्न-आउट कार्य-संबंधी या व्यक्तिगत या दोनों कारणो से हो सकता है। ऐसे में मानसिक तनाव व स्ट्रैस बढ़ जाता है। स्वभाव में चिड़चिड़Iपन बढ़ जाता है। व्यक्ति अपने को ऊर्जा-विहीन, असहाय व दुविधाग्रस्त महसूस करने लगता है।

बर्न-आउट कैसे पहचाने ?
ऐसे मे नकारात्मक सोच ज्यादा बढ़ जाती है। आत्मविश्वास व प्रेरणा मे कमी , अकेलापन, आक्रोश, नशे की लत, जिम्मेदारियो से भागने जैसे व्यवहार बढ़ जाते है। ऐसा व्यक्ति अपना फ्रस्टेशन दूसरों पर उतारने लगता है। ऐसे मे व्यक्ति हमेशा थका-थका व बीमार महसूस करता है। लगातार सिर और मांसपेशिओ मे दर्द, भूख व नींद मे कमी होने लगती है। अपने कार्य मे रुचि मे कमी, हमेशा असफलता का डर, अपना हर दिन बेकार लगने लगता है। ऐसे व्यक्ति दूसरों के साथ जरूरत से ज्यादा कठोर, असहनशील और चिड़चिड़ा हो जाता है। गैस्ट्रिक व ब्लड-प्रेशर का उतार-चढ़ाव असामान्य हो जा सकता है।
ऐसे परिवर्तनो का मतलब है कि अपने शारीरिक व मानसिक कार्य भार को सही तरीके से संभालने की जरूरत है। अगर संभव है तो कार्य-भार को कम कर देना चाहिए। साथ ही अपने लाइफ-स्टाइल को संयमित करना कहिए। अपनी आवश्यकताओ तथा समस्याओं को समझ कर उनका ध्यान रखना चाहिए।

समाधान-
ऐसी समस्याए अक्सर काम को लत (वर्कहोलिक) बना लेने वाले लोगों में ज्यादा पाया जाता है। इसलिए काम के साथ-साथ मनोरंजन, रचनात्मकता, मित्रों और परिवार के साथ समय बिताना भी जरूरी है। जीवन की खुशिया मानसिक तनाव काम करती है। हर काम का ध्येय सिर्फ जीत-हार, जल्दीबाजी या लक्ष्य-प्राप्ति नहीं रखना चाहिए। सकारात्मक सोच और दूसरों को समझने की कोशिश भी आवश्यक है। जिंदगी की परेशानियों और समस्याओं को सही नजरिए से समझना भी जरूरी है। समस्याओं से बचने के बदले उनका सामना करना चाहिए। काल्पनिक दुनिया से हट कर वास्तविकता और जरूरत के मुताबिक कठिनाइयों को सुलझाना चाहिए। कार्य-स्थल पर टीम मे काम करना, अपनी समस्यओं को बताना, नयी जिम्मेदारियों को सीखना भी सहायक होती है। कुछ लोग ‘ना’ नहीं बोल पाने के कारण अपने को काम के भार तले दबा लेते है। ‘ना’कहना सीखना चाहिए।
प्राणायाम, योग, योगनिद्रा, ध्यान, मुद्रा आदि की भी मदद ली जा सकती है। इससे तनावमुक्ति होती है। स्फूर्ति और आत्मविश्वास बढ़ता है। यह पूरे व्यक्तित्व को सकारात्मक और रचनात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। आयुर्वेद मे तुलसी को नर्व-टानिक तथा एंटिस्ट्रैस कहा गया है। अतः इसका भी सेवन लाभदायक हो सकता है,पर गर्भावस्था में बिना सलाह इसे ना लें।

Source: बर्न-आउट ( एक सामान्य मनोवैज्ञानिक समस्या )

Life -quote

Half of life is lost in charming others,

the other half is lost in going

through anxieties caused by others.

Leave this play, you’ve played enough!
~ Rumi

रंगीली ( कहानी )

 

रंगीली और रंजन की जोड़ी नयनाभिराम थे। रंगीली के सौंदर्य में कशिश थी। बड़े-बड़े खूबसूरत नयन, दमकता चेहरा, लंबी – छरहरी देहयिष्टि। लगता था विधाता ने बड़े मनोयोग से गढ़ा था। पर रंजन का व्यक्तित्व उससे भी प्रभावशाली था। लम्बी-चौड़ी, बलशाली काया, काली आँखों में एक अनोखा दर्प , उनके गोद में होती उनकी परी सी सुंदर पुत्री एंजले। अभिजात्यता की अनोखी छाप पूरे परिवार पर थी। उनकी आंग्ल भाषा पर जबर्दस्त पकड़ थी। दोनों के दोनों ऐसी अँग्रेजी बोलते थे। जैसे यह उनकी मातृ भाषा हो। पर जब उतनी ही शुद्ध संस्कृत बोलना- पढ़ना शुरू करते। तब देखने और सुनने वाले हक्के बक्के रह जाते।

उनके कम उम्र और सात्विक रहन-सहन देख लोग अक्सर सोंच में पड़ जाते। इतनी कम उम्र का यह राजा-रानी सा जोड़ा इस आश्रम में क्या कर रहा है? जहाँ वृद्धों और परिवार के अवांछनीय परित्याक्तों की भीड़ है। अनेकों धनी, गण्यमान्य और विदेशी शिष्यों की भीड़ इस जोड़े के निष्ठा से प्रभावित हो आश्रम से जुटने लगी थी । आश्रम के विदेशी ब्रांचो में गुरु महाराज इन दोनों को अक्सर भेजते रहते थे। गुरु महाराज को मालूम था कि ये विदेशों में अपनी प्रभावशाली अँग्रेजी से लोगों तक बखूबी भारतीय दर्शन को पहुँचा और बता सकते हैं। सचमुच शांती की खोज में भटकते विदेशी भक्तों की झड़ी आश्रम में लग गई थी।

दोनों को देख कर लगता जैसे कोई खूबसूरत ग्रीक सौंदर्य के देवी-देवता की जोड़ी हो। बड़ी मेहनत और लगन से दोनों मंदिर का काम करते रहते। उनका मंदिर और गुरु महाराज के प्रति अद्भुत और अनुकरणीय श्रद्धा देख अक्सर गुरु महाराज भी बोल पड़ते –‘ दोनों ने देव योनि में जन्म लिया है। इन पर कान्हा की विशेष कृपा है। इनका जन्मों-जन्म का साथ है।“
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रंजन के पिता थे नगर के सम्मानीय वणिक और अथाह धन के मालिक। अनेक बड़े शहरों में उनके बड़े-बड़े होटल और मकान थे। ढेरो बसें और ट्रक यहाँ से वहाँ सामान और सवारी ढोते थे। जिसकी आड़ में उनका मादक पदार्थों और ड्रग्स का काम भी सुचारु और निर्बाध्य चलता रहता। अपने काले व्यवसाय को अबाध्य रूप से चलाने के लिए शहर के आला अधिकारियों और पुलिस वर्ग से उन्होने दोस्ताना संबंध बना रखे थे। धीरे-धीरे अपने एकलौते पुत्र को भी अपने जैसा व्यवसायपटु बनाने का प्रयास उन्होंने शुरू कर दिया था।

उस दिन शहर में नए पदास्थापित उच्च पुलिस पदाधिकारी के यहाँ उपहार की टोकरियाँ ले जाने का काम उन्होने रंजन को सौपा था। तभी, लगभग आठ- दस वर्ष पहले रंगीली और रंजन पहली बार मिले थे। रंजन ने जैसे हीं उनके ऊँचे द्वार के अंदर अपनी चमकती नई लाल कार बढाई। तभी नौसिखिया, नवयौवना कार चालक, पुलिसपुत्री कहीं जाने के लिए बाहर निकल रही थी। नकचढ़ी रंगीली ने रंजन की नई स्पोर्ट्स कार को पिता के पुलीसिया गाड़ी से रगड़ लगाते हुए आगे बढ़ा लिया था। रंजन का क्रोध भी दुर्वासा से कम नहीं था। पर धक्का मारने वाली के सौंदर्य ने उसके कार के साथ उसके दिल पर भी छाप छोड़ दिया था।

अब बिना पिता के कहे वह गाहे-बगाहे उपहारों के साथ रंगीली के घर पहुँच जाता था। अगर रंगीली से सामना हो जाता। तब रंजन मुस्कुरा कर उससे पुछता – “ आज मेरी कार में धक्का नहीं मारेंगी? रंगीली तिरछी नज़र से उसे देखती, खिलखिलाती हुई निकल जाती। रंजन को लगता जैसे आज उसका जीवन सफल हो गया।

रंजन के पिता ने शायद माजरा भाँप लिया था। पर उन्हें इससे कोई ऐतराज नहीं था। न हिंग लगे ना फिटकिरी और रंग चोखा। इसी बहाने पुत्र व्यवसाय पर ध्यान तो देने लगा। उन्हें सिर्फ पत्नी की ओर से चिंता थी। जो वैरागी बनी हर वक्त पूजा-पाठ, आश्रम और गुरु में व्यस्त रहती। अक्सर घर में झुंड के झुंड साधु – संत कीर्तन करते रहते। कभी नवरात्री का नौ दिन अखंड कीर्तन चलता । कभी राम और कृष्ण का जन्मदिन मनता रहता। सभी किरतनिया दूध, फल, मेवा, फलहारी घृत पकवान और नए वस्त्र पाते रहते। घर शुद्ध घी, कपूर, धूप, हवन और सुगंधित अगरबतियों के खुशबू से तरबतर रहता। अखंड भंडारा का द्वार सभी के लिए खुला रहता।

रंजन के पिता को पत्नी का यह तामझाम पसंद नहीं था। पर वे एक होनहार व्यवसाई की तरह इस में से भी अपना फायदा निकाल लेते थे और सम्मानीय अतिथियों को आमंत्रित करने के इस सुअवसर का भरपूर फ़ायदा उठाते थे। ऐसे ही अवसरों पर रंगीली का परिवार भी आमंत्रित होने लगा। गुरु महाराज के सौम्य व्यक्तित्व से प्रभावित रंगीली के परिवार ने भी उनसे दीक्षा ले ली। अब रंजन और रंगीली की अक्सर भेंट होने लगी। जिससे दोनों की घनिष्ठता बढ़ती गई। अब रंजन के छेड़ने पर रंगीली हँस कर कहती – “ सब तो ठीक है, पर तुम्हारी यह पुजारिन, निरामिष माँ मुझे अपने घर की बहू कभी नहीं बनने देगी।“

पर हुआ इसका उल्टा। हर दिन अपराधियों की चोरी पकड़ने वाले पिता ने रंगीली और रंजन के इस रास-लीला को तत्काल पकड लिया। अपनी 14-15 वर्ष की नासमझ पुत्री की हरकत उन्हें नागवार गुजरी। उन्होंने भी अपना पुलिसवाला दाव-पेंच आजमाया। नतीजन, अचानक उनके तबादले का ऑर्डर आया। सामान बंधा और रातों – रात वे परिवार के साथ दूसरे शहर चले गए। जैसा अक्सर इस उम्र की प्रेम कथा के साथ होता है, वैसे ही इस कमसिन तोता-मैना की अधूरी प्रेम कहानी के साथ भी हुआ। बुद्धिमान पिता ने इस कहानी पर पूर्णविराम लगा दिया।
****

20-21 वर्ष की रंगीली के पिता ने बड़े जतन से होनहार और योग्य दामाद की खोज शुरू की। सबसे पहले वे पहुँचे गुरु महाराज के पास। गुरु महाराज ने रंगीली के जन्म की जानकारी मांगी और जल्दी ही उसकी कुंडली बनाने का आश्वासन दिया। कुंडली बन कर आई। उच्चपद और उच्चकुल वरों के यहाँ हल्दी-अक्षत लगी कुंडली और सुंदर पुत्री की तस्वीरें, अथाह दहेज के आश्वासन के साथ जाने लगीं। पर ना-जाने क्यों कहीं बात हीं नही बन रही थी।

दुखी हो कर वे फिर गुरु आश्रम पहुँचे। उन्हें अपनी सारी व्यथा बताई। गुरु महाराज ने व्यथित और चिंतित पुत्रिजनक के माथे पर अनगिनत चिंता की लकीरें देखीं। तब सांत्वना देते हुए बताया कि उनकी पुत्री की कुंडली के अष्टम घर के भयंकर मांगलिक दोष है। शनि भी लग्न में हैं। सारे ग्रह कुंडली में ऐसे स्थापित हैं कि राहू और केतु के अंदर हैं। अर्थात कालसर्प दोष भी है।

पुलिसिया दावपेंच में पारंगत रंगीली के पिता कुंडली ज्ञान में शून्य थे। अतः उन्होंने गुरु महाराज के चरण पकड़ कर कुछ उपाय जानना चाहा। जीवन भर रुपए की महिमा से हर काम निकालने वाले दुखित पिता ने यहाँ भी ईश्वर को चढ़ावा पहुँचा कर काम निकालना चाहा। गुरु महाराज ने कुपित नज़र से देख कर कहा- “ईश्वर को सिर्फ चढ़ावा से नहीं खुश किया जा सकता है।“ चिंतित पिता ने गुरु महाराज के सामने रुपयों की गड्डियों का ढेर रख दिया। नए निर्माणाधीन मंदिर का पूर्ण व्यय वहन करने का वचन दे डाला और अनुरोध किया कि पुत्री के त्रुटीपुर्ण कुंडली का भी वैसे ही आमूलचूल परिवर्तन कर दें, जैसे वे अक्सर अपराधियों के फाइलों में हेरफेर करते अौर उन्हें बेदाग, कानून की पकड़ से बाहर निकाल देते हैं।

गुरु महाराज ने करुण दृष्टि से उन्हें ऐसे देखा, जैसे माँ, आग की ओर हाथ बढ़ाते अपने अबोध और नासमझ संतान को देखती है। फिर विद्रुप भरी मुस्कान के साथ उन पर नज़र डाली और कहा – “देखिये वत्स, मैं ऐसे काम नहीं करता हूँ। आपकी मनोकामना पूर्ण करनेवाले अनेकों ज्ञानी पंडित मिल जाएँगे। पर कुछ ही समय बाद जब आपकी राजदुलारी सफ़ेद साड़ी में आपके पास वापस लौट आएगी। तब क्या उसका वैधव्यपूर्ण जिंदगी आपकी अंतरात्मा को नहीं कचोटेगी?

 

रंगीली के पिता जैसे नींद से जाग उठे। अपनी नासमझी की माफी मांगते हुए वह कुटिल, कठोर और उच्च ओहदा के अभिमान में डूबा पिता, गुरु महाराज के चरणों में लोट गया। वे आँखों में आँसू भर कर उपाय की याचना करने लगे। गुरु जी ने मृदुल-मधुर स्वर में बताया कि सबसे अच्छा होगा, कुंडली मिला कर विवाह किया जाये। पुत्री के सौभाग्यशाली और सुखी जीवन के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण है। पद, ओहदा, मान सम्मान जैसी बातों से ज्यादा अहमियत रखती है पुत्री का अखंड सौभाग्य।

गुरु महाराज ने उन्हें एक उपयुक्त वर के बारे में भी बताया। जिससे उनकी पुत्री की कुंडली का अच्छा मिलान हो रहा था। वह वर था रंजन। परिवार जाना पहचाना था। ऊपर से गुरु महाराज की आज्ञा भी थी। किसी तरह की शंका की गुंजाईश नहीं थी। पर अभी भी उच्चपद आसीन दामाद अभिलाषी पिता, बेटी के बारे में सशंकित थे। पता नही उनकी ऊँचे पसंदवाली, नखड़ाही पुत्री, जो प्रत्येक भावी योग्य वारों में मीनमेख निकालते रहती थी। उसे व्यवसायी रंजन और उसका अतिधार्मिक परिवार पसंद आयेगा या नहीं? पहले के नासमझ उम्र की प्रेम लीला की बात अलग थी।स्वयं उन्हें भी किसी उच्च पदासीन, उच्च शिक्षित दामाद की बड़ी आकांक्षा थी।

तभी गुरु महाराज ने उनकी रही-सही चिंता भी दूर कर दी। गुरु महाराज ने उनसे कहा –“ मुझे लगता है, रंगीली और रंजन का विवाह, उनका प्रारब्ध है। अतः मैं उन दोनों से स्वयं बात करना चाहता हूँ। आगे ईश्वर इच्छा। अगले दिन सुबह शुभ पुष्य नक्षत्र के समय भावी वर वधू गुरु महाराज के समक्ष आए। एकांत कक्ष में मंत्रणा आरंभ हुई। गुरु महाराज ने बताया कि उनकी दिव्य दृष्टि से उन्हें संकेत मिल रहें हैं कि रंगीली और रंजन एक दूसरे के लिए बने हैं। दोनों का जन्मों – जन्म का बंधन है। फिर उन्हों ने अर्ध खुले नयनों से दोनों को ऐसे देखा जैसे ध्यान में डूबे हों। फिर अचानक उन पर प्रश्नों की झड़ी सी लगा दी – ‘ बच्चों क्या तुम्हारा कभी एक दूसरे की ओर ध्यान नहीं गया? तुम दोनों को आपसी प्रेम का आभास नहीं हुआ? तुम्हे तो ईश्वर ने मिलाया है। हाँ, कुंडली के कुछ दोषों को दूर करने के लिए किसी मंदिर में कार सेवा करने की जरूरत है।

रंगीली और रंजन को अपनी पुराना प्रणय याद आ गया। सचमुच ईश्वर किसी प्रयोजन से बारंबार दोनों को आमने –सामने ला रहें हैं क्या? दोनों गुरु महिमा से अभिभूत हो गए। तुरंत उनके चारणों में झुक मौन सहमती दे दी। दोनों के परिवार में खुशियों की लहर दौड़ गई। तत्काल वहीं के वहीं गुरु महाराज के छत्रछाया में दोनों की सगाई करा दी गई।

कुंडली के क्रूर ग्रह, राहू और केतू की शांती के लिए गुरु जी ने सुझाव दिया – “शिवरात्री के दिन किसी शिव मंदिर में रंगीली और रंजन से काल सर्प पूजान करवाना होगा। आंध्र प्रदेश के श्री कालहस्ती मंदिर, या भगवान शिव के बारह ज्योतृलिंगों में कहीं ही इस पुजन को कराया जा सकता है।“

आँखें बंद कर थोड़े देर के मौन के बाद गुरु जी ने नेत्र खोले। सभी को अपनी ओर देखता पा कर उनके चेहरे पर मधुर मुस्कान छा गई। हँस कर उन्हों ने पुनः कहा – आप लोग चिंतित ना हों। ईश्वर तो हर जगह विद्यमान है। आप किसी भी मंदिर में यह पूजा करवा सकते है। चाहें तो यहाँ भी पूजा हो सकती है। यह मंदिर भी आपका हीं है। यहाँ तो मैं स्वयं सर्वोत्तम विधि से पूजा करवा दूंगा।“ मंदिर में भोग का समय हो रहा था। गुरु महाराज उठ कर अपने पूजा कार्य में व्यस्त हो गए। रंगीली और रंजन का परिवार एक साथ माथा से माथा मिला कर काल सर्प पूजा कहाँ हो इसकी मंत्रणा करने लगे।

दोनों नव सगाई जोड़ा बड़े आम्र वृक्ष के ओट में अपने पुराने बचकाने प्रेम की याद में डूब गया। हमेशा मौन की चादर में लिपटी रहनेवाली रंजन की माँ ने पहली बार मुँह खोला- “ देखिये, गुरु महाराज हमलोगों के शुभचिंतक है। उन्हें किसी प्रकार का लालच नहीं है। वर्ना वे हमें अन्य मंदिरों के बारे में क्यों बताते? मेरा विचार है, पूजा इस मंदिर में गुरु जी से करवाना उचित होगा। बड़े-बड़े मंदिरों में पुजारी कम समय में आधे-अधूरे विधान से पूजा करवा देंगे और हम समझ भी नहीं सकेंगे।“

नई समधिन के सौंदर्य पर रीझे रंगीली के रसिक पिता बड़े देर से उनसे बातें करने का अवसर खोज रहे थे। इस स्वर्ण अवसर का उन्होंने तत्काल लाभ उठाया और तुरंत अपनी सहमती दे दी। गुरु जी की शालीनता और निस्वार्थता से सभी अभिभूत हो गए। फिर तो बड़ी तेज़ी से घटनाक्रम ठोस रूप लेता गया। विवाह आश्रम के मंदिर में हुआ। उस के बाद नव युगल जोड़े ने अपना मधुयामिनी अर्थात हनीमून भी आश्रम में ही मनाया।

दोनों परिवारों की विपुल धन राशी के समुचित उपयोग का ध्यान रखते हुए नव विवाहित जोड़े की लंबी विदेश मधुयामिनी यात्रा हुई। लगभग एक महीने बाद दोनों उपहारों से लदे घर वापस लौटे। विदेश में उनका ज्यादा समय गुरु निर्देशानुसार विभिन्न आश्रमों में बीता। अतिधर्मभीरु रंजन अपनी माँ की तरह अति धार्मिक था। शौकीन और पिता की दुलारी पुत्री रंगीली, प्रणय क्षणों के लिए तरस कर रह गई।

रंगीली ने अपने और अपने अल्पशिक्षित पति की सोच-समझ में जमीन आसमान का अंतर देख हैरान थी। हनीमून की खूबसूरत यात्रा को उसके पति ने धार्मिक तीर्थयात्रा में बदल दिया था। पर संध्या होते रंजन अक्सर गायब हो जाता था। एक दिन वह भी रंजन के पीछे-पीछे चल दी। पास के बार में उसने रंजन को मदिरा और बार बाला के साथ प्रेममय रूप में देख, वह सन्न रह गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि रंजन का कौन सा रूप सच्चा है।

विदेश से लौटने तक दोनों में अनेकों बार नोक-झोंक हो चुका था। दोनों अपने ठंढे मधुयामिनी से वापस लौटे। रंगीली उदास और परेशान थी। उनके साथ में आया आश्रम के विदेशी शाखाओं में नए बने शिष्यों की लंबी सूची। जिसने सभी में खुशियाँ भर दी। किसी का ध्यान रंगीली की उदासी पर नहीं गया।

विदेशी शिष्यों की संख्या बढ़ने से रंजन और रंगीली की जिम्मेदारियाँ बढ़ गई थीं। अतः दोनों अपना काफी समय आश्रम में देने लगे। साल बितते ना बितते दोनों माता-पिता बन गए। प्यारी-प्यारी पुत्री एंजेल पूरे आश्रम और रंजन – रंगीली के पूरे परिवार का खिलौना थी। गुरु महाराज के असीम कृपा से दोनों परिवार कृतज्ञ था।

एक दिन, जब दुखित और व्यथित रंगीली ने गुरु महाराज से रंजन के विवेकहीन चरित्र और व्यवहार के बारे में बताया, तब उन्होंने उसे समझाया कि यह सब उसके कुंडलीजनित दोषों के कारण हो रहा है। उन्हों ने पहले ही बताया मंदिर में कार सेवा से दोष दूर होगा।अब रंजन और रंगीली, दोनों अब लगभग आश्रमवासी हो गए थे।रंगीली के पिता भी अब धीरे-धीरे उच्चपदासीन दामाद के ना मिलने के क्षोभ और दुख से बाहर आने लगे थे।
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शाम का समय था। मौसम बड़ा खुशनुमा था। रिमझिम वर्षा हो रही थी। चारो ओर हरीतिमा थी। हरियाली की चादर पर, पास लगी रातरानी की बेल ने भीनी- भीनी खुशबू बिखेर दी थी। सामने बड़े से बगीचे में रंग बिरंगे फूल आषाढ़ महीने के मंद समीर में झूम रहे थे। आश्रम का पालतू मयूर आसमान में छाए बादल और रिमझिम फुहार देख कर अपने पंख फैलाये नाच रहा था। रंजन और रंगीली अपनी बेटी और पूरे परिवार के साथ आश्रम में अपनी छोटी कुटियारूपी कौटेज के बरामदे में गरम चाय की चुसकियों और गर्मागर्म पकौड़ियों के साथ मौसम का मज़ा ले रहे थे। पाँच वर्ष की एंजेल खेल-खेल में अपने पिता के अति मूल्यवान मोबाईल से नृत्यरत मयूर की तस्वीरें खींच रही थी।

“ क्या जीवन इससे ज्यादा सुंदर और सुखमय हो सकता है? – रंजन ने मुस्कुरा कर पूछा। थोड़ा रुक कर उसने माता-पिता, सास-स्वसुर और अपनी पत्नी पर नज़र डाली और कहा – “कल गुरु पूर्णिमा है। मैंने गुरु जी के लिए स्वर्ण मुकुट और नए वस्त्र बनवाए हैं। मुझे लगता है, कल ब्रह्म मुहूर्त में हम सभी को उन्हें उपहार दे कर आशीर्वाद ले लेना चाहिए। खुशहाल और संतुष्ट परिवार ने स्वीकृती दे दी। सुबह-सुबह स्नान कर शुद्ध और सात्विक मन से सारा परिवार गुरु महाराज के कक्ष के बाहर पहुंचा। द्वार सदा की तरह खुला था। भारी सुनहरा पर्दा द्वार पर झूल रहा था। पूर्व से उदित होते सूर्य की सुनहरी किरणें आषाढ़ पूर्णिमा की भोर को और पावन बना रहीं थीं। कमरे से धूप की खुशबू और अगरबत्ती की ध्रूमरेखा बाहर आ रही थीं। थोड़ी दूर पर बने मंदिर से घण्टियों की मधुर ध्वनी और शंख की आवाज़ आ रही थी।

गुरु जी के कुटिया के आस-पास पूर्ण शांती थी। दरअसल बहुत कम लोगों को यहाँ तक आने की अनुमति थी। पर रंजन और रंगीली के लिए गुरु जी के द्वार हमेशा खुले रहते थे। अतः दोनों बेझिझक आगे बढ़े। तभी, अंदर से आती किसी की खिलखिलाने और गुरु जी के ठहाके की आवाज़ सुनकर आधा हटा पर्दा रंजन हाथों में अटका रह गया। पर्दे की ओट से पूरे परिवार ने देखा, बिस्तर पर गुरु जी की बाँहों में उनकी निकटतम शिष्या मेनका हँस कर पूछ रही थी – यह सब इतनी सरलता से आपने कैसे किया?

गुरु जी अपनी अधपकी दाढ़ी सहलाते हुए कह रहे थे – “रंजन और रंगीली के बालपन के प्रणयकेली पर तभी मेरे नज़र पड़ गई थी। इतने वर्षों बाद सही मौका मिलते ही, सात जन्मों का बंधन बता कर उसे मैंने भंजा लिया। आज ये दोनों मेरे लिए सोने की अंडा देनेवाले मुर्गी है। देखती हो, इनकी वजह से मेरे आश्रम में स्वर्ण और धन वृष्टि हो रही है। मेनका तकिये पर टिक, अधलेटी हो कर पूछ रही थी – उन दोनों की कुंडलियाँ कैसे इतनी अच्छी मिल गई। गुरु जी ने एक आँख मारते हुए कहा – “वह तो मेरे बाएँ हाथ का खेल है मेनका !!!सब नकली है।

रंजन और रंगीली को लगा जैसे वे गश खा कर गिर जाएँगे। रंजन की माँ के आँखों से गुरु महिमा धुल कर बह रही थी। दोनों के पिता द्वय की जोड़ी हक्की-बक्की सोंच रहे – क्या उनसे भी धूर्त कोई हो सकता है? जीवन भर इतने दाव-पेंच करते बीता और आज ईश्वर जैसे उन्हें दिखा रहें हों – सौ चोट सुनार की और एक चोट लोहार की। ईश्वर के एक ही चोट ने उन्हें उनके सारे कुकर्मों का जवाब सूद समेत दे दिया था। रंगीली के पिता के नेत्रों के सामने उन योग्य, उच्चपद, उच्च शिक्षित वरों का चेहरा नाचने लगा, जो उनकी प्राणप्यारी सुंदरी पुत्री से विवाह के लिए तत्पर थे।

तभी खटके की आवाज़ से सारे लोग और गुरु जी चौंक गए। नन्ही एंजेल ने खेल-खेल में अपने पिता के मोबाइल से एक के बाद एक ना जाने कितनी तस्वीरें प्रणयरत शिष्या-गुरु के खींच लिए थे।

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Source

कलाकार- कविता Playing with the Placards

Editorial of The Indian Express  April 26, 2017

It is one of actor Nawazuddin Siddiqui’s shortest, simplest and strongest performances. Appearing in a video just over one minute in length, the actor holds up a series of placards; these read, in succession: “I got a DNA test done. The result showed I was 16.66 per cent Hindu, 16.66 per cent Muslim…”, covering Sikhism, Christianity, Buddhism and world religions too. With each placard, Siddiqui wears stereotypical “markers” — a Hindu caste daub, a Muslim sherwani-topi, a Sikh turban, Buddhist robes. At the end, a placard concludes: “When I discovered my soul, I found that I am a 100 per cent artist”. Saying no lines, Nawazuddin’s video says a lot, for it speaks against power at several levels.

बिना बोले,

 सब कुछ,

बोलना भी एक कला है।

हम झगङ रहे हैं,

जात-धर्म, रंग , देश , सीमा……..

जैसी बातों के लिये।

क्यों एक अच्छे इंसान के रुप,

में जी नहीं सकते  हम ?

News courtesy  The Indian Express, image from internet.