पापा की गर्ल फ्रेंड (कहानी ) 

 

                     वीणा  अपनी बीमार सहेली से मिल कर वापस लौट रही थी. वह अस्पताल के कारीडोर से गुजर रही थी. तभी उसकी नज़र सामने  के अधखुले द्वार से, कमरे के अंदर चली  गई.  नर्स  द्वार खोल कर बाहर निकल रही थी. बिस्तर पर लेटे बीमार का चेहरा  परिचित लगा. वह आगे बढ़ गई. फ़िर अचानक ठिठक कर रुक गई. दो पल कुछ सोचती रही. फ़िर पीछे मुड़ कर नर्स को धीमी आवाज़ में पुकारा.

                     नर्स ने  जब पेशेंट का नाम बताया.  तब उसका रहा सहा शक भी दूर हो गया. विनय चाचा उस के  पापा के करीबी दोस्त थे. थोड़ी उधेड़बुन के बाद वह धीरे से द्वार खोल कर कमरे में चली गई. चाचा ने आहट  सुन  आँखे खोली. आश्चर्य से उसे देख कर पूछ बैठे -“बीनू , तुम….? यहाँ कैसे ?  कितने सालों बाद तुम्हें देख रहा हूँ. कैसी हो बिटिया ? अभी भी मुझ से नाराज़ हो क्या ?  चाचा और उनका बेटा राजीव उसे हमेशा इसी नाम से बुलाते थे. कभी पापा के बाद विनय चाचा ही उसके आदर्श थे. आज़ उन्हे ऐसे कमजोर, अस्पताल के बिस्तर पर देख वीणा की आँखें भर आईं.

                              ढेरो पुरानी यादें अलग-अलग झरोखों से झाँकने लगीं. पुराने दिन आँखों के सामने सजीव हो उठे. पापा और चाचा के  सुबह की सैर,  फिर उनकी चाय की चुस्कियाँ, रात में दोनों का क्लब में ताश खेलना और  गपशप,  दोनों परिवार का एक साथ पिकनिक और सिनेमा जाना. इन सब के साथ एक और सलोना चेहरा उस की यादोँ की खिड्कियाँ  खट्खटाने लगा.

                 नन्हे  राजीव और वीणा की पढाई एक ही स्कूल से शुरू हुई थी. पहले हीं दिन वीणा स्कूल की सिढियोँ पर गिर गई थी. उस दिन से राजीव रोज़ उसकी ऊँगली थाम कर स्कूल ले जाता. दोनों  के ममी-पापा नन्हें राजीव और नन्ही वीणा को एक दूसरे का  हाथ थामे देख हँस पड़ते. चाकलेट के लिये हुए  झगड़े में अक्सर वीणा, राजीव की कलाई में दाँत काट लेती.

                         उस दिन वीणा अपना दूध का दाँत मिट्टी में दबाने हीं वाली थी, तभी राजीव उसके हाँथों से दाँत छिनने लगा.  सभी हैरान थे. पूछ्ने  पर, वह ऐसा क्यों कर रहा है? राजीव ने कहा – “ मैं  इस दांत को कौवे को दिखा दुँगा. तब वीणा का  नया  दाँत नहीं  निकलेगा. ममी ने कहा है,  दूब  के नीचे दाँत मिट्टी में दबाने से जैसे-जैसे दूब बढेगा वैसे हीं नया  दाँत जल्दी से निकल आयेगा. अगर कौवे ने  दाँत को देख लिया तब वह  दाँत कभी नहीं निकलेगा. वीनू  मुझे बहुत  दाँत काटती है, इसलिये …….. ”  सभी का हँसते-हँसते बुरा हाल था. ऐसे हीं बचपन से बड़े होने तक दोनों का लड़ना झगड़ना , खेल कूद सभी साथ होता रहा. पता ही नहीँ चला समय कब फिसलता हुआ निकल गया.

                   दोनों बच्चे बड़े हो गये. दोनों बच्चे  कब एक दूसरे को नई नज़रों से देखने लगे.  उन्हें भी समझ नहीँ आया. बचपन से दोनों घर-घर खेलते बारहवीं में पहुँच कर सचमुच घर बसाने का सपना देखने  लगे. बारहवीं  में दोनों अच्छे अंको से पास कर अपने सपने सजाने लगे थे. उस दिन बिनू कालेज से दो एडमिशन फार्म ले कर उछ्लती-कुदती राजीव का फार्म देने उसके घर पहुची. बाहर हीं विनय चाचा खडे थे. उन्हों ने थोडी रुखी  आवाज़ में उसके  आने का कारण पूछा. फिर गुस्से से बोल पडे – “ राजीव घर में नहीं है. दिल्ली गया हुआ है. वह  अब यहाँ नहीं  पढेगा.  विदेश जा रहा है अपनी मौसी के पास. आगे की पढाई वहीं करेगा. तुम अब यहाँ मत आया करो.”  

                    विनय चाचा का वह रुखा व्यवहार उसके दिल में चुभ गया. पर उससे ज्यादा चुभन हुई थी. राजीव का  उसे  बिना बताये, बिना मिले चले  जाने से. वह टूटे दिल और  आँसू भरी आँखों  के साथ वापस लौट आई. कुछ हीं महीनों में एक अच्छा रिश्ता आया और उसकी शादी हो गई. ना जाने क्यों शादी में भी विनय चाचा- चाची नहीं आये.

                          शादी के बाद वीणा अपनी जिंदगी में खुश थी. बच्चे और पति के साथ जिंदगी बहुत खुशगवार थी. पर कभी-कभी पुरानी यादें उसके दिल में कसक पैदा करती. विनय चाचा को वह कभी माफ नहीं कर पाई. राजीव के व्यवहार से भी आहत थी. अक्सर सोंचती, उसने ऐसा क्यों किया? कभी खत भी  तो लिख सकता था. अपनी  मज़बूरी  बता सकता था. इस बात के रहस्य को वह सुलझा नहीं पाती.    

                 आज़ अचानक विनय चाचा को देख उसकी दिल कर रहा था,  उन्हें अपने गिले-शिकवे और उलाहना सुनाने का. तभी दरवाज़े पर हुई आहट से उसने नज़रें उठाईं. सामने  दो प्यारी-प्यारी किशोरियों के साथ एक सुंदर महिला खडी थी.  जब विनय चाचा ने उनका  परिचय राजीव की पत्नी और बेटियों के रुप में कराया. तब वह थोडा असहज हो गई और झट  जाने के लिये खडी हो गई.

          राजीव की पत्नी ने  उसे गौर से देखा और बडे प्यार से  उसकी कलाईयाँ पकड कर बैठा दिया. वह हँस कर कहने लगी आपके बारे मेँ राजीव और सबों से बहुत कुछ सुना है. अगर आपके पापा ने अंतर जातिय  विवाह को स्विकार कर लिया होता. तब आज़ मेरी जगह आप होतीं.

 

                  सुना है, राजीव और  पापा ने अपनी ओर से बहुत प्रयास किया था.  आपके पापा की नाराज़गी के आगे किसी की ना चली. वीणा ने हैरानी से विनय चाचा को देखा. उन्हों ने सह्मति में सिर हिलाया. वीणा  बोल  पडी – “ मुझे तो किसी ने कुछ नहीं  बताया था. आपने और राजीव ने भी कभी कुछ नहीं कहा.  आज़ तक मैं आपको इन सब का जिम्मेदार मानती रही.”

 

              राजीव की पत्नी बडे ध्यान से उसकी बातें सुन रही थी. वह बोल पडी – “शायद इसे हीं नियति कहते हैं. पापा, आपके पिता की बातों का सम्मान करते हुए अपनी मित्रता निभा रहे थे. पुरानी बातों को भूल, आपको और राजीव को भी  मित्रता निभानी  चाहिये.” उसकी सुलझी बातें सुन वीणा के मन का आक्रोश तिरोहित हो गया. तभी विनय चाचा बोल पडे –“ बेटी, तुम अपनी घर-गृहस्थी में खुश हो. यह मुझे मालूम है. मैं तुम्हारे पापा से मालूम करता रहता था. तुम मेरी  बेटी हो ना ?”

    

                              दोनों किशोरियाँ कुछ समझ नहीं पा रहीं थीं. छोटी बेटी ने धीरे से अपनी माँ के कान में पूछा  – ये कौन हैं मम्मी ?  राजीव की पत्नी के चेहरे पर मुस्कान फैल गई. उसने हँसते हुए कहा – तुम्हारे पापा की फ्रेंड … ….गर्लफ्रेंड है. वीणा के चेहरे पर भी तनाव रहित  मुस्कान नाच उठी.   


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शब्दों और  विचारों की खोज (लेखकों के  लिये प्रेरक )Searching words n ideas (Motivational though for writers) 

It is perfectly  normal for writers to fall short of words and ideas sometimes. In my experience reading is the best solution to develop a treasure of words and ideas. So  just keep reading and of course keep smiling.and yes keep writing too!

कुछ समय पहले मैंने अपने एक ब्लॉगर मित्र को दुविधाग्रस्त पाया. विचारों और शब्दों के जाल में उलझा पाया. मेरा ख्याल हैं , हम सब कभी ना कभी ऐस समय से गुजरते हैं. ऐसे में अध्ययन करना या पढ़ना मदद कर सकता हैं. इस से हमारे पास अपने आप शब्दों  और विचारों का भंडार बन जाता हैं. बस फिर इनसे हम अपनी दुनिया बना सकते हैं. लोगों को हँसा और रुला सकते हैं. पढ़ने के लिये हमारे पास ब्लॉग और पुस्तकों की अनमोल दुनिया हैं.

 

अनमोल पल (कविता)

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मुट्ठी में पकडे रेत की तरह ,

ना जाने कब वक्त फिसल गया.

जिंदगी की आपाधापी में.

वर्षों बीत गये जैसे पल भर में.

 पुराने दोस्तों से अचानक 

भेट हो जाती हैं.

तब याद आता हैं ,

दशकों बीत गये , बिना आहट  के.

तब याद आते हैं 

वे सुनहरे – रुपहले दिन.

वे यादें , आज़ भी अनमोल हैं ,

वे साथी आज़ भी अनमोल हैं.

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धुआँ (कविता)

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नज़रों के सामने धुन्ध सा
छाया था.
सब कुछ धुआँ धुआँ सा था.
तभी हवा चली , धुंध छ्टी
और देखा , ये तो परछाइयां हैं ,
जिन्हे हम इंसान समझ बैठे.

 

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नारी (कविता)

 

 

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नारी जब तक अबला हो, दुनिया के बनाये नियमों को 

बिना प्रश्न किये मानती जाये,

अच्छी लगती है, भोली लगती है। 

                                       सीता अौर सावित्री लगती है।

अगर भूल से भी प्रश्न करे, या ना माने 

तब कहते हैं- चरित्रहीन, पागल अौर  ना जाने क्या-क्या। 

सही कहा है, ये बातें अौर हथियार पुराने हो गये। 

नई बात तो तब होगी,  जब उसे सम्मान अौर बराबरी मिले,

                                   ईश्वर की सर्वोत्म  सुंदरतम रचना को ,

आधी आबादी को पीछे छोङ कितना आगे जायेगें हम?

 

 

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जिंदगी के रंग ( कहानी )

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                            पालतू कुत्तों को शाम में अक्सर लोग पार्क में घुमाने और खेलने के लिए लाते है। शाम में मार्केट कॉम्प्लेक्स से लौटते समय, मैं पार्क के पास से गुजर रही थी। तभी मैंने एक अजीब दृश्य देखा। एक बड़ी सी चमकती काले रंग की कार कुछ दूर चौराहे पर रुकी। एक व्यक्ति रुई जैसे सफ़ेद, काली आँखों वाले कुते को ले कर उतरा। उसने लाल रंग के एक बौल को हवा में बहुत दूर उछाला। कुत्ता बौल की तरफ लपका। उत्साह के साथ मुँह में बौल ले कर वापस अपने मालिक की ओर दौड़ा। पर हैरानी की बात थी, कि वह व्यक्ति इस बीच तेजी से कार ले कर जा चुका था। कुत्ता बौखलाया हुआ इधर-उधर दौड़ रहा था।  

      

                अब अक्सर वह कुत्ता मार्केट के खाने-पीने की दुकानों के पास मुझे दिख जाता था। पर एक अद्भुत बात  थी। रोज़ शाम के समय ठीक उसी चौराहे पर बैठा दिखता। शायद उसे अपने मालिक का इंतज़ार था। मेरी नज़रें रोज़ आते –जाते उस स्वामिभक्त स्वान पर चली जाती। मैं श्वान प्रेमी नहीं हूँ। पर उसे देख मेरा दिल कचोट उठता  था। कुछ समय बाद परिस्थितिवश मुझे दूसरे शहर जाना पड़ा।  

                 वर्षों बाद मैं अपने घर वापस  आई। बाजार जाते समय अपने आप नज़रें चौराहे की ओर चली गई। कुत्ते का कहीं पता नहीं था। वहाँ पर एक वृद्ध, बीमार सा दिखने वाले  भिखारी ने डेरा जमा लिया था। मेरे मन में ख़्याल आया – वह खूबसूरत प्यारा सा  कुत्ता मर-खप गया होगा। कुत्तों की आयु 12-15 वर्ष होती है। मैं तो बीसियों वर्ष बाद लौटीं हूँ।

                     उस दिन मौसम बड़ा सुहाना था। गुलाबी ठंड में पार्क फूलों से भरा था। बच्चे शोर मचाते खेल रहे थे। मैं उसी चौराहे के बेंच पर बैठी मौसम का मज़ा ले रही थी। तभी वह भिखारी आया और नियत स्थान पर टाट बिछा कर बैठ गया। कुछ देर बाद शुद्ध और सभ्य भाषा में मेरा अभिवादन करते हुए कहा – “ नमस्कार, मैं बड़ा भूखा हूँ। कुछ पैसे मिल जाते तो … ।”

         

         मैंने आश्चर्य से उसे देखा। उसने शायद मेरे अनकहे प्रश्न को पढ़ लिया और कहा – “ मैं भिक्षुक नहीं हूँ। मेरा बेटा मुझे यहाँ बैठा कर थोड़ी देर में लौट की बात कह गया है। पर आया नहीं। एक वर्ष से रोज़ उसका हीं इंतज़ार करता हूँ।“ फिर वह विक्षिप्तों की तरह स्वगत बड़बड़ाने लगा – “शायद वह मेरी बीमारी से तंग आ गया था। मेरे ऊपर खर्च भी तो बहुत होता था।” उसने नज़रे उठा कर  ऊपर आकाश की ओर देखा और दोनों हाथों को प्रणाम मुद्रा में जोड़ कर कहा –“ मैंने भी तो अपने पालतु बीमार कुत्ते को ऐसे, यहीं तो छोड़ा था।” 

(यह कहानी एक सच्ची घटना से प्रेरित है। अक्सर लोग अपने पालतू जानवरों को लावारिस छोड़ देते हैं। हम मनुष्य इतने निष्ठुर क्यों हैं ?) 

 

 

छाया चित्र इंटरनेट के सौजन्य से।

 

रंगीली ( कहानी )

 

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रंगीली और रंजन की जोड़ी नयनाभिराम थे। रंगीली के सौंदर्य में कशिश थी। बड़े-बड़े खूबसूरत नयन, दमकता चेहरा, लंबी – छरहरी देहयिष्टि। लगता था विधाता ने बड़े मनोयोग से गढ़ा था। पर रंजन का व्यक्तित्व उससे भी प्रभावशाली था। लम्बी-चौड़ी, बलशाली काया, काली आँखों में एक अनोखा दर्प , उनके गोद में होती उनकी परी सी सुंदर पुत्री एंजले। अभिजात्यता की अनोखी छाप पूरे परिवार पर थी। उनकी आंग्ल भाषा पर जबर्दस्त पकड़ थी। दोनों के दोनों ऐसी अँग्रेजी बोलते थे। जैसे यह उनकी मातृ भाषा हो। पर जब उतनी ही शुद्ध संस्कृत बोलना- पढ़ना शुरू करते। तब देखने और सुनने वाले हक्के बक्के रह जाते।

उनके कम उम्र और सात्विक रहन-सहन देख लोग अक्सर सोंच में पड़ जाते। इतनी कम उम्र का यह राजा-रानी सा जोड़ा इस आश्रम में क्या कर रहा है? जहाँ वृद्धों और परिवार के अवांछनीय परित्याक्तों की भीड़ है। अनेकों धनी, गण्यमान्य और विदेशी शिष्यों की भीड़ इस जोड़े के निष्ठा से प्रभावित हो आश्रम से जुटने लगी थी । आश्रम के विदेशी ब्रांचो में गुरु महाराज इन दोनों को अक्सर भेजते रहते थे। गुरु महाराज को मालूम था कि ये विदेशों में अपनी प्रभावशाली अँग्रेजी से लोगों तक बखूबी भारतीय दर्शन को पहुँचा और बता सकते हैं। सचमुच शांती की खोज में भटकते विदेशी भक्तों की झड़ी आश्रम में लग गई थी।

दोनों को देख कर लगता जैसे कोई खूबसूरत ग्रीक सौंदर्य के देवी-देवता की जोड़ी हो। बड़ी मेहनत और लगन से दोनों मंदिर का काम करते रहते। उनका मंदिर और गुरु महाराज के प्रति अद्भुत और अनुकरणीय श्रद्धा देख अक्सर गुरु महाराज भी बोल पड़ते –‘ दोनों ने देव योनि में जन्म लिया है। इन पर कान्हा की विशेष कृपा है। इनका जन्मों-जन्म का साथ है।“
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रंजन के पिता थे नगर के सम्मानीय वणिक और अथाह धन के मालिक। अनेक बड़े शहरों में उनके बड़े-बड़े होटल और मकान थे। ढेरो बसें और ट्रक यहाँ से वहाँ सामान और सवारी ढोते थे। जिसकी आड़ में उनका मादक पदार्थों और ड्रग्स का काम भी सुचारु और निर्बाध्य चलता रहता। अपने काले व्यवसाय को अबाध्य रूप से चलाने के लिए  शहर के आला अधिकारियों और पुलिस वर्ग से उन्होने  दोस्ताना संबंध बना रखे थे। धीरे-धीरे अपने एकलौते पुत्र को भी अपने जैसा व्यवसायपटु बनाने का प्रयास उन्होंने शुरू कर दिया था।

उस दिन शहर में नए पदास्थापित उच्च पुलिस पदाधिकारी के यहाँ उपहार की टोकरियाँ ले जाने का काम उन्होने रंजन को सौपा था। तभी, लगभग आठ- दस वर्ष पहले रंगीली और रंजन पहली बार मिले थे। रंजन ने जैसे हीं उनके ऊँचे द्वार के अंदर अपनी चमकती नई लाल कार बढाई। तभी नौसिखिया, नवयौवना  कार चालक, पुलिसपुत्री कहीं जाने के लिए बाहर निकल रही थी। नकचढ़ी रंगीली ने रंजन की नई स्पोर्ट्स कार को पिता के पुलीसिया गाड़ी से रगड़ लगाते हुए आगे बढ़ा लिया था। रंजन का क्रोध भी दुर्वासा से कम नहीं था। पर धक्का मारने वाली के सौंदर्य ने उसके कार के साथ उसके दिल पर भी छाप छोड़ दिया था।

अब बिना पिता के कहे वह गाहे-बगाहे उपहारों के साथ रंगीली के घर पहुँच जाता था। अगर रंगीली से सामना हो जाता। तब रंजन मुस्कुरा कर उससे पुछता – “ आज मेरी कार में धक्का नहीं मारेंगी? रंगीली तिरछी नज़र से उसे  देखती, खिलखिलाती हुई निकल जाती। रंजन को लगता जैसे आज उसका जीवन सफल हो गया।

रंजन के पिता ने शायद माजरा भाँप लिया था। पर उन्हें इससे कोई ऐतराज नहीं था। न हिंग लगे ना फिटकिरी और रंग चोखा। इसी बहाने पुत्र व्यवसाय पर ध्यान तो देने लगा। उन्हें सिर्फ पत्नी की ओर से चिंता थी। जो वैरागी बनी हर वक्त पूजा-पाठ, आश्रम और गुरु में व्यस्त रहती। अक्सर घर में झुंड के झुंड साधु – संत कीर्तन करते रहते। कभी नवरात्री का नौ दिन अखंड कीर्तन चलता । कभी राम और कृष्ण का जन्मदिन मनता रहता। सभी किरतनिया दूध, फल, मेवा, फलहारी घृत पकवान और नए वस्त्र पाते रहते। घर शुद्ध घी, कपूर, धूप, हवन और सुगंधित अगरबतियों के खुशबू से तरबतर रहता। अखंड भंडारा का द्वार सभी के लिए खुला रहता।

रंजन के पिता को पत्नी का यह तामझाम पसंद नहीं था। पर वे एक होनहार व्यवसाई की तरह इस में से भी अपना फायदा निकाल लेते थे और सम्मानीय अतिथियों को आमंत्रित करने के इस सुअवसर का भरपूर फ़ायदा उठाते थे। ऐसे ही अवसरों पर रंगीली का परिवार भी आमंत्रित होने लगा। गुरु महाराज के सौम्य व्यक्तित्व से प्रभावित रंगीली के परिवार ने भी उनसे दीक्षा ले ली। अब रंजन और रंगीली की अक्सर भेंट होने लगी। जिससे दोनों की घनिष्ठता बढ़ती गई। अब रंजन के छेड़ने पर रंगीली हँस कर कहती – “ सब तो ठीक है, पर तुम्हारी यह पुजारिन, निरामिष माँ मुझे अपने घर की बहू कभी नहीं बनने देगी।“

पर हुआ इसका उल्टा। हर दिन अपराधियों की चोरी पकड़ने वाले पिता ने रंगीली और रंजन के इस रास-लीला को तत्काल पकड लिया। अपनी 14-15 वर्ष की नासमझ पुत्री की हरकत उन्हें नागवार गुजरी। उन्होंने भी अपना पुलिसवाला दाव-पेंच आजमाया। नतीजन, अचानक उनके तबादले का ऑर्डर आया। सामान बंधा और रातों – रात वे परिवार के साथ दूसरे शहर चले गए। जैसा अक्सर इस उम्र की प्रेम कथा के साथ होता है, वैसे ही इस कमसिन तोता-मैना की अधूरी प्रेम कहानी के साथ भी हुआ। बुद्धिमान पिता ने इस कहानी पर पूर्णविराम लगा दिया।
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20-21 वर्ष की रंगीली के पिता ने बड़े जतन से होनहार और योग्य दामाद की खोज शुरू की। सबसे पहले वे पहुँचे गुरु महाराज के पास। गुरु महाराज ने रंगीली के जन्म की जानकारी मांगी और जल्दी ही उसकी कुंडली बनाने का आश्वासन दिया। कुंडली बन कर आई। उच्चपद और उच्चकुल वरों के यहाँ हल्दी-अक्षत लगी कुंडली और सुंदर पुत्री की तस्वीरें, अथाह दहेज के आश्वासन के साथ जाने लगीं। पर ना-जाने क्यों कहीं बात हीं नही बन रही थी।

दुखी हो कर वे फिर गुरु आश्रम पहुँचे। उन्हें अपनी सारी व्यथा बताई। गुरु महाराज ने व्यथित और चिंतित पुत्रिजनक के माथे पर अनगिनत चिंता की लकीरें देखीं। तब सांत्वना देते हुए बताया कि उनकी पुत्री की कुंडली के अष्टम घर के भयंकर मांगलिक दोष है। शनि भी लग्न में हैं। सारे ग्रह कुंडली में ऐसे स्थापित हैं कि राहू और केतु के अंदर हैं। अर्थात कालसर्प दोष भी है।

पुलिसिया दावपेंच में पारंगत रंगीली के पिता कुंडली ज्ञान में शून्य थे। अतः उन्होंने गुरु महाराज के चरण पकड़ कर कुछ उपाय जानना चाहा। जीवन भर रुपए की महिमा से हर काम निकालने वाले दुखित पिता ने यहाँ भी ईश्वर को चढ़ावा पहुँचा कर काम निकालना चाहा। गुरु महाराज ने कुपित नज़र से देख कर कहा- “ईश्वर को सिर्फ चढ़ावा से नहीं खुश किया जा सकता है।“ चिंतित पिता ने गुरु महाराज के सामने रुपयों की गड्डियों का ढेर रख दिया। नए निर्माणाधीन मंदिर का पूर्ण व्यय वहन करने का वचन दे डाला और अनुरोध किया कि पुत्री के त्रुटीपुर्ण कुंडली का भी वैसे ही आमूलचूल परिवर्तन कर दें, जैसे वे अक्सर अपराधियों के फाइलों में हेरफेर करते अौर उन्हें बेदाग, कानून की पकड़ से बाहर  निकाल देते हैं।

गुरु महाराज ने करुण दृष्टि से उन्हें ऐसे देखा, जैसे माँ, आग की ओर हाथ बढ़ाते अपने अबोध और नासमझ संतान को देखती है। फिर विद्रुप भरी मुस्कान के साथ उन पर नज़र डाली और कहा – “देखिये वत्स, मैं ऐसे काम नहीं करता हूँ। आपकी मनोकामना पूर्ण करनेवाले अनेकों ज्ञानी पंडित मिल जाएँगे। पर कुछ ही समय बाद जब आपकी राजदुलारी सफ़ेद साड़ी में आपके पास वापस लौट आएगी। तब क्या उसका वैधव्यपूर्ण जिंदगी आपकी अंतरात्मा को नहीं कचोटेगी?

 

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रंगीली के पिता जैसे नींद से जाग उठे। अपनी नासमझी की माफी मांगते हुए वह कुटिल, कठोर और उच्च ओहदा के अभिमान में डूबा पिता, गुरु महाराज के चरणों में लोट गया। वे आँखों में आँसू भर कर उपाय की याचना करने लगे। गुरु जी ने मृदुल-मधुर स्वर में बताया कि सबसे अच्छा होगा, कुंडली मिला कर विवाह किया जाये। पुत्री के सौभाग्यशाली और सुखी जीवन के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण है। पद, ओहदा, मान सम्मान जैसी बातों से ज्यादा अहमियत रखती है पुत्री का अखंड सौभाग्य।

गुरु महाराज ने उन्हें एक उपयुक्त वर के बारे में भी बताया। जिससे उनकी पुत्री की कुंडली का अच्छा मिलान हो रहा था। वह वर था रंजन। परिवार जाना पहचाना था। ऊपर से गुरु महाराज की आज्ञा भी थी। किसी तरह की शंका की गुंजाईश नहीं थी। पर अभी भी उच्चपद आसीन दामाद अभिलाषी पिता, बेटी के बारे में सशंकित थे। पता नही उनकी ऊँचे पसंदवाली, नखड़ाही पुत्री, जो प्रत्येक भावी योग्य वारों में मीनमेख निकालते रहती थी। उसे व्यवसायी रंजन और उसका अतिधार्मिक परिवार पसंद आयेगा या नहीं? पहले के नासमझ उम्र की प्रेम लीला की बात अलग थी।स्वयं उन्हें भी किसी उच्च पदासीन, उच्च शिक्षित दामाद की बड़ी आकांक्षा थी।

तभी गुरु महाराज ने उनकी रही-सही चिंता भी दूर कर दी। गुरु महाराज ने उनसे कहा –“ मुझे लगता है, रंगीली और रंजन का विवाह, उनका प्रारब्ध है। अतः मैं उन दोनों से स्वयं बात करना चाहता हूँ। आगे ईश्वर इच्छा। अगले दिन सुबह शुभ पुष्य नक्षत्र के समय भावी वर वधू गुरु महाराज के समक्ष आए। एकांत कक्ष में मंत्रणा आरंभ हुई। गुरु महाराज ने बताया कि उनकी दिव्य दृष्टि से उन्हें संकेत मिल रहें हैं कि रंगीली और रंजन एक दूसरे के लिए बने हैं। दोनों का जन्मों – जन्म का बंधन है। फिर उन्हों ने अर्ध खुले नयनों से दोनों को ऐसे देखा जैसे ध्यान में डूबे हों। फिर अचानक उन पर प्रश्नों की झड़ी सी लगा दी – ‘ बच्चों क्या तुम्हारा कभी एक दूसरे की ओर ध्यान नहीं गया? तुम दोनों को आपसी प्रेम का आभास नहीं हुआ? तुम्हे तो ईश्वर ने मिलाया है। हाँ, कुंडली के कुछ दोषों को दूर करने के लिए किसी मंदिर में कार सेवा करने की जरूरत है।

रंगीली और रंजन को अपनी पुराना प्रणय याद आ गया। सचमुच ईश्वर किसी प्रयोजन से बारंबार दोनों को आमने –सामने ला रहें हैं क्या? दोनों गुरु महिमा से अभिभूत हो गए। तुरंत उनके चारणों में झुक मौन सहमती दे दी। दोनों के परिवार में खुशियों की लहर दौड़ गई। तत्काल वहीं के वहीं गुरु महाराज के छत्रछाया में दोनों की सगाई करा दी गई।

कुंडली के क्रूर ग्रह, राहू और केतू की शांती के लिए गुरु जी ने सुझाव दिया – “शिवरात्री के दिन किसी शिव मंदिर में रंगीली और रंजन से काल सर्प पूजान  करवाना होगा। आंध्र प्रदेश के श्री कालहस्ती मंदिर, या भगवान शिव के बारह ज्योतृलिंगों में कहीं ही इस पुजन को कराया जा सकता है।“

आँखें बंद कर थोड़े देर के मौन के बाद गुरु जी ने नेत्र खोले। सभी को अपनी ओर देखता पा कर उनके चेहरे पर मधुर मुस्कान छा गई। हँस कर उन्हों ने पुनः कहा – आप लोग चिंतित ना हों। ईश्वर तो हर जगह विद्यमान है। आप किसी भी मंदिर में यह पूजा करवा सकते है। चाहें तो यहाँ भी पूजा हो सकती है। यह मंदिर भी आपका हीं है। यहाँ तो मैं स्वयं सर्वोत्तम विधि से पूजा करवा दूंगा।“ मंदिर में भोग का समय हो रहा था। गुरु महाराज उठ कर अपने पूजा कार्य में व्यस्त हो गए। रंगीली और रंजन का परिवार एक साथ माथा से माथा  मिला कर काल सर्प पूजा कहाँ हो इसकी मंत्रणा करने लगे।

दोनों नव सगाई जोड़ा बड़े आम्र वृक्ष के ओट में अपने पुराने बचकाने प्रेम की याद में डूब गया। हमेशा मौन की चादर में लिपटी रहनेवाली रंजन की माँ ने पहली बार मुँह खोला- “ देखिये, गुरु महाराज हमलोगों के शुभचिंतक है। उन्हें किसी प्रकार का लालच नहीं है। वर्ना वे हमें अन्य मंदिरों के बारे में क्यों बताते? मेरा विचार है, पूजा इस मंदिर में गुरु जी से करवाना उचित होगा। बड़े-बड़े मंदिरों में पुजारी कम समय में आधे-अधूरे विधान से पूजा करवा देंगे और हम समझ भी नहीं सकेंगे।“

नई समधिन के सौंदर्य पर रीझे रंगीली के रसिक पिता बड़े देर से उनसे बातें करने का अवसर खोज रहे थे। इस स्वर्ण अवसर का उन्होंने तत्काल लाभ उठाया और  तुरंत अपनी सहमती दे दी। गुरु जी की शालीनता और निस्वार्थता से सभी अभिभूत हो गए। फिर तो बड़ी तेज़ी से घटनाक्रम ठोस रूप लेता गया। विवाह आश्रम के मंदिर में हुआ। उस के बाद नव युगल जोड़े ने अपना मधुयामिनी अर्थात हनीमून भी आश्रम में ही मनाया।

दोनों परिवारों की विपुल धन राशी के समुचित उपयोग का ध्यान रखते हुए नव विवाहित जोड़े की लंबी विदेश मधुयामिनी यात्रा हुई। लगभग एक महीने बाद दोनों  उपहारों से लदे घर वापस लौटे। विदेश में उनका ज्यादा समय गुरु निर्देशानुसार विभिन्न आश्रमों में  बीता। अतिधर्मभीरु रंजन अपनी माँ की तरह  अति धार्मिक था। शौकीन और पिता की दुलारी पुत्री रंगीली, प्रणय  क्षणों के लिए तरस कर रह गई।

रंगीली ने अपने और अपने  अल्पशिक्षित पति की सोच-समझ में जमीन आसमान का अंतर देख  हैरान थी। हनीमून की खूबसूरत यात्रा को उसके पति ने धार्मिक तीर्थयात्रा में बदल दिया था। पर संध्या होते रंजन अक्सर गायब हो जाता था। एक दिन वह भी रंजन के पीछे-पीछे चल दी। पास के बार में उसने रंजन को मदिरा और बार बाला के साथ  प्रेममय रूप में देख, वह सन्न रह गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि रंजन का कौन सा रूप सच्चा है। 

विदेश से लौटने तक दोनों में अनेकों बार नोक-झोंक हो चुका था। दोनों अपने ठंढे मधुयामिनी से  वापस लौटे। रंगीली उदास और परेशान थी। उनके  साथ में आया आश्रम के विदेशी शाखाओं में नए बने शिष्यों की लंबी सूची। जिसने  सभी में खुशियाँ भर दी। किसी का ध्यान रंगीली की उदासी पर नहीं गया।

विदेशी शिष्यों की संख्या बढ़ने से रंजन और रंगीली की जिम्मेदारियाँ बढ़ गई थीं। अतः दोनों अपना काफी समय आश्रम में देने लगे। साल बितते ना बितते दोनों माता-पिता बन गए। प्यारी-प्यारी पुत्री एंजेल पूरे आश्रम और रंजन – रंगीली के पूरे परिवार का खिलौना थी। गुरु महाराज के असीम कृपा से दोनों परिवार कृतज्ञ था।

एक दिन, जब दुखित और व्यथित रंगीली ने गुरु महाराज से रंजन के विवेकहीन चरित्र और व्यवहार के बारे में बताया,  तब उन्होंने उसे समझाया कि यह सब उसके कुंडलीजनित दोषों के कारण हो रहा है। उन्हों ने पहले ही बताया मंदिर में कार सेवा से दोष दूर होगा।अब रंजन और रंगीली,  दोनों अब लगभग आश्रमवासी हो गए थे।रंगीली के पिता भी अब धीरे-धीरे उच्चपदासीन दामाद के ना मिलने के क्षोभ और दुख  से बाहर आने लगे थे।
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शाम का समय था। मौसम बड़ा खुशनुमा था। रिमझिम वर्षा हो रही थी। चारो ओर हरीतिमा थी। हरियाली की चादर पर, पास लगी रातरानी की बेल ने भीनी- भीनी खुशबू बिखेर दी थी। सामने बड़े से बगीचे में रंग बिरंगे फूल आषाढ़ महीने के मंद समीर में झूम रहे थे। आश्रम का पालतू मयूर आसमान में छाए बादल और रिमझिम फुहार देख कर अपने पंख फैलाये नाच रहा था। रंजन और रंगीली अपनी बेटी और पूरे परिवार के साथ आश्रम में अपनी छोटी कुटियारूपी कौटेज के बरामदे में गरम चाय की चुसकियों और गर्मागर्म पकौड़ियों के साथ मौसम का मज़ा ले रहे थे। पाँच वर्ष की एंजेल खेल-खेल में अपने पिता के अति मूल्यवान मोबाईल से नृत्यरत मयूर की तस्वीरें खींच रही थी।

“ क्या जीवन इससे ज्यादा सुंदर और सुखमय हो सकता है? – रंजन ने मुस्कुरा कर पूछा। थोड़ा रुक कर उसने माता-पिता, सास-स्वसुर और अपनी पत्नी पर नज़र डाली और कहा – “कल गुरु पूर्णिमा है। मैंने गुरु जी के लिए स्वर्ण मुकुट और नए वस्त्र बनवाए हैं। मुझे लगता है, कल ब्रह्म मुहूर्त में हम सभी को उन्हें  उपहार दे कर आशीर्वाद ले लेना चाहिए। खुशहाल और संतुष्ट परिवार ने स्वीकृती दे दी। सुबह-सुबह स्नान कर शुद्ध और सात्विक मन से सारा परिवार गुरु महाराज के कक्ष के बाहर पहुंचा। द्वार सदा की तरह खुला था। भारी सुनहरा पर्दा द्वार पर झूल रहा था। पूर्व से उदित होते सूर्य की सुनहरी किरणें आषाढ़ पूर्णिमा की भोर को और पावन बना रहीं थीं। कमरे से धूप की खुशबू और अगरबत्ती की ध्रूमरेखा बाहर आ रही थीं। थोड़ी दूर पर बने मंदिर से घण्टियों की मधुर ध्वनी और शंख की आवाज़ आ रही थी।

गुरु जी के कुटिया के आस-पास पूर्ण शांती थी। दरअसल बहुत कम लोगों को यहाँ तक आने की अनुमति थी। पर रंजन और रंगीली के लिए गुरु जी के द्वार हमेशा खुले रहते थे। अतः दोनों बेझिझक आगे बढ़े। तभी, अंदर से आती किसी की खिलखिलाने और गुरु जी के ठहाके की आवाज़ सुनकर आधा हटा पर्दा रंजन हाथों में अटका रह गया। पर्दे की ओट से पूरे परिवार ने देखा, बिस्तर पर गुरु जी की बाँहों में उनकी निकटतम शिष्या मेनका हँस कर पूछ रही थी – यह सब इतनी सरलता से आपने कैसे किया?

गुरु जी  अपनी अधपकी दाढ़ी सहलाते हुए कह रहे थे – “रंजन और रंगीली के बालपन के प्रणयकेली पर तभी मेरे नज़र पड़ गई थी। इतने वर्षों बाद सही मौका मिलते ही, सात जन्मों का बंधन बता कर उसे मैंने भंजा लिया। आज ये दोनों मेरे लिए सोने की अंडा देनेवाले मुर्गी है। देखती हो, इनकी वजह से मेरे आश्रम में स्वर्ण और धन वृष्टि हो रही है। मेनका तकिये पर टिक, अधलेटी हो कर पूछ रही थी – उन दोनों की कुंडलियाँ कैसे इतनी अच्छी मिल गई। गुरु जी ने एक आँख मारते हुए कहा – “वह तो मेरे बाएँ हाथ का खेल है मेनका !!!सब नकली है। 

रंजन और रंगीली को लगा जैसे वे गश खा कर गिर जाएँगे। रंजन की माँ के आँखों से गुरु महिमा धुल कर बह रही थी। दोनों के पिता द्वय की जोड़ी हक्की-बक्की सोंच रहे – क्या उनसे भी धूर्त कोई हो सकता है? जीवन भर इतने दाव-पेंच करते बीता और आज ईश्वर जैसे उन्हें दिखा रहें हों – सौ चोट सुनार की और एक चोट लोहार की। ईश्वर के एक ही चोट ने उन्हें उनके सारे कुकर्मों का जवाब सूद समेत दे दिया था। रंगीली के पिता के नेत्रों के सामने उन योग्य, उच्चपद, उच्च शिक्षित वरों का चेहरा नाचने लगा, जो उनकी प्राणप्यारी सुंदरी पुत्री से विवाह के लिए तत्पर थे।

  तभी खटके की आवाज़ से सारे लोग और गुरु जी चौंक गए। नन्ही एंजेल ने खेल-खेल में अपने पिता के मोबाइल से एक के बाद एक ना जाने कितनी तस्वीरें प्रणयरत शिष्या-गुरु के खींच लिए थे।

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#LookUpStories ख़ुशी की वह घड़ी ( blog related )

दोपहर लगभग 12 बजे का समय था। सोमवार का दिन था। अचानक मेरे पति ने मुझे फोन किया। वे बड़े घबराए हुए थे। उनकी आवाज़ में परेशानी झलक रही थी। आवाज़ में नाराजगी भी थी। उन्होने बताया कि बड़ी देर से वे हमारी बड़ी बेटी को फोन लगा रहें है। पर उसका फोन लग नहीं रहा है।
यह मेरे पति की हर दिन की आदत थी। वे दिन में फुर्सत के क्षणों में एक बार बेटी से बात जरूर करते थे। उस समय बड़ी बेटी पुणे में पढ़ाई कर रही थी। बच्चे जब घर से दूर होते हैं। तब उनका ध्यान रखना जरूरी होता है। उस दिन उन्होने बड़े झल्लये स्वर में कहा- “तुम्हारी बेटी का फोन क्यों नहीं लग रहा है?
मेरे पति की एक बड़ी अजीब आदत है। बच्चे जब अच्छा करते हैं, तब वे बड़े प्यार से उन्हें “मेरी बेटियाँ” कह कर बुलाते है। पर जब बेटियों से नाराज़ होते है तब अक्सर कहतें है- ‘तुम्हारी बेटियाँ’। उस दिन भी वह बार-बार नाराजगी से कह रहे थे – आजकल तुम्हारी बेटी बड़ी लापरवाह होती जा रही है। आज सुबह से उसने फोन नहीं किया है।
मैंने उन्हे समझाने की कोशिश की। हो सकता है, वह क्लास में हो। या किसी ऐसे जगह हो। जहाँ फोन ना लग रहा हो। पर थोड़ी देर बाद उन्होने बताया कि अभी भी फोन नहीं लग रहा हो। उनका सारा गुस्सा मुझ पर उतरने लगा।
ऐसा तो वह कभी नहीं करती है। मैंने भी उसे फोन करने की कोशिश की। पर फोन नहीं लगा। थोड़ी देर में मुझे भी बेचैनी होने लगी। मैं घबरा कर बार-बार फोन करने लगी। पर कोई फायदा नहीं हुआ। उसके कमरे में रहनेवाली उसकी सहेली को फोन करने का प्रयास भी बेकार गया। हॉस्टल में फोन करने पर मालूम हुआ कि वह सुबह-सुबह कहीं बाहर निकाल गई थी। शाम ढल रही थी।
हम लोगों की घबराहट बढ़ गई। आज-कल वह थोड़ी परेशान भी थी। क्योंकि नौकरी के लिए विभिन्न कंपनियाँ आने लगी थी। कैंपस-सेलेक्सन के समय की वजह से थोड़ी घबराई हुई थी। अँधेरा हो चला था। समझ नहीं आ रहा था, से किस से पूछे? कैसे पता करें?
मुझे बताए बिना वह कहीं नहीं जाती थी। बाज़ार जाना हो या सिनेमा, मुझे फोन से जरूर बता देती थी। बार-बार मन में उल्टे-सीधे ख्याल आने लगे। ड़र से मन कांपने लगा। कहीं कुछ उल्टा-सीधा तो नहीं हो गया। लग रहा था, क्यों उसे पढ़ने के लिए इतना दूर भेज दिया?
सारा दिन ऐसे ही बीत गया था। फोन की घंटी फिर बजी और मुझे लगा पति का फोन होगा। लेकिन इस बार बेटी का फोन था। उसकी आवाज़ सुन कर शांति हुई। मैं उसे डाँटने ही वाली थी कि उसकी उत्साह भरी आवाज़ आई- “ मम्मी, मुझे नौकरी मिल गई”। दरअसल उसे देर रात पता चला कि अगले दिन एक अच्छी कंपनी का टेस्ट और इंटरव्यू है। अगले दिन सुबह एक के बाद दूसरे टेस्ट होते रहे और उसे फोन स्विच आफ रखना पड़ा। जिन लोगों का चयन एक टेस्ट में होता उन्हे अगले टेस्ट और फिर इंटरव्यू के लिए भेजा जाता रहा। लगातार टेस्ट और इंटरव्यू के बीच उसे बात करने का मौका नहीं मिला। उसके कमरे में रहनेवाली उसकी सहेली भी साथ थी। इसलिए उसका फोन भी नहीं लग रहा था।
खुशखबरी सुन कर पूरे दिन का तनाव दूर हो गया। बेटी को उज्ज्वल भविष्य के राह पर अग्रसर होते देख मन ख़ुशी से नाच उठा। तभी मेरे पति ने कहा-“ देखा तुमने, मेरी बेटी कितनी लायक है”।

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#Together हमारा साथ ( blog related )

जिंदगी में जब आसानी से कुछ मिलता है। तब हम उसका मूल्य नहीं समझते हैं। बचपन से एक ही परिवार में पले बढ़े बच्चे लड़ते झगड़ते बड़े होते है। छोटी-छोटी बातों में आपस में उलझ जाते है। पर बड़े होने पर जब वे अलग हो जाते है। अपनी-अपनी जिंदगी में सेटल हो जाते है। अलग – अलग शहरों में बस जाते हैं। तब उन का आपस में मिलना-जुलना कठिन हो जाता है। तब पुरानी यादें मूल्यवान लगने लगती है। तब पुराना साथ, पुरानी बातें याद आने लगती हैं।
मेरे घर भी कुछ ऐसा ही हुआ। हम चार लोगों का परिवार है। मैं, मेरे पति और मेरी दो प्यारी-प्यारी बेटियाँ। जब बेटियाँ छोटी थीं। तब मैं घर और नौकरी में उलझी रहती थी। दोनों बेटियाँ भी अन्य सामान्य बच्चों की तरह फर्माइशें करतीं। आपस के झगड़ों में मुझे भी परेशान करतीं। जब कभी वे ज्यादा परेशान करतीं। तब मैं सोचतीं – कब ये बड़ी होंगी? कब मुझे परेशान करना कम करेंगी।
बचपन में दोनों बेटियाँ एक ही कमरे में रहतीं थीं और एक बड़े बिस्तर पर सोतीं थीं। दोनों हमेशा अपने-अपने कमरे और अलग पलंग की फरमाईश कर परेशान करतीं थी। तब हम दो कमरे के घर में रहते थे। अतः उन्हे अलग कमरे देना संभव नहीं था। बड़ा घर लेना कठिन होगा। मैं बच्चों को यह सब समझाती रहती थी। पर बच्चे तो बच्चे होते हैं। उनकी जिद से मैं परेशान हो जाती थी।
देखते-देखते समय पंख लगा कर उड़ गया। बच्चे बड़े हो गए। बड़ी बेटी पढ़ाई करने बाहर चली गई। पति का तबादला कोलकाता हो गया। वे वहाँ चले गए। छोटी बेटी दसवीं में थी अतः मुझे उसके साथ धनबाद में रुकना पड़ा। ताकि उसकी पढ़ाई और बोर्ड के परीक्षा में बाधा ना आए। हम सभी एक दूसरे की बड़ी कमी मससूस करते थे। पर उपाय क्या था? परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी बन गईं थी।
हमने इस कमी को दूर करने के लिए दक्षिण घूमने का कार्यक्रम बनाया। ताकि भीड़-भाड़ और घर से दूर हम चारो कुछ दिन एक साथ बीता सके। कार्यक्रम बन गया। हम सब बड़े खुश थे। इकट्ठे रहने का मौका मिलेगा।
तभी पता चला कि मेरे पति की छुट्टियाँ किसी कारणवश स्थगित कर दी गईं है। उनकी छुट्टियाँ मिलने तक मेरा और छोटी बेटी के स्कूल की छुट्टियाँ लगभग खत्म हो रहीं थी। लगा अब घूमने का कार्यक्रम नहीं बन पाएगा। दोनों बच्चे बड़े मायूस हो गए।
अब जब हम चार लोग तीन शहर में थे तब हमें साथ होने का मोल समझ आ रहा था। अतः हमने अपना कार्यक्रम फिर से सीमित समय के अनुसार बनाया, ताकि कुछ समय तो साथ बिता सकें, और दक्षिण के यात्रा पर गए। यह यात्रा कम दिनों का जरूर था। पर साथ-साथ बिताया यह समय हमारे लिए यादगार बन गया। खास बात यह थी कि जो बच्चे अलग बिस्तर और कमरे के लिए झगड़ते थे। वे बेटियाँ अब साथ सोने के लिए परेशान थीं । वे चाहती थीं कि हम ज्यादा से ज्यादा साथ रहें। चारो एक साथ एक बिस्तर पर सोए और समय बिताएँ।

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#ChooseToStart मेरा नया फोन ( blog related )

मेरे हाथों में है चमचमाता नया स्मार्ट फोन। मैं हैरानी से उसे निहार रहीं हूँ। मन में खयाल आ रहें हैं- “क्या यह सचमुच मुझे स्मार्ट बना देगा”? पर यह क्या? मैं तो उसमें ही उलझ कर रह गई हूँ।

इसके बटन जरा सा छु जाने पर फोन कहीं का कहीं लग जाता है। फोन देख कर जितनी खुशी हुई। उसे काम में लाने में उतनी हीं उलझन हो रही है। मुझे अपना पुराना फोन याद आने लगा। उस पर हाथ बैठा था। मुझे उसका अभ्यास था। अतः काम करना आसान लगता था।

मुझे पुराने दिन याद आने लगे। फोन की दुनिया में बड़ी तेज़ी से बदलाव आए हैं। कुछ दशकों पहले तक कुछ ही घरों में फोन हुआ करते थे। वह भी तार से जुटे, डायल करने वाले फोन होते थे। दूसरे शहर फोन करना हो तो कॉल बुक करना पड़ता था। घंटो इंतजार के बाद बात होती थी। कुछ समय बाद सभी शहरों के कोड नंबर आ गए। जिसकी सहायता से फोन लगता था। पर यह भी आज के जैसा सुविधाजनक नहीं था। यात्रा के दौरान तो फोन करने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी।

हाल के वर्षों में फोन की दुनिया में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। विज्ञान का एक अद्भुत चमत्कार सामने आया। मोबाइल फोन उपलब्ध हो गए। वह भी ऐसा कि मुट्ठी में समा जाये। ना लंबी तार, ना डॉयल करने की मुसीबत। जहां चाहो , जब चाहो, जिससे चाहो बातें कर सकते है। सारी दुनियाँ ही सिमट कर करीब लगने लगी।

पर हाँ, जब सामन्य मोबाईल फोन हाथ में आया तब भी वही उलझन हुई। जो आज हो रही है। तब भी लगा था कि इसे काम में लाना सीखना होगा। पर ये फोन इतने सहज-सरल होते है कि सीखने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई थी। इस बात को याद कर मुझे बड़ी तस्सली हुई। चलो इसे भी मैं सीख लूँगी। पर फिर भी अपने स्मार्ट फोन को काम में लाने में घबराहट हो रही थी- कही मैं गलत तरीके से चला कर इस बिगाड़ ना दूँ। फिर मन में ख्याल आया- कही मुझमें परिवर्तन से बचने की प्रवृती का भाव (Change resistance) तो नहीं आ रहा है? नहीं-नहीं, यह तो बड़ी अफसोस की बात होगी।

मेरा स्मार्ट फोन से पहला परिचय तब का है। जब कुछ समय पहले मेरी छोटी बेटी नें इंजीनियरिंग कॉलेज में अपना प्रोजेक्ट स्मार्ट फोन एप पर आधारित बनाया था। साथ ही पहला पुरस्कार भी पाया था। तभी से मेरे मन में इस फोन की लालसा थी। आज जब यह फोन मेरे हाथों में है। तब ऐसे घबराना ठीक नहीं है।

मैंने अपने आप से कहा- कोशिश करनी होगी। मैं इसे कर सकती हूँ। मैंने प्यार से अपने स्मार्ट फोन को हाथों में उठाया। और यह क्या? यह तो पहले के फोन से भी सरल- सहज है। इसे आज के समय में दोस्ताना फोन या युजर फ्रेंडली कहेंगे।

अब समझ आया इसे स्मार्ट फोन क्यों कहते हैं। इससे बैठे-बैठे बातें करो या खरीदारी। अपने मेल देखो या व्हाट्स एप पर ग्रुप बना कर पूरे परिवार और मित्रों के करीब आ जाओ। । कोई भी एप डाउन लोड कर लो, और बैठे-बिठाये पूरी दुनिया अपने पास ले आओ। ब्लॉग लिखो या पढ़ो। यह तो हर काम को आसान कर देता है।

अब तो हाल यह है कि सोते-जागते मैं अपना स्मार्ट फोन अपने करीब रखतीं हूँ। मैं सचमुच स्मार्ट बन गई हूँ।

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