
अभी तक लगता था
मर रहीं हैं नदियाँ,
गल रहें हैं ग्लेशियर,
धुँधले हो रहे हैं अंतरिक्ष,
कूड़ेदान बन रहे है सागर,
धरा और पर्वत…..
इंसानों की मलिनता से।
अब समझ आया
कई देश भी मर रहे हैं।
फ़र्क़ पड़ता है,
और दर्द होता है,
सिर्फ़ भुक्तभोगियों को।
बाक़ी सब जटिल जीवन के
जद्दोजहद में उलझे है।
विश्व राजनीति की पहेली है अबूझ।









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