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Tag: hindi poem
इंद्रधनुष -कविता Rainbow -poem
There is nothing in this world that is not a gift from you ~ Rumi.
ज़िंदगी के सात रंगों को भूल,
हम जीवन को ढूँढ रहे हैं
काले-सफ़ेद रंगों के धुआँ अौर धुंध में।
भाग रहें हैं, अनजानी राहों पर ,
दुनिया के मायावी मृगतृष्णा के पीछे।
आंगन की खिली धूप, खिलते फूल,
बच्चों की किलकारी,
ऊपरवाले की हर रचना है न्यारी।
अगर कुछ ना कर सको ,
तो थमा दो ऊपर वाले को अपनी ङोर।
खुबसूरत सतरंगी इंद्रधनुषी लगेगी,
ज़िंदगी हर अोर।
image from internet.
जिंदगी के रंग ( कविता) 8
जिंदगी ने ना जाने कितने रंग बदले।
रेगिस्तान के रेत की तरह
कितने निशां बने अौर मिटे
हर बदलते रंग को देख ,
दिल में तकलिफ हुई।
काश, जिंदगी इतनी करवटें ना ले।
पर , फिर समझ आया ।
यही तो है जिंदगी।
मोक्ष -कविता
नचिकेत और यम का संवाद
Kathy Upanishad was written by achary Kath. It is legendary story of a little boy, Nachiketa who meets Yama (the Indian deity of death). Their conversation evolves to a discussion of the nature of mankind, knowledge, Soul, Self and liberation.
आचार्य कठ ने उपनिषद रचना की। जो कठोपनिषद कहलाया। इस में नचिकेत और यम के बीच संवाद का वर्णन है । यह मृत्यु रहस्य और आत्मज्ञान की चर्चा है।
विश्वजीत यज्ञ किया वाजश्रवा ने ,
सर्वस्व दान के संकल्प के साथ।
पर कृप्णता से दान देने लगे वृद्ध गौ।
पुत्र नचिकेत ने पिता को स्मरण कराया,
प्रिय वस्तु दान का नियम।
क्रोधित पिता ने पुत्र नचिकेत से कहा-
“जा, तुझे करता हूँ, यम को दान।”
नचिकेत स्वंय गया यम के द्वार ।
तीन दिवस भूखे-प्यासे नचिकेत के
प्रतिबद्धता से प्रसन्न यम ने दिया उसे तीन वर ।
पहला वर मांगा -पिता स्नेह, दूसरा -अग्नि विद्या,
तीसरा – मृत्यु रहस्य और आत्मा का महाज्ञान।
और जाना आत्मा -परमात्मा , मोक्ष का गुढ़ रहस्य.
यज्ञ किया पिता ने अौर महाज्ञानी बन गया पुत्र ।
रौशन जहाँ -कविता
माँ के गर्भ में अजन्मा शिशु अपने
को सुरक्षित समझ ,बाहर आने पर
रोता हैं.
इस दुनिया को अपना घर मान
इंसान भी , इसे छोड़ने के
डर से रोता हैं.
क्यों यह नहीँ सोचता ?
आगे रौशन और भी “जहाँ ” हैं.
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गीता , कुरआन , बाइबल -कविता
रोशनी -कविता

रोशनी पड़ने से जगमगा उठा,
रास्ते में पड़ा कंकड़….
मैंने झुक कर उठा लिया उसे.
तभी ऊपर वाले की
आवाज़ आई.-
जिस रोशनी से यह बेजान पत्थर चमक उठा.
वह तुम पर भी तो पड़ रहीं हैं.
क्यों नहीँ अपने को चमकाते और
ऊपर उठाते हो ?
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मेरे मंदिरों में – कविता
मेरे मंदिरों में भी तुम सब
करते हो मोल -तोल.
कभी पुजारी और कभी भक्त बन कर.
बड़े पक्के हो ,
व्यापर करने में.
लेकिन क्या जानते हो ,
अपना अनमोल मोल ?
जो बिना किसी मोल -भाव
मैंने तुम्हें दिया ?
image from internet and rekha.
वक्त -कविता
कभी तो.थोड़ा थम जा
ऐ वक्त
साँस लेने दे.
ज़रा सुस्ताने दे.
घड़ी की ये सूईया भी
भागी जा रही हैं
बिना पैरों ,
अपनी दो हाथों के सहारे.
कब मुट्ठी के रेत की
तरह तुम फिसल गये वक्त.
पता ही नहीँ चला.
वह तो आईना था.
जिसने तुम्हारी चुगली कर दी.
चोट (कविता)
जीवन के इस
दौङ
में ना जाने कितनी बार
चोटें लगीं।
आँखों में कुछ कतरे
आँसू भी छलक आए।
पर अब जाना।
वे तो हौसला-अफजाई कर गये।
मजबूत बना गये।
हिम्मत बढ़ा गये।
छाया चित्र इंटरनेट से।







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