
ज़िंदगी के महाभारत में
कई चेहरे आए गए।
देखी कितनों की फ़ितरतें
नक़ाबों में छिपी।
जीवन जयकाव्य में
सारथी बन मिलते रहे
कई कृष्ण से।
हम दुआओं में
याद रखते हैं
उन्हें संजीदगी से।

ज़िंदगी के महाभारत में
कई चेहरे आए गए।
देखी कितनों की फ़ितरतें
नक़ाबों में छिपी।
जीवन जयकाव्य में
सारथी बन मिलते रहे
कई कृष्ण से।
हम दुआओं में
याद रखते हैं
उन्हें संजीदगी से।

ज़िंदगी के जंग में,
जब हम अपना सम्मान करना,
अपने लिए खड़े होना
सीखने लगते है।
तब कई लोग हम से
दूर हो जातें है।
वे साथ नहीं छोड़ते
क्योंकि वे कभी
साथ थे हीं नहीं।
बस दिखने लगती है
सब की फ़ितरत।
जो अपने हैं,
साथ खड़े मिलेंगे।

चींटियाँ हों या इंसान।
ज़िंदगी जीने की
जद्दो-जहद में,
क्या दोनों
एक सी ज़िंदगी
नहीं जी रहे?

खुले आसमान में,
जलद …. जल भरे हलके
बादलों को आज़ाद,
ऊपर उठते देखा है।
सात रंग बिखेरते
इंद्रधनुष बनते-बनाते
देखा है।
जैसे हीं वे अपने
अंदर के पानी को बोझ
बना लेतें हैं।
पल भर में पानी बन
वही जा गिरते हैं।
जहाँ से ऊँचाइयों
पर पहुँचें थे।

ख़ुशियों के खोज़ में
गुज़रती जा रही है ज़िंदगी।
कितनी गुजारी यादों में
कितनी कल्पना में ?
है क्या हिसाब?
ग़र आधी ज़िंदगी गुज़ारी
अतीत के साये में
और भविष्य की सोंच में।
फिर कैसे मिलेगी ख़ुशियाँ ?
और कहते है –
चार दिनों की है ज़िंदगी,
चार दिनों की है चाँदनी ।
Wandering mind not a happy mind ( A research result)
Harvard psychologists Matthew A. Killingsworth and Daniel T. Gilbert used a special “track your happiness” iPhone app to gather research. The results: We spend at least half our time thinking about something other than our immediate surroundings, and most of this daydreaming doesn’t make us happy.
https://news.harvard.edu/gazette/story/2010/11/wandering-mind-not-a-happy-mind/

अक्सर ज़ुबान पर लगे
सयंम के पहरे स्याह पलों
में बिखर जातें है।
दिल की गहराइयों में
छुपी बातें, लबों पर
बेबाक़ी से छलक आतीं हैं।
दिल से दिल की बातें
करनी हो तो चरागों के
जश्न से बेहतर अँधेरे हैं।
मनोवैज्ञानिक तथ्य– देर रात को बात करने पर ज्यादातर लोग सच बोलते हैं, क्योंकि रात को दिमाग थका हुआ होने के कारण ज्यादा नहीं सोच पाता है।
Psychology says – Night Is The Best Time To Have A Deep Conversation With Someone, According To Experts

दिव्य प्रेम के जश्न,
रास में डूब,
राधा इंद्रधनुष के रंगों से
नहा कर बोली कान्हा से –
हम रंगे हैं रंग में तुम्हारे।
रंग उतारता नहीं कभी तुम्हारा ।
कृष्ण ने कहा- यह रंग नहीं उतरता,
क्योंकि
राधा ही कृष्ण हैं और
कृष्ण ही राधा हैं।

गोपाल सहस्रनाम” के 19वें श्लोक मे वर्णित है कि महादेव जी देवी पार्वती जी को बतातें है कि एक ही शक्ति के दो रूप है – राधा और माधव(श्रीकृष्ण)।यह रहस्य स्वयं श्री कृष्ण ने राधा रानी को भी बताया। अर्थात राधा ही कृष्ण हैं और कृष्ण ही राधा हैं।

कई बार लगता है,
ऊपर वाला कुछ
लोगों को ज़िंदगी में
हमारा इम्तहान
लेने भेजता हैं।
जब तक हम अपने लिए
हौसले के साथ खड़ा होना
नहीं सीख लेते।
यह इम्तहान चलता रहता है।

ज़िंदगी रोज़ एक ना एक
सवाल पूछती है।
सवालों के इस पहेली में
उलझ कर, जवाब ढूँढो।
तो ये सवाल बदल देती है।
ज़िंदगी रोज़ इम्तहान लेती है।
एक से पास हो या ना हो।
दूसरा इम्तहान सामने ला देती है।
अगर खुद ना ले इम्तहान,
तो कुछ लोगों को ज़िंदगी में
इम्तहान बना देती है।
बेज़ार हो पूछा ज़िंदगी से –
ऐसा कब तक चलेगा?
बोली ज़िंदगी – यह तुम्हारा
नहीं हमारा स्कूल है।
तब तक चलेगा ,जब तक है जान।
बस दिल लगा कर सीखते रहो।

समुंदर की लहरें,
जमीं का ज़ख़्म भरने की
कोशिश में मानो बार बार
आतीं-जातीं रहतीं है।
वक्त भी घाव भरने की
कोशिश करता रहता है।
ग़र चोट ना भर सका,
तब साथ उसके
जीना सिखा देता है।
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