ज़िंदगी के शतरंज पर
सम्बंधों की गोटियाँ ना खेलो।
ग़र किसी की ज़्यादती
बिना जवाब दिए झेल गए,
तब जवाब ऊपरवाला देता है।
महाभारत रचने में महारत रखने वालों
का भी यही हश्र हुआ था।

ज़िंदगी के शतरंज पर
सम्बंधों की गोटियाँ ना खेलो।
ग़र किसी की ज़्यादती
बिना जवाब दिए झेल गए,
तब जवाब ऊपरवाला देता है।
महाभारत रचने में महारत रखने वालों
का भी यही हश्र हुआ था।

कहते हैं त्रुटि कपड़ों में हैं।
पर वे प्राचीन मूर्तियाँ जो मंदिरों में पाषाणों पर
युगों-युगों पहले उकेरी गई सौंदर्यपूर्ण मान।
उन्हें अश्लील या अर्ध नग्न तो नहीं कहते।
आज़ कहते हैं ग़लती लड़कियों की है।
क्या तब लोगों की निगाहें सात्विक थीं
या तब सौंदर्य बोध अलग था।
सुनते है, सब दोष मोबाइल का है।
बौद्ध भिक्षुकों के तप स्थली अजन्ता गुफाओँ में
उकेरे बौद्ध धर्म दृश्य और नारी सौंदर्य शिल्पकारी,
उत्कृष्ट कलात्मकता की है पराकाष्ठा।
हमारी प्राचीन संस्कृति कहती कुछ और है।
और आज कुछ और कहा जाता है।
भूल कहाँ है? गलती किसकी है?
चूक कहाँ हुई? क़सूर किसका?
सज़ा किसे?
गुनाहगार कोई, सज़ा पाए बेगुनाह?

कई जंग अक्सर हम अपने आप से हैं लड़ते,
ख़्वाबों, ख़्वाहिशों और दुनियादारियों की।
कभी दिल से जंग पेचीदागियों भरा!
कभी दिमाग़ से मामला इश्क़ भरा।
कभी पूरे होते ख़्वाब, कभी क़त्ल होतीं ख्वाहिशें।
फिर भी सुर्ख़-रु दिल धड़कता रहता है।
सब लड़ते रहते है अपनी-अपनी जंग।
ये हैं ज़िंदगी के रंग।

अक्सर लोग हमें और हम लोगों को
आँखों हीं आँखों में, बिना समझे,
पूरे भरोसे के साथ पढ़ते रहते है।
कभी ख़त,कभी सागर की तहरीरों,
कभी परियों, देव, दानवों, दोस्तों,
दुश्मनों की कहानियों की तरह।
पर भूल जातें हैं कि जो ग़लत पढ़ लिया
सामने वाले को तो
सज़ा औ मायूसियाँ ख़ुद को मिलेंगी।
अनजाने हीं खो देंगे किसी हमदम को।

“इंतज़ार आत्मा से हो तो पूरी होती हैं” – शबरी से राम ने कहा। “रावण तो बहाना है। कुछ कहानियाँ रची जातीं हैं, युगों-युगों तक कहे जाने के लिए। वे इतिहास बन जाती हैं । लीला तो रची जाती हैं, इंसानों को समझाने के लिय। रावण तो बस बहाना है। मुझे तेरे पास आना था।”
फिर कहा राम ने – “पशु बली से द्रवित होते हैं क्या वनों में बसे भील? क्यों हुई द्रवित तू? क्यों यौवन में किया गृह त्याग? तेरी पुकार कैसे करता मैं अनसुनी। चल कर आया तुम तक। बताने तुझे, ना रहता है यौवन-सौंदर्य, ना ऊँच-नीच।सिर्फ़ रह जाती है अटूट भक्ति, जब श्रमणा बन जाती है शबरी।”
तेरे एक रक्त बूँद से दरिया हुआ रक्ताभ और तेरे हीं चरण रज से जल हुआ स्वच्छ। तब भी नहीं जाना तुने क्या अपना तप और बल? ना तूने मुझे देखा, ना जाना। बरसों से, मेरे जन्म पूर्व से ताकती रही राहें मेरी। चखती-चुनती मीठे बेर, सजाती रोज़ पुष्प। सोंच, ना जाने किस पल आ जायें राम? समाधिस्थ होते गुरु मतंग के आशीष के भरोसे प्रतिक्षारत – “राम करेंगे तेरी चिंता और धरेंगे ध्यान और दिलाएँगे मोक्ष। ना ढूँढ उन्हें, वे ढूँढेंगे तुझे।”
शबरी, काल को तुने नहीं जाना क्या? देता नहीं किसी को एक पल ज़्यादा, ना एक पल कम। आयु पूरी होते ले जाने का बना लेता है बहाना।ना भ्रम में रह। रावण भी जाता किसी ना किसी विधि संसार से। रावण तो एक बहाना था। अम्मा, मुझे तो तेरे पास आना था।
शुभ गुरु पूर्णिमा !!


सब उलझे हैं पाने में सिर्फ़ स्कूल-कॉलेज का ज्ञान,
दुनियावी साधन, धन और मान।
नहीं पाते जान,
अपने अंदर और ब्रह्मांड में गूँजते कम्पन,
पर कॉसमिक एनर्जी की करते हैं बात।
ठीक कह गए हैं कबीर-
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
पैरों में लगे धूल झड़ाते, पूछा उनसे-
क्यों बिखरे हो यूँ? राहों में पड़े हो पैरों तले?
खिलखिला कर राहों के रज ने कहा –
कभी बन जाओ ख़ाक…माटी।
हो जाओ रेत-औ-रज,
ईश्वर और इश्क़ की राहों पर।
समझ आ जाएगा,
ना खबसूरती रहती है, ना जुनून।
जब अहं खो जाए, हो जाए इश्क़ उससे।
दुनिया हसीन बन जाती है गर्द बन कर।
ज़र्रा-ज़र्रा मुस्कुरा उठता है।

ग़र ख़ुशियाँ और सुकून चाहिए,
तब अपने-आप से ना लड़ो।
ना अपने-आप से हारो।
प्यार करो अपने आप से,
ईमानदार रहो, सच बोलो।
याद रखो,
तुम्हारे सब से अपने बस तुम ही हो।
बाक़ी सब तो परखते रहते हैं।
जैसे सोना परखा जाता है
कसौटी पर घस-घस कर।
जिससे तुम कुछ पाओगे नहीं।

बारिश में काग़ज़ की कश्तियाँ तैराते बच्चे
कल दुनिया के समंदर में ग़ुम हो जाएँगें या
खुद विशाल सागर बन जाएँगें।
तितलियाँ पकड़ते नन्हे फ़रिश्ते
दुनिया में गुमनाम हो जाएँगे या
अपनी सफ़ल दुनिया सज़ायेगें।
बच्चों का बचपना बनता है उनकी ज़िंदगी।
ये बचपन का लम्हा पल में गुज़र जाएगा।
जैसा आज़ देंगे, कल वे वही बन,
वही लौटाएँगें।

अक्सर लड़कियाँ को सबक़ – ढके रहना सीखो।
सहना-चुप रहना सीखो, कहना नहीं।
लड़कों के सबक़ होतें हैं – लड़के हो, रोना नहीं,
आँसू नहीं बहाना, ज़िम्मेदार और मज़बूत रहना।
अंदर हीं अंदर घुटती भावनाओं
और दर्द के नासूर का क्या करना?
अपनी तकलीफ़-पीड़ा किसे है बतानी?
अपने लिए खड़े होना कौन सिखायेगा?
सच तो यह है –
भावनाओं और दर्द से भरा बारूद ना बन,
पहले ख़ुद से, अपने दिल-दिमाग़-रूह से प्यार कर।
खुशहाल ज़िंदगी के हक़दार है हम सब।

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