ना समझो इसे मौन,
खोज़ रहें है, हम हैं कौन?
कर रहे हैं अपने आप से गुफ़्तगू।
हमें है खोज़ अपनी, अपनी है जुस्तजू ।
इश्क़ अपने आप से, अपने हैं हमसफ़र।
छोटी सी ज़िंदगी, छोटी सी रहगुज़र।
रेत हो या वक्त ,
फिसल जाएगा मुट्ठी से कब।
लगेगा नहीं कुछ खबर। 
ना समझो इसे मौन,
खोज़ रहें है, हम हैं कौन?
कर रहे हैं अपने आप से गुफ़्तगू।
हमें है खोज़ अपनी, अपनी है जुस्तजू ।
इश्क़ अपने आप से, अपने हैं हमसफ़र।
छोटी सी ज़िंदगी, छोटी सी रहगुज़र।
रेत हो या वक्त ,
फिसल जाएगा मुट्ठी से कब।
लगेगा नहीं कुछ खबर। 
प्यासे मृग सी कशाकश में,
मृगतृष्णा के पीछे भागते
बीतती है दिन-रात।
कट जाती है ज़िंदगी फ़क़त
मरीचिका सी उलझन में।
बता वक्त ख़ता ढूँढे या सज़ा?


यह तो वक़्त वक़्त की बात है।
टिकना हमारी फ़ितरत नहीं।
हम तो बहाव ही ज़िंदगी की।
ना तुम एक से रहते हो ना हम।
परिवर्तन तो संसार का नियम है।
पढ़ लो दरिया में
बहते पानी की तहरीरों को।
बात बस इतनी है –
बुरे वक़्त और दर्द में लगता है
युग बीत रहे और
एहसास-ए-वक़्त नहीं रहता
सुख में और इश्क़ में।

कहते हैं,
बुरा हो या भला हो,
हर वक्त गुजर जाता है।
पर कुछ वक्त कभी मरते नहीं,
कभी गुजरते नहीं।
जागते-सोते ख़्वाबों ख़्यालों में
कहीं ना कहीं,
शामिल रहते हैं।
ज़िंदगी का हिस्सा बन कर।

समय गूंगा नहीं
बस मौन है,
वक्त , वक्त पर बताता है,
किसका वक्त है
अौर
किसका कौन है!
Unknown
वक्त ने गुजरते-गुजरते
पलट कर पूछा –
जब भी होते हो खुश या दुखी ,
कहते हो – यह वक्त गुजर जायेगा।
फिर मेरे गुजरने पर याद क्यों करते हो?
हमने कहा, क्योंकि
तुम्हारी ठोकरों ने हमें तराशा है………………
जिंदगी के हसीन पलों को
कितनी भी बार कहो – थम जा !!
पर यह कब रुकता है?
पर दर्द भरे पलों का
बुलाअो या ना बुलाअो,
लगता है यह खिंचता हीं चला जा रहा है………
पता नहीं समय का खेल है या मन का?
पर इतना तो तय है –
वक्त बदलता रहता है………….
यह काल चक्र चलता रहता है।
जैसा भी समय हो, बीत हीं जाता है ……….
बेचैन लहरें किनारे पर सर पटकती,
कह रहीं हैं – ये सफेद झाग, ये खूबसूरत बुलबुले
बस कुछ पल के लिये हैं।
जिंदगी की तरह……
बीत रहे वक्त अौ लम्हे को…..
जी लो जी भर के।

You must be logged in to post a comment.