दूसरी दीवाली

पहली बार देखा और सुना साल में दो बार दीवाली!

दुःख, दर्द में बजती ताली.

साफ़ होती गंगा, यमुना, सरस्वती और नादियाँ,

स्वच्छ आकाश, शुद्ध वायु,

दूर दिखतीं बर्फ़ से अच्छादित पर्वत चोटियाँ.

यह क़हर है निर्जीव मक्खन से कोरोना का,

या सबक़ है नाराज़ प्रकृति का?

देखें, यह सबक़ कितने दिन टिकता है नादान, स्वार्थी मानवों के बीच.

सूरज

थका हरा सूरज रोज़ ढल जाता है.

अगले दिन हौसले से फिर रौशन सवेरा ले कर आता है.

कभी बादलो में घिर जाता है.

फिर वही उजाला ले कर वापस आता है.

ज़िंदगी भी ऐसी हीं है.

बस वही सबक़ सीख लेना है.

पीड़ा में डूब, ढल कर, दर्द के बादल से निकल कर जीना है.

यही जीवन का मूल मंत्र है.

चोट का दर्द

कहते हैं चोट का दर्द टीसता है

सर्द मौसम में.

पर सच यह है कि

सर्द मौसम की गुनगुनी धूप,

बरसाती सूरज की लुकाछिपी की गरमाहट

या जेठ की तपती गर्मी ओढ़ने पर भी

कुछ दर्द बेचैन कर जाती हैं.

दर्द को लफ़्ज़ों में ढाल कर

कभी कभी ही राहत मिलती है.

दिल और आत्मा का दर्द

 

दिलों- दिमाग़ को दर्द जमा करने का कचरादान ना बनाओ.

खुल कर जीने के लिए दर्द को बहने देना ज़रूरी है –

बातों में, लेखन में …..

खुल कर हँसने के लिए खुल कर रोना भी ज़रूरी है,

ताकि दिल और आत्मा का दर्द आँसुओं में बह जाए.

मुस्कुराते है….

मुस्कुराते है….

अपने दर्द को छुपाने के लिए,

अपनों का हौसला बढ़ाने के लिए,

ग़मों से दिल को बहलाने के लिए.

पर  क्यों इससे भी शिकायत है?

 

कैद तारीखों का

दीवार पर लगे कैलेंडर पर
आज भी तारीख और साल वही है ।
ठहर गई है वह तारीख जिंदगी में भी ।
रिहा कर दो , बख्श दो तारीखों के कैद से ।
हाजिरी लगाना दर्द देता है इस मुकदमे में।

 

 

क्यों चुप है चाँद ?

क्यों आज चुप है चाँद ?

ना जाने कितनी बातों का गवाह

कितने रातों का राज़दार

फ़लक से पल पल का हिसाब रखता,

कभी मुँडेर पर ,

कभी किसी  शाख़-ए-गुल को चूमता,

गुलमोहर पर बिखरा कर अपनी चाँदनी अक्सर

थका हुआ मेरी बाहों में सो जाता था.

किस दर्द से बेसबब

चुप है चाँद ?

ख़ुद को ख़ुद से

कुछ उलझा उलझा ,

कुछ रूठा रूठा सा है वजूद अपना

ख़ुद को ख़ुद से याद करूँ कैसे ?

करना है ख़ुद को ख़ुद से आज़ाद .

करुँ कैसे ?

बड़ा उलझा प्रश्न है.

कभी कभी उठने वाली कसक,

मन की दर्द , पीड़ा , विरह

किसी को समझाऊँ कैसे ?

अपने से, अपने रूह से बात करूँ कैसे ?

ज़िंदगी के रंग -114

दर्द ने बताया

समंदर बाहर हो या

दिल अौ आँखों के अंदर .

दोंनो खारे होते हैं.

ज़िंदगी के रंग -111

When Sun rises, the sky brightens and Venus fades away in the daytime sky. This is Venus the Morning Star

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ज़िंदगी से हिसाब करना है

आहिस्ता- आहिस्ता…..

पहले दर्द में जीने का सबक़ तो सीख लें.

काली रात के बाद

सुबह के तारे का इंतज़ार है.

इंतज़ार है सुबह के तारे का ……

और उगते सूरज के साथ उसके खो जाने का ……

When Sun rises, the sky brightens and Venus fades away in the daytime sky. This is Venus the Morning Star.

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