शांती-चैन की खोज

समय के साथ भागते हुए लगा – घङी की टिक- टिक हूँ…

तभी

किसी ने कहा  – जरुरी बातों पर फोकस करो,  

तब लगा कैमरा हूँ क्या?

मोबाइल…लैपटॉप…टीवी……..क्या हूँ?

सबने कहा – इन छोटी चीजों से अपनी तुलना ना करो।

हम बहुत आगे बढ़ गये हैं

देखो विज्ञान कहा पहुँच गया है………

सब की बातों  को सुन, समझ नहीं आया 

आगे बढ़ गये हैं , या उलझ गये हैं ?

अहले सुबह, उगते सूरज के साथ देखा

लोग योग-ध्यान में लगे 

पीछे छूटे शांती-चैन की खोज में।

 

 

 

तुलना

Accept your dear ones , as they are !!!!

आज कहीं कुछ पढ़ते हुए,

बरसों पुरानी अपनी ही बोली कुछ पंक्तियां याद आ गई  –

मेरी तुलना ना करो कोई…….

जैसी  हूँ बस मैं ऐसी ही हूँ !!!!!

मुझे  कविता से कहानी बनाने 

या 

 सुबह के सूरज के बदले, दिन का दमकता सूरज बनने ना कहो।

जैसी हूं वैसे ही रहने दो।

 इतने सालों बाद अपनी ही बातों 

        की गहराई अब समझ आती है …..