एक बात तय है
आजाद खयालों ,
विचारों का होना….
चट्टानों पर सर पटकने…टकराने,
आंधी और तूफान से
लड़ने जैसी चुनौती है।

एक बात तय है
आजाद खयालों ,
विचारों का होना….
चट्टानों पर सर पटकने…टकराने,
आंधी और तूफान से
लड़ने जैसी चुनौती है।

आसमान छूने की चाहत छोड़,
कैद कर लिया है अपने को,
अपनी जिंदगी को,
खुले दरवाजे और शीशे की कुछ अजनबी दीवारों, खिड़कियों में।
जैसे बंद पड़ी किताबें,
कांच की अलमारी से झांकती हैं अपने को महफ़ुज मान,
पन्नों में अपनी दास्तानों को कैद कर।
अब खाली पन्नों पर,
अपने लफ्ज़ों को उतार
रश्म-ए-रिहाई की नाकाम कोशिश कर रहें हैं।
जब जिंदगी से कोई आजाद होता है,
किसी और को यादों की कैद दे जाता है.
सीखना चाह रहे हैं कैद में रहकर आजाद होना।
काँच के चश्मे में कैद आँखों के आँसू ..अश्कों की तरह.

दर्द ने बताया
समंदर बाहर हो या
दिल अौ आँखों के अंदर .
दोंनो खारे होते हैं.


सुना था जिंदगी के सफ़र में,
ऐसे कई मोङ आते हैं
जहाँ कोई ना कोई छूट जाता हैं .
यह भी सुना-
छोटी सी है जिंदगानी
उम्र दो-चार रोज़ की मेहमान है .
मौसम रोज बदलते हैं…….
पर ऐसे बिना बोले
कोई अपना जाता है क्या ?

जिंदगी रोज़ नया कुछ सिखाती है, बशर्ते हम सीखना चाहें।
सुबह की शीतल बयार
कानों में कुछ कह रही थी …,..
उन पर भरोसा मत करो
जो दिलों को तकलीफ़ देते हों,
अपने वो हैं जो
पल भर का भी सुकून दे ,
हौसला , तस्सली दे .

जब तक फूलों सी
ख़ुशबू औ नज़ाकत थी .
बेदर्दी से पेश आते रहे लोग .
अपने को काँटे सा कठोर दिखाने के बाद
हम तो नहीं बदले पर
लोग बदल गए….
कुछ सुधर से गए हैं…..

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