ज़िंदगी के रंग – 190

एक बात तय है

आजाद खयालों ,

विचारों का होना….

चट्टानों पर सर पटकने…टकराने,

आंधी और तूफान से

लड़ने जैसी चुनौती है।

खुले दरवाजे, शीशे की अजनबी दीवारें, खिड़कियाँ

आसमान छूने की चाहत छोड़,

कैद कर लिया है अपने को,

अपनी जिंदगी को,

खुले दरवाजे और शीशे की कुछ अजनबी दीवारों, खिड़कियों में।

जैसे बंद पड़ी किताबें,

कांच की अलमारी से झांकती हैं अपने को महफ़ुज मान,

पन्नों में अपनी दास्तानों को कैद कर।

अब खाली पन्नों पर,

अपने लफ्ज़ों को उतार

रश्म-ए-रिहाई की नाकाम कोशिश कर रहें हैं।

Painting courtesy- Lily Sahay.

जिंदगी के रंग- 189

जब जिंदगी से कोई आजाद होता है,

किसी और को यादों की कैद दे जाता है.

सीखना चाह रहे हैं कैद में रहकर आजाद होना।

काँच के चश्मे में कैद आँखों के आँसू ..अश्कों की तरह.

जिंदगी के रंग-188

अपने हों, हवा-ए-फिजा, उड़ता धुँआ या धुंध हो।

जिनके रुख का पता हीं ना हो ,

उन्हें परखने की कोशिश बेकार है ।

क्यों नहीं आज़माना  है, 

तब्सिरा….. समिक्षा करनी है अपनी? 

ईमानदारी से झाँकों अपने अंदर,

या मेरे अंदर…… .आईने ने कहा।

सारे जवाब मिल जायेंगें।

तारीखें चुभती है!!

जाना जरूरी था,
तो कम से कम इतनी राहत
इतना अजाब तो दे जाते…
आँखों में सैलाब दे जानेवाले,
कैलेंडर के जिन पन्नों के साथ हमारी जिंदगी अटकी है।
उसमें से कुछ तारीखें तो मिटा जाते ।
ये तारीखें चुभती है।
 

 

 

 

 

 

कैद तारीखों का

दीवार पर लगे कैलेंडर पर
आज भी तारीख और साल वही है ।
ठहर गई है वह तारीख जिंदगी में भी ।
रिहा कर दो , बख्श दो तारीखों के कैद से ।
हाजिरी लगाना दर्द देता है इस मुकदमे में।

 

 

ज़िंदगी के रंग -114

दर्द ने बताया

समंदर बाहर हो या

दिल अौ आँखों के अंदर .

दोंनो खारे होते हैं.

छोटी सी जिंदगी

सुना था जिंदगी के सफ़र में,

ऐसे कई मोङ आते हैं

जहाँ  कोई ना कोई छूट जाता हैं .

यह भी सुना-

छोटी सी है जिंदगानी

उम्र दो-चार रोज़ की मेहमान है .

मौसम रोज बदलते हैं…….

पर ऐसे बिना बोले

कोई  अपना जाता है क्या ?

ज़िंदगी के रंग -110

जिंदगी रोज़ नया कुछ सिखाती है, बशर्ते हम सीखना चाहें।

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सुबह की शीतल बयार

कानों में कुछ कह रही थी …,..

उन पर भरोसा मत करो

जो दिलों को तकलीफ़ देते हों,

अपने वो हैं जो

पल भर का भी सुकून दे ,

हौसला , तस्सली दे .

ज़िंदगी के रंग -113

जब तक फूलों सी

ख़ुशबू औ नज़ाकत थी .

बेदर्दी से पेश आते रहे लोग .

अपने को काँटे सा कठोर दिखाने के बाद

हम तो नहीं बदले पर

लोग बदल गए….

कुछ सुधर से गए हैं…..