बेकार नहीं जाती मेहनत

Topic by YQ

क़ौन सुने अनकही

झोंके ने मुआफ़ी माँग भी ली तो क्या,

दरख़्त से टूटे पत्तों ने कहा —

हम तो बिखर ही गए यहाँ।

ज़ख़्म भर भी जाएँ तो क्या,

निशान तो रहते हैं सदा।

कौन सुने अनकही दिल की दास्ताँ,

हर कोई अपने आप में गुम यहाँ।

आग़ाज़

जीते अपने हार से!

कुछ पल ग़ैर मामूली

ज़ख्मों से तराशे!!

ख़ुद को आज़माते रहो!

आइने की फ़ितरत

आदमजात

मुनासिब