कहते हैं, आज़ाद छोड़ दो,
पंछी हो या इंसान।
ग़र वापस आना होगा,
अपने-आप आ जाएगे।
पर सच्चाई तो यह है कि
राह कोई भी, कभी भी भटक सकता है,
फिर ज़माना दोष देगा।
क्यों वापस आने की आदत ना लगाई,
क्यों राह-ए-नीड़ ना सिखलाई।

कहते हैं, आज़ाद छोड़ दो,
पंछी हो या इंसान।
ग़र वापस आना होगा,
अपने-आप आ जाएगे।
पर सच्चाई तो यह है कि
राह कोई भी, कभी भी भटक सकता है,
फिर ज़माना दोष देगा।
क्यों वापस आने की आदत ना लगाई,
क्यों राह-ए-नीड़ ना सिखलाई।


आदत बन रहीं हैं दूरियाँ और दीवारें.
तमाम जगहों पर पसरा है सन्नाटा.
कमरों में क़ैद है ज़िंदगी.
किसी दरवाजे, दीवारों की दरारों से
कभी-कभी रिस आतीं हैं कुछ हँसी….कुछ आवाज़ें.
एक दूसरे का हाथ थामे खड़ी ये चार दीवारें,
थाम लेतीं हैं हमें भी.
इनसे गुफ़्तुगू करना सुकून देता है.
Spain – According to local news outlet Cope, it was captured at a park in Calahorra, and the white ‘film’ is actually seeds from the poplar tree covering the whole ground. In the video, the fire burns away the poplar fluff to reveal green grass underneath. Remarkably enough, it doesn’t set any of the trees or the grass aflame. Even a bench in the park remains untouched by the fire.
जीवन की परीक्षाओं को हँस कर,
चेहरे की मुस्कुराहट के साथ झेलना तो अपनी-अपनी आदत होती है.
जीवन ख़ुशनुमा हो तभी मुस्कुराहट हो,
यह ज़रूरी नहीं.

अपनी तो आदत थी
गैरों पर भी यकीन करने की।
अपनों ने हीं सिखा दिया शक करना।
गैरों पर भरोसा किया होता,
तब शायद धोखे कम मिले होते..
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