ब्लॉग लेखन टिप्स                   (Blog writing tips )

 

blog

 

(Age old practice of writing , black on white is best.

Don’t be too  ornamental.

 bold font may be used for strong expression.)

मुझे इस बात की बड़ी खुशी हैं , ब्लॉग की हमारी यह दुनिया अच्छे लोगों से भरी हैं. मेरी  कहानी और लेखों को पढ कर मुझे  कुछ  अनमोल सुझाव मिले. जो मैं आप सबों के साथ बाँटना चाहती हूँ.

इस रंगीन दुनियाँ में सब ओर रंग बिखरे हैं. पर सफ़ेद पर काले लिखावट ही आँखों को सुकून देते  हैं.

लेख को ज्यादा  सजावट, बनावटी बना देता हैं. अतः स्वभाविकता बना रहे इसका ख़याल रखें.

 बोल्ड और स्वभाविक अक्षरों के प्रयोग से अपनी भावनाओं को ज्यादा सही तरीके से व्यक्त किया जा  सकता हैं. अपनी बात को स्पष्ट और प्रभावशाली बनाने में बोल्ड अक्षर सहायक होते हैं.

 

 

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 am I a jigshaw puzzle ?

jp

Every time i broke into pieces.

And fix  all the broken pieces.

Just like a jigshow puzzle.

Again n again….n

A..G..A…I..N

Expecting it to be the last one..

But now I am immune and strong.

Veils, Halos & Shackles     (book review of an international poetry collection)     बेडियों और  घूंघट में  उलझी नारी की आभा  मंडल  ( एक अन्तराष्ट्रीय पुस्तक की समीक्षा)

यह काव्य   महिलाओं पर हुई हिंसा , उत्पीड़न और भेदभाव की  घटनाओं पर आधारित  कविताओ का   संकलन हैं. महिलाओं पर  दुनिया में हो रहे दुर्व्यवहार को कविताओ  में पिरो कर, दुनिया को दिखाने की  अद्भुत और अनोखी  कोशिश हैं.

लौ दिलों में जलती रहे – महिलाओं के अपमान की कहानी सीता और द्रौपदी के काल से चली  आ रही हैं. पर आज़ इसका विकृत रुप डराने लगा हैं. इस पुस्तक का उद्देश्य हैं , हर जगह , हर काल में होनेवाली इस मानसिक विकृति को हम ना भूलें और इस जलती लौ को मशाल बना इसका सामना करे. इसके शिकार को नहीँ, दोषी को नीची नज़र से देखें. इसका सामना निर्भय हो कर करें.

24 देशों के 180 विचार लिखते कवि – नारी को सम्मान देनेवालों की कमी नहीँ हैं. इस संकलन में  दुनिया के दो  दर्जन देशों के विद्वानों -मनीषियों का योगदान हैं. उनकी भावनाओं की अभिव्यक्ति 250 से अधिक कविताओं के द्वारा हुई  हैं.

कवियों के दिल में अनछुए कोने में  झांकने का द्वार -” वेल्स हैलोज़ और शैकेल्स ” यह मार्मिक संकलन आपको उनके दिलों के दर्द भरे पहलुओं के करीब ले जायेगा. इसमें लिखने वालों में से बहुतों ने निसंकोच अपने जीवन की दर्द भरी दास्तान बयाँ की  हैं. यह वास्तव में बड़े हिम्मत की बात हैं. वरना अक्सर लोग ऐसी बातों को दबाने में यकीन रखते हैं.

पुरुषों की दुनिया  – अक्सर कुछ लोगों की गलतियों की वजह से सभी  पुरुषों पर प्रश्न चिन्ह लग जाता  हैं. पर यह महाकाव्य पुरुषों की  दुनियाँ के पुरुष कवियों की व्यथा भरी कवितायें भी सुनाता हैं उन्हीं की जुबानी. जिन महिलाओं के साथ दुर्घटनायें होती हैं.उनके परिवार के पुरुषों पर क्या बीतती हैं ?भुक्त भोगी के परिवारों और मित्रों की व्यथाएं  कैसी होती हैं ? क्या कभी ख़याल आया हैं ? उनकी वेदना और व्यथा को कविताओं का रुप दिया हैं, इस संकलन ने.

 प्रेरणा के श्रोत– दुनिया की वह आधी आबादी जिसे हम शक्ति ,दुर्गा , काली , मरियम या मदर मैरी कहते हैं.सभी और अनाम नारी इस महा रचना की प्रेरणा श्रोत हैं.

दो दूर और अलग संस्कृति के  देश के सम्पादको का सम्मिलित प्रयास  – आज़ पूरा विश्व  ग्लोबल या  वैश्विक हो गया  हैं. ऐसे में इस समस्या को  वैश्विव स्तर पर देखने का प्रयास वास्तव में प्रशंसनीय हैं.  यह पुस्तक देश , भाषा , धर्म, सम्प्रदाय, आदि के बंधन से ऊपर उठ कर महिलाओं की अनसुनी आवाज़ को बुलंदी  और हौसला देता हैं.   इस  के दोनों सम्पादक तारीफ़ के हकदार हैं.  चार्ल्स फिश्मैन और  स्मिता सहाय  वे दो नाम हैं.

 2013 में निर्भया ज्योति के गुजरने के बाद से यह वृहद अभियान शुरू हुआ. इसका गर्भ काल लम्बा था. 2016 अप्रैल में  इसका जन्म हुआ और यह पुस्तक सामने  आया. अब यह पुस्तक आमेजन पर उपलब्ध हैं – 25% की छूट के साथ.

विश्व की सर्वश्रेष्ठ कविताओं का खजाना – यह दुनिया के नामी और आम  कविओ के कविताओं का संकलन हैं. यह भुक्तभोगी कवियों  और  कवित्रियों की  दर्द भरी  वास्तविक कविताओं का संकलन हैं. जो पाठकों के दिलों में उतर जाता हैं.

अपने पैरों पर खड़ी  महाकाव्य – इस संकलन की विशेषता हैं , यह आरम्भ से अंत तक बिना किसी सहायता या अनुदान के तैयार की गई  हैं.  आज़ इस बात ज़रूरत हैं कि ऐसी पुस्तकों को शैक्षणिक संस्थानों में स्थान दिया जाये और ग्रांट व  अनुदान से प्रोत्साहित किया जाये. ताकि भविष्य में भी ऐसी पुस्तकें सामने आयें.
वैसे , सम्मान की बात हैं कि निर्भया  से उपजी यह व्यथा कविता संकलन को विदेशों में पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा हैं..

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मोबाईल फोन छुट्टी दिवस -व्यंग (Holiday for mobile phone -satire) #2

मोबाईल के छुट्टी माँगने के भयंकर सपने से जागते ही मैंने उसे अपने कलेजे से लगा लिया. अब  वह हमेशा मेरे दिल के करीब रहता. शर्ट के ऊपर के पाकेट में उसका आशियाना बन गया.

इतने पर भी मेरे दिल को  तसल्ली नहीँ हुई.  मोबाईल के छुट्टी पर जाने की कल्पना से अक्सर दिल डर से धड़कने लगता. लोगों ने कहा धडकी की बीमारी हो गई हैं मुझे. बड़ा टोना टोटका चला. किसी ने हौलदिल पहनने  कहा. मैं  सीधे डॉक्टर के पास पहुँचा.

दिल का हाल अच्छा नहीँ था. मुझे सख्त आराम का निर्देश देते हुये मेरी दुनिया और मोबाईल से मुझे अलग कर, अस्पताल में भर्ती कर दिया गया.

वहाँ सचमुच मुझे बड़ी शान्ति और सुकून मिला. ना बार बार की घंटी की आवाज़ ना उसे चार्ज करने का तनाव.

घर वापस आ कर  बार बार बजती मोबाईल मुझे बड़ी नागवार गुजरी. तभी मेरे मोबाईल ने बड़े व्यंग से पूछा – क्यों , अब समझ आया ? क्यों मैं छुट्टी माँग रहा था? या फिर से अस्पताल जाने और डाक्टर को पैसे देने की मर्जी हैं ?
  

 (हौलदिल – संग यशब नाम के चौकौर पत्थर के टुकडे   पर कुरान की  एक विशेष आयत खुदी  रहती हैं. इसे रोगोंबाधा  दूर करने के लिये पहना जाता हैं.)

 WHO and various institutions have found   negative effect of excessive use of mobile  on our health.

 

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मोबाईल फोन छुट्टी दिवस -व्यंग (Holiday for mobile phone -satire) #1

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मैंने जागते के साथ  बंद आँखों से अपने मोबाइल फोन की ओर हाथ बढ़ाया. हाथों में चुभन हुई. मेरी आँखें अपने आप खुल गई. आश्चर्य से देखा. मेरा मोबाइल गुस्से भरी लाल आँखों से मुझे देख रहा हैं. उसके शरीर पर काटें और सिर पर दो सींग उग आये हैं. उसके हाथों में एक बोर्ड हैं. जिस पर लिखा हैं -मेरा  छुट्टी दिवस.

उसने मुझे बड़ी बेरुखी से देखा और पूछा – मेरा रविवार कब हैं ? मुझे भी सप्ताह में एक दिन की छुट्टी चहिये.फिर वह अपने आप ही बुदबुदाने लगा -ना रात देखते , ना दिन. बस काम , काम और काम. मेरी ओर देख कर जोर से बोला -काम की अधिकता से मुझे बर्न   आऊट  सिंड्रोम हो गया हैं और उसकी सारी बत्तियां बुझ गई.

बिना मोबाईल मुझे दुनियाँ अंधकारमय लगने लगा. माथे पर पसीने की बूँदें छलक गई. अब क्या होगा ? सारी बातें तो इसी मोबाईल रूपी काले डब्बे में बंद हैं. मैं मोबाईल उठा पागलों की तरह चुभन के बाद भी बटन दबाने लगा और चिल्लाने लगा -तुम ऐसा नहीँ कर सकते हो.

तभी किसी ने कहा -नींद में इतना शोर क्यों मचा रहे हो ? मैं भयानक सपने से जाग गया.  ख़याल आया बात तो सही हैं. एक दिन फोन को , और हमें फोन से एक दिन की छुट्टी ले कर देखनी चाहिये.

 

 

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शब्दों और  विचारों की खोज (लेखकों के  लिये प्रेरक )Searching words n ideas (Motivational though for writers) 

It is perfectly  normal for writers to fall short of words and ideas sometimes. In my experience reading is the best solution to develop a treasure of words and ideas. So  just keep reading and of course keep smiling.and yes keep writing too!

कुछ समय पहले मैंने अपने एक ब्लॉगर मित्र को दुविधाग्रस्त पाया. विचारों और शब्दों के जाल में उलझा पाया. मेरा ख्याल हैं , हम सब कभी ना कभी ऐस समय से गुजरते हैं. ऐसे में अध्ययन करना या पढ़ना मदद कर सकता हैं. इस से हमारे पास अपने आप शब्दों  और विचारों का भंडार बन जाता हैं. बस फिर इनसे हम अपनी दुनिया बना सकते हैं. लोगों को हँसा और रुला सकते हैं. पढ़ने के लिये हमारे पास ब्लॉग और पुस्तकों की अनमोल दुनिया हैं.

 

अपनी जङें मजबूत करें – बांस की तरह (प्रेरक लेख / motivational thought )

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बांस एक तरह का घास है। चीनी बांस के पेड़  छह सप्ताह में  80 फुट लम्बे हो जाते है। यह बङी हैरानी की बात है। पर सच्चाई यह है कि इसे लगाने के चार वर्ष  बाद तक  इस में  विकास के कोई चिन्ह नहीं दिखते।  पर इसे  पानी अौर पोषण उपलब्ध कराया जाता है।  चार वर्ष के बाद   पांचवें वर्ष में  एक चमत्कार की तरह  बांस के पेड़ सिर्फ छह सप्ताह में 80 फुट बढ़ जाते हैं।

यह चमत्कार नहीं है। इतने समय यह निष्क्रिय नहीं रहता।  चार वर्षौं के दौरान बांस  अपने अस्सी फुट ऊँचाई को संभालने के लिये अपनी जङों को बनाता अौर मजबूत करता रहता है।  वर्ना यह अचानक  अपनी 80 फुट लम्बी काया को संभाल नहीं सकेगा।

हम भी थोङे मेहनत के बाद हीं सफलता की कामना करने लगते हैं। जब कि जड़ें मजबूत बनने के लिये  धैर्य  अौर परिश्रम की जरुरत होती है। प्रतिकूल परिस्थितियों और चुनौती का सामना करने की शक्ति अौर सफलता  संभालने के लिए मजबूत नींव बनने में समय लगता है। इस लिये असफलता से ङरने के बदले इसे जङों या आधार अौर नींव का निर्माण काल मानना चाहिये। जब एक घास में इतना सामर्थ है तब हम तो ईश्वार की सर्वौत्तम रचना हैं।

 

I am waiting for your valuable comments and feedbacks. I love  them.

 

 

 

 

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आँखें  ( कहानी )

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मौसम सुहाना था. वर्षा की बूँदें टपटप बरस रहीं थीं. दोनों मित्रों  की आँखे भी बरस रहीं थी.  दोनों मित्र एक दूसरे के समधी भी थे. इन्द्र ने अपने इकलौते बेटे की शादी अपने मित्र चंद्र की एक मात्र पुत्री से कर दिया था. 

दोनों दोस्त बिजनेस  में आधे – आधे पार्टनर थे. वर्षों पुरानी दोस्ती सम्बन्ध में बदल जाने से अब पार्टनरशिप के हिसाब  सरल हो गये थे. दोनों मित्र जाम टकराते हुये हिसाब की बात पर अक्सर कह बैठते -“छोडो यार ! अगर हिसाब कुछ ऊपर नीचे हो भी गया तब क्या फर्क पड़ता हैं ? अगर  घी  गिरेगा भी तो दाल में ही ना ? 

दो दिनों से इन्द्र का बेटा घर वापस नहीँ आया था. खाने -पीने का शौकीन बेटा  पहले भी ऐसा करता था. पर इस बार उसका फोन भी बंद  था. परेशान हो कर , दोनों ने उसकी खोज ख़बर लेनी  शुरू की. पुलिस स्टेशन , अस्पताल सब जगह दोनों दौड़ लगा रहे थे.
 पुलिस से मिली ख़बर सुन  वे गिरते पड़ते  लखनऊ के पास के बर्ड सेंचुरी के करीब पहुँचे.  कार सड़क के दूसरी ओर रुकवा  कर   दोनों उतरे. मन ही मन अपने अराध्य  देव से मना रहे थे, यह ख़बर झूठी निकले. सड़क पार कर पहुँचे.

इन्द्र के  जवान पुत्र का शव  सड़क के किनारे पडा  था. तभी पीछे से आई चीख सुन दोनों  पलटे. चीख  चंद्र की   पूर्ण गर्भवती पुत्री की थी. वे भूल ही गये थे. वह  कार में बैठी थी. बहुत रोकने  करने पर भी वह साथ आ गई थी. पति के शव को तो नहीँ , पर उसके चिकेन के कुर्ते के रंग को  वह दूर से ही पहचान गई. अपने हाथों से  इस्त्री कर सोने के बटन लगा कर पति को पहनने के लिये  दिया था.वह बदहवास    सड़क पर दौड़ पड़ी और सामने से आती ट्रक से टकरा गई.

दोनों मित्रों की नज़रें एक दूसरे से मिली. दोनों मनो  जड़ हो गये. उनकी कार का ड्राइवर रामधनी दौड़ता हुआ आ कर चीख पड़ा तब जैसे दोनों की तंद्रा टूटी. उनकी आँखों के सामने वर्षों पुरानी यादें नाचने लगी.

****

 दोनों मित्र   रांची  मेन रोड स्थित हनुमान मंदिर से  पूजा करके निकले. मॆन रोड की भीड़ देख दोनो चिंतित हो गये.  उन्हें जल्दी स्टेशन पहुँचना था. दोनों में दाँत काटी दोस्ती थी. जो भी करते साथ साथ करते. हनुमान जी की भक्ति हो या कुछ  और. उनकी परेशानी  बस एक थी. उन दोनों के इष्ट ब्रह्मचारी थे और वे दोनों नारी सौंदर्य के अनन्य उपासक. वरना वे लंगोट भी लाल ही बाँधते थे, ठीक हनुमान जी की तरह  और सही अर्थों में लंगोटिया यार थे.

जब वे स्टेशन पहुँचे, सामने राजधानी ट्रेन खड़ी थी. दौड़ते भागते दोनों ट्रेन मॆं पहुँचे. चेहरे पर किसी रेस में ट्राफी मिलने जैसी विजय मुस्कान छा गई. चलो , हनुमान जी की कृपा से ट्रेन तो मिल गई.

सफ़र मजे में कट रही थी. दोनों  ताश की गड्डी और शीतल पेय की बोतलें निकाल अपनी सीटों पर जम गये. बोतल के अंदर पेय परिवर्तन का ट्रिक दोनों ने ईजाद कर लिया था.

तभी दोनों की नज़रें पास के बर्थ पर अकेली यात्रा कर रही रूपवती  और स्वस्थ युवती पर पड़ी. दोनों मित्रों एक दूसरे को आँखों ही आँखों मे देख मुस्कुराये और आपस में उस पर कुछ भद्दे जुमले कसे. 

तभी वह युवती इनके पास से गुजरी. उसके जिस मोटापे पर दोनों ने  व्यंग लिय था. वह स्वभाविक नहीँ था. दरअसल वह गर्भवती थी. किसी से फोन पर कह रही थी – “हाँ , खुश खबरी हैं. बडी  पूजा और मन्नतों के बाद यह शुभ समय आया हैं. सोचती हूँ , इस बड़े मंगल के दिन सेतु हनुमान मंदिर में चोला  चढा दूँ. उन्हें ही चिठ्ठी और अर्जी भेजी थी. उन्होंने मेरी प्रार्थना सुन ली. ” 

दोनों ने नशे में झूमते हुये कहा -” यह तो टू इन वन हैं .” और  ठहाका लगाया. जल्दी ही दोनों की नशे भरी आँखें बंद होने लगी. वे  अपने अपने बर्थ पर लुढ़क गये.

सुबह अँधेरे  में ही ट्रेन कानपुर स्टेशन पहुँच गई. स्टेशन से बाहर उनकी लम्बी काली कार खड़ी थी. ड्राईवर रामधनी ने आगे बढ़ कर उनके बैग ले लिये. कार लखनऊ की ओर दौड़ पड़ी. रिमझिम वर्ष होने लगी थी. पूर्व में आकाश में लाली छाने लगी थी. वैसी ही लाली  मित्र द्वय की आँखों में भी थी. नशा अभी उतरा नहीँ  था. आँखों में नशे की खुमारी थी.

  इन्द्र ने   रामधनी से कार किसी चाये के दुकान पर रोकने कही। दोनों  कार की पिछली सीट पर सोने की कोशिश करने लगे. रामधनी ने हँस कर पूछा – “लगता हैं रात में आप लोगों की खूब चली हैं ”  रामधनी ड्राइवर कम और उनके काले कारनामों का साथी और राजदार ज्यादा था. 
दोनों सिर हिला कर ठठा कर हँस पड़े और निशाचर इन्द्र ने जवाब दिया – “अरे यार ! इतने सवेरे का सूरज तो मैंने आज़ तक नहीँ देखा हैं. 10-11 बजे से पहले तो मेरी नींद ही नहीँ खुलती हैं. “

चंद्र ने आँखें  खोले बगैर ट्रेन को इतनी सबेरे पहुँचने के लिये  एक भद्दी  गाली देते हुये कहाँ – यार बड़ी रूखी यात्रा थी  और अब यह सुबह -सुबह  चाय की खोज क्यों कर रहे हो? उसने अपने बैग से एक बोतल निकाल कर मुँह से लगा लिया. नशा कम होने के बदले और बढ़ गया.

एक ढाबे के सामने कार रुकी. अभी भी अँधेरा पूरी  तरह छटा नहीँ था. बारिश तेज हो गई थी. ठीक आगे की टैक्सी से ट्रेन वाली युवती  उतर रही थी. दोनों मित्रों की आँखें धूर्तता से चमकने लगी. रामधनी  और उनमें कुछ  बातें हुई. रामधनी ने चारो ओर नज़रें घुमाई. चारो ओर सन्नाटा छाया था.

रामधनी ने कार महिला के बिलकुल पास रोका. जब तक गर्भभार से धीमी चलती  वह महिला कुछ समझ पाती. पीछे की गेट खोल दोनों ने उसे अंदर खींच लिया. कार के काले शीशे बंद हो गये. कार  तेज़ी से सड़क पर दौड़ने लगी.

 हाथ -पैर मारती महिला  चीख रहीं थी. वह गिडगिडाते हुये बोल उठी – “मैं माँ बनने वाली हूँ. मुझे छोड़ दो. भगवन से डरो.”
रामधनी ने हड़बड़ा कर कहा -“साहब बड़ी भूल हो गई. यह तो पेट से हैं…यह माँ बननेवाली हैं. यह बड़ा भरी अन्याय होगा.” और उसने कार खचाक से रोक दी. कार एक झटके से रुक गई. जब तक किसी की समझ में बात आती. वह युवती कार का द्वार खोल बाहर निकल गई और सड़क के दूसरी ओर से आते वाहन से टकरा कर गिर पड़ी.वाहन बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ गया. सुनसान सड़क पर युवती की दर्दनाक चीत्कार गूँज उठी.. ।पास के पेङो से  पक्षी भी शोर मचाते  उङ गये।

तीनो भागते हुये उसके करीब पहुँचे. उसकी आँखें बंद हो रहीं थी. आँखों के कोरों से आँसू  बह रहे थे. शरीर दर्द से ऐंठ रहा था. उसने  अधखुली आँखों से उन्हे देखा. लड़खडाती और दर्द भरी आवाज़ में उसने कहा – ” तुम्हा…  तुम्हारा वंश कभी नहीँ बढेगा.  –  तुम्हारा वंश कभी नहीँ बढेगा.” रक्तिम होती सड़क पर उसने आखरी साँसें ली. और उसकी अध खुली आँखें ऐसे पथरा गई. जैसे वे आँखे उन्हें  ही देख रहीं हों.

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रामधनी पागलों की तरह बडबडाने लगा -” भाई जी,  उस  ने  बद्दुआ दी हैं. यह तो पूरी हो कर रहेगी. माँ बनने वाली थी. उसकी बात खाली नहीँ जायेगी. आपने देखा, उसकी आँखों में ? प्रायश्चित करना ही होगा. प्रायश्चित…” 

दोनों मित्र घबड़ा गये. उनका नशा उतर गया था. अपने को सम्भल कर वे झट कार के पास लौटे. चारो ओर फैला सन्नाटा देख चैन की साँस ली, चलो  किसी ने  देखा तो नहीँ.  शायद अपने सर्वज्ञ इष्टदेव का उन्हे स्मरण नहीँ आया.

ललाट पर आये पसीने और बरसात की बूँदें घुल मिल गये थे. इन्द्र ने तुरंत निर्णय लिया और बौखलाये रामधनी को पीछे की  सीट  पर ठेल कर बैठा स्वयं चालक की सीट पर बैठ गया. चंद्र उसके बगल की सीट पर बैठ गया.

लखनऊ पहुँचने तक कार में मौन छाया रहा. हजरतगंज चौराहे की  लाल बत्ती पर कार रुकी. तभी अचानक रामधनी कार से उतर कर हनुमान मंदिर की ओर दौड़ गया. दोनों मित्र भी कार किनारे रोक उसके पीछे पीछे मंदिर पहुँचे.

उन्होंने देखा रामधनी मंदिर के फर्श पर साष्टांग लोट रहा हैं. और हनुमान जी के चरणों में ललाट टिकाये कुछ  बुदबुदा रहा हैं. पुजारी हैरानी से उसे देख रहे हैं.

चंद्र ने लपक कर उसे उठाया और तेज़ी से कार की ओर बढ़ गया. इन्द्र  पुजारी से माफी माँगने के अंदाज़ में बोल पड़ा -“पत्नी की बीमारी से बड़ा परेशान हैं , बेचारा.” रामधनी को रास्ते भर मुँह ना खोलने का निर्देश दोनों देते रहे , और वह लगातार प्रायश्चित्त की बात करता रहा.

कभी कभी दोनों उस घटना को याद करते. तब लगता जैसे उसकी पथराई अधखुली आँखें उन्हें घूर रहीं हैं. पर जल्दी ही दोनों ने इन बातों को बिसार दिया. हँसते खेलते परिवार और बच्चों के साथ जिंदगी अच्छी कटने लगी.

****

आज़ , इतने वर्षों बाद उसी जगह पर अपनी संतान के रक्त से रक्तीम हो रहीं लाल  सड़क पर लगा जैसे एक कमजोर पड़ती  दर्द भरी आवाज़ उनके कानों मे गूँजने लगी 

 –  तुम्हारा वंश कभी नहीँ  बढेगा……

 

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मॉकटेल- पिना कोलाडा (food and drink/ beverages)

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मॉकटेल पिना कोलाडा प्यूर्टो रिको का राष्ट्रीय पेय । यह  लोकप्रिय अौर स्वास्थवर्धक होता है। यह अनानास, नारियल का दूध , चीनी और आइस क्यूब्स से बनता है।
सामग्री-
2 कप कटा हुआ अनानास
4 से 6 आइस क्यूब्स
¾ कप नारियल पानी / नारियल का दुध 200 मिलीलीटर
2 -3 बड़े चम्मच चीनी या आवश्यकतानुसार  
गार्निश के लिए कटा हुआ अनानास
बनाने की विधि-
 कटे हुआ अनानास  से ब्लेंडर  या जूसर से जूस निकाल लें। जिस ग्लास में सर्व करना है । उसे  कुछ समय पहले फ्रिज में ठंडा होने रख दें। ग्लास में अनानास जूस, नारियल पानी / दूध, आइस क्यूब्स अौर चीनी डालें। इसमें आप नारियल क्रीम भी डाल सकते हैं।  
6 आइस क्यूब्स डालें।  अनानास  से गार्निश करें अौर तुरन्त सर्व करें ।

• ताजा जूस व नारियल दूध ना होने पर पैक का उपयोग कर सकते हैं।  
•  पिना कोलाडा मॉकटेल है अतः इसमें रम नहीं ड़ाला जाता है।

 

 

 

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Picture Courtesy: Chandni Sahay

अनमोल पल (कविता)

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मुट्ठी में पकडे रेत की तरह ,

ना जाने कब वक्त फिसल गया.

जिंदगी की आपाधापी में.

वर्षों बीत गये जैसे पल भर में.

 पुराने दोस्तों से अचानक 

भेट हो जाती हैं.

तब याद आता हैं ,

दशकों बीत गये , बिना आहट  के.

तब याद आते हैं 

वे सुनहरे – रुपहले दिन.

वे यादें , आज़ भी अनमोल हैं ,

वे साथी आज़ भी अनमोल हैं.

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