नीलकंठ
जंग लगी कुंजियों से
रिश्तों के सुप्त तालों को
खोलने की कोशिश में
ना जाने कितने नील गरल
निकलते हैं इस सागर से.
इन नील पड़े चोट के निशान
दिखती नही है दुनिया को,
शिव के नीलकंठ की तरह.
पर पीड़ा….दर्द बहुत देती हैं.

आग का दरिया
नासमझी…नादानी क्या बया करे समझदारों की?
जंगल…धरा तो जल हीं रहें हैं.
दुनिया ने तरक़्क़ी इतनी कर ली नदी …पानी पर भी आग लगा दी.
अपने घर में आग लगे, दो पल भी बर्दाश्त नहीं.
बेज़ुबान जलचरों का घर- नदियाँ जलती रहें, चिंता नहीं.
यह समझदारी समझ नहीं आती.

The songs of a weaver 10: Kabir
But if a mirror ever makes you sad
you should know that it does not know you.
एक ख़्याल
एक ख़्याल अक्सर आता है.
एक रहस्य जानने की हसरत होती है.
क्या सोंच कर ईश्वर ने मुझे इस आकार में ढाला होगा?
कुछ तो उसकी कामना होगी जो यह रूह दे डाला होगा.
क्यों इतने जतन से साँचे में मूर्ति सा गढ़ा होगा?
क्या व्यर्थ कर दिया जाए इसे दुनियावी उलझनों …खेलों में?
या ढूँढे इन गूढ़ प्रश्नों के उत्तरों को,
अस्तित्व के गलने पिघलने से पहले?

WHY CLING?
Why cling to one life
till it is soiled and ragged?
The sun dies and dies
squandering a hundred lived
every instant
God has decreed life for you
and He will give
another and another and another

(translated by Daniel Liebert)
Mathnawi V. 411-414 (translated by Kabir Helminski)
The Rumi Collection, Edited by Kabir Helminski
सूरज ङूब गया
जीवन की शाम हो चली थी,
थका-हारा सूरज झुका,
थोङा रुका
….गुफ्तगु के इरादे से या
शायद फिर से आने का
वायदा करना चाहता था धरा से।
पर तभी छा गये बीच में काले बादल।
अौर बिना रुके…..
बिना कुछ कहे सूरज ङूब गया,
कभी नहीं वापस आने को।
On the 123rd birth anniversary of Subhash Chandra Bose
Life loses half its interest if there is no struggle-if there are no risks to be taken.

लोग
एक नरम मुलायम धूप
हौले हौले चलती कांच के दरवाजे से
गुजर कर पैरों तक आ गई.
गुनगुनी सी धूप सर्द मौसम में
नरम रजाई सी तलवों को ढक कर सुकून देने लगी .
कुछ ही देर में धूप की तेज़ होती गरमाहट चुभने लगी ।
कुछ लोग भी ऐसे होते हैं,
शुरू में नरम और बाद में चुभने वाले।
शुभ मकर संक्रांति, लोहड़ी व पोंगल! Happy Makar Sankranti, lohadi n Pongal!!
सूर्य दक्षिण जा बैठा और सर्द मौसम ने चादर फैला लिया. अब सूरज उत्तर की यात्रा पर निकला है, कर्क से मकर की ओर. अब रातें छोटी और दिन लम्बी होगी. सूर्य की गुनगुनी धूप में आकाश रंग-बिरंगी पतंगो से जगमगा उठेगा. नदियों-तीर्थों पर उपासक प्रकृति के सम्मान में सूर्य को नमन करेंगे. जीवन नव धान्य, गुड-तिल के माधुर्य से भर जाएगा.
मान्यता है कि काले रंग की साड़ी और मृग चर्म की कंचुकी, नीलम का आभूषण, अर्क पुष्प की माला धारण किए हुए “संक्रांति” आती है, जो सुख सम्पन्नता का प्रतीक है. मानव जीवन के आधार – प्राकृतिक को, कृतज्ञता अर्पित करते इस पावन त्योहार पर आप सबों को हार्दिक शुभकामनाएं!!
भास्करस्य यथा तेजो मकरस्थस्य वर्धते।
तथैव भवतां तेजो वर्धतामिति कामये।।
मकरसंक्रांन्तिपर्वणः सर्वेभ्यः शुभाशयाः।


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