फिजा में बिखरी खुशबू


फिज़ा
में बिखरी खुशबू खिसकती सरकती 
ना जाने कब 

पास पहुँच कर 

गले में बाँहें डाल 

अतीत की ओर खीँच  ले गई .

किसी के यादों के साये और गुलाबों के बीच ले गई .

18 thoughts on “फिजा में बिखरी खुशबू

  1. बहुत सुंदर पंक्तियां हैं ये रेखा जी । धर्मेंद्र और हेमा मालिनी अभिनीत फ़िल्म ‘आसपास’ के अंत में ध्वनित इन पंक्तियों की याद दिला दी मुझे – ‘तेरे आने की आस है दोस्त, शाम फिर क्यों उदास है दोस्त, महकी-महकी फिज़ा ये कहती है – तू कहीं आसपास है दोस्त’ ।

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    1. मैं अपने विचारों को चंद सरल पँक्तियों में अभिव्यक्त करती रहती हूँ . आप उसकी तुलना इन खूबसूरत गीतों से कर उसका मान बढ़ा देते हैँ .
      बहुत आभार जितेन्द्र जी .

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  2. bahut khub likha apne………
    वह खुशबु थी पहचानी सी,
    कब अंतर्मन झकझोर गई,
    थे धूल पड़े जिन पन्नों पर,
    उसकी परतों को खोल गई,

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    1. सचमुच यादें धूल पड़े पन्नों की परतों को खोल अंतर्मन झकझोर जातीं हैं।
      क्या तारीफ करुँ आपके कविता की ? अनमोल है…….बहुत बहुत शुक्रिया….आभार। 🙂

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    1. सुझाव के लिये बहुत आभार।
      मैंने हिंदी खुशबू का प्रयोग किया है। 🙂
      ऩुक्ता उर्दू (अरबी-फ़ारसी) शब्दों मे लगता है।

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