
फिज़ा
में बिखरी खुशबू खिसकती सरकती
ना जाने कब
पास पहुँच कर
गले में बाँहें डाल
अतीत की ओर खीँच ले गई .
किसी के यादों के साये और गुलाबों के बीच ले गई .

फिज़ा
में बिखरी खुशबू खिसकती सरकती
ना जाने कब
पास पहुँच कर
गले में बाँहें डाल
अतीत की ओर खीँच ले गई .
किसी के यादों के साये और गुलाबों के बीच ले गई .
बहुत सुंदर पंक्तियां हैं ये रेखा जी । धर्मेंद्र और हेमा मालिनी अभिनीत फ़िल्म ‘आसपास’ के अंत में ध्वनित इन पंक्तियों की याद दिला दी मुझे – ‘तेरे आने की आस है दोस्त, शाम फिर क्यों उदास है दोस्त, महकी-महकी फिज़ा ये कहती है – तू कहीं आसपास है दोस्त’ ।
LikeLiked by 2 people
मैं अपने विचारों को चंद सरल पँक्तियों में अभिव्यक्त करती रहती हूँ . आप उसकी तुलना इन खूबसूरत गीतों से कर उसका मान बढ़ा देते हैँ .
बहुत आभार जितेन्द्र जी .
LikeLiked by 1 person
bahut khub likha apne………
वह खुशबु थी पहचानी सी,
कब अंतर्मन झकझोर गई,
थे धूल पड़े जिन पन्नों पर,
उसकी परतों को खोल गई,
LikeLiked by 3 people
सचमुच यादें धूल पड़े पन्नों की परतों को खोल अंतर्मन झकझोर जातीं हैं।
क्या तारीफ करुँ आपके कविता की ? अनमोल है…….बहुत बहुत शुक्रिया….आभार। 🙂
LikeLiked by 2 people
ye aapki kavita kaa hi upaj hai….sukriya behtrin likhne ke liye…..
LikeLiked by 1 person
dhanyvad Madhusudan. agar yah meri kavita ki upaj hai, tab kahan chahungi – upaj mul rachana se jyaadaa sundar hai.
LikeLike
Sukriya apka….waise sachchaayee to sachchaayee hai…..puri kavita prakashit ho gyee hai …..aaap jarur padhiyega…
LikeLiked by 1 person
Aabhar Madhusudan, hauls badhane ke liye. kyonki is me appkai prashansha ka bhi yogdaan hai. 🙂
LikeLike
मृदु, मुलायम सुंदर पंक्तियाँ……
LikeLike
कविता सी, इस खूबसूरत तारीफ के लिये आभार सविता।
LikeLiked by 1 person
बहुत ही उम्दा !!
LikeLike
आपका बहुत आभार संजीव।
LikeLike
kya baat bahut khub
LikeLiked by 2 people
shukriya Danish.
LikeLiked by 2 people
किसी के यादों के साये और गुलाबों के बीच ले गई .
Bahut accchi line hai
LikeLiked by 2 people
bahut dhanyvad.
LikeLike
ख़ुशबू होना चाहिए।
LikeLiked by 1 person
सुझाव के लिये बहुत आभार।
मैंने हिंदी खुशबू का प्रयोग किया है। 🙂
ऩुक्ता उर्दू (अरबी-फ़ारसी) शब्दों मे लगता है।
LikeLike