खेल – खेल कर स्वस्थ रहें -मनोविज्ञन Psychology-Sports and Physical Activity Reduces Stress

पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब।
खेलोगे कूदोगे होगे खराब।

बचपन में यह जुमला अक्सर सुनने के लिये मिलता था। क्या आप विश्वास करेगें, आज यह बात विपरीत होती जा रही है। आज लोग खेल मे भाग लेते हुए तनाव के स्तर को कम करने और अच्छा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त रखने की बातें कर रहें हैं।

मेडिकल शोधकर्ताओं, डॉक्टरों अौर अमेरिकन एसोसिएशन आफ एंजाईटी एंङ ङिप्रेशन के अनुसार, खेल और नियमित व्यायाम से हम अपनी चिंताओं और अवसाद को नियंत्रित कर अपने दिमाग को राहत पहुँचा सकते हैं।साथ हीं फील गुड एहसास प्राप्त कर सकते हैं। वास्तव में यह सच्चाई भी है कि खेल , व्यायाम तथा योग तनाव से राहत प्रदान करते हैं। ये शारीरिक गतिविधियाँ तनाव कम करते हैं।

तनाव

सामान्य तनाव जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा है।पर सामान्य से अधिक तनाव या चिंता गंभीर मानसिक समस्या है। सर्वेक्षणों के अनुसार अमेरिका में हर दस वयस्क में सात गंभीर दैनिक तनाव या चिंता के शिकार होते हैं।

अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन ने 2007 – 2008 में एक सर्वेक्षण किया। इसमें पाया गया, लोगों को तनाव के कारण तथा उससे होने वाले शारीरिक और भावनात्मक तनाव में पिछले एक साल में वृद्धि हुई है।

एक ऑनलाइन सर्वेक्षण के अनुसार 14 प्रतिशत, लोग तनाव से निपटने के लिए नियमित रूप से व्यायाम करते हैं। 18 प्रतिशत दोस्तों या परिवार से बात करते हैं,। सोकर 17 प्रतिशत लोग तनाव कम करने की कोशिश करते हैं।फिल्में या टीवी देख कर14 प्रतिशत, 13 प्रतिशत संगीत सुन कर अौर खाना या मनपसंद भोजन से 14 प्रतिशत लोग तनाव कम करने की कोशिश करते हैं।

तनाव का प्रबंधन कैसे करें – मानसिक स्वास्थ्य

खेल और नियमित व्यायाम शारीरिक और मानसिक तनाव से राहत देता है। साथ हीं नींद को बढ़ती हैं।

* जीवन में बादलाव जरुरी है –
मनोरंजन, खेल, शरीरिक गतिविधियाँ , योग आदि उपलब्धि की भावना और आत्मविश्वास बढ़ाते हैं। साथ हीं जीवन में परिवर्तन लाते रहते हैं। जो मन में जमे तनाव को पिघलाता हैं।

* एंडोर्फिन – फील गुड मस्तिष्क रसायन
खेल, नियमित व्यायाम अौर शारीरिक गतिविधियाँ, हमारे शरीर में न्यूरोट्रांसमीटर या मस्तिष्क रसायन एंडोर्फिन शरीर के उत्पादन को उत्तेजित करते हैं। एंडोर्फिन हमारे मूड में सकारात्मक परिवर्तन के लिए जिम्मेदार है। एंडोर्फिन के स्तर में वृद्धि से “फील गुड” भावना आती है, दर्द कम होता है और तनाव और अवसाद में कमी आती है। खिलाङी इसे परम उत्साह की स्थिती या रनरस हाई (runner’s high) कहतें हैं।

* समाजीकरण, लोगों से मिलना -जुलना
समाजीकरण किसी भी तनाव प्रबंधन दिनचर्या का एक जरूरी हिस्सा है। लोगों से मिलने -जुलने, टीम में खेलने अौर भाग लेने से हमारे शरीर में ऑक्सीटोसिन हार्मोन का स्त्राव बढ़ाता है। ऑक्सीटोसिन हार्मोन हमें तनावरहित कर चिंता स्तर को कम करता है।

* आत्म सम्मान
क्या आप जानते हैं, आत्म सम्मान की भावना और आत्म प्रभावकारिता की भावना हमारे तनाव के स्तर को कम कर सकते हैं ? जिसे आप खेलकूद से प्राप्त कर सकतें हैं। यह आप की सुस्ती, उदासीनता, आत्म घृणा यहां तक कि अवसाद की भावनाओं को कम कर सकती है।यानि तनाव से लङने के लिये नियमित खेलकूद व व्यायाम शक्तिशाली हथियार है।

* स्वस्थ आदतें
खेलकूद व व्यायाम से अच्छी भूख लगती है। जो हमें पौष्टिक भोजन, नाश्ता और पेय पदार्थों का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करती है।साथ हीं वजन भी नियंत्रित करती हैं। इससे सोने की दिनचर्या में सुधार तथा फिटनेस आता है।

* शरीर और मन का कसरत
अध्ययनों से पता चलता है कि शारीरिक गतिविधियाँ सतर्कता और एकाग्रता में सुधार लाती हैं। यह तनाव कम कर शारीरिक ऊर्जा अौर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बढ़ातीं हैं। खेल, ध्यान आदि के समय लिये गये गहरे सांस एंडोर्फिन का उत्पादन कर सक्रिय और स्वस्थ महसूस कराती हैं।

अगर आपको खेल – खेल में शारीरिक और मानसिक पुरस्कार प्राप्त करना हैं, तब खेल अौर शारीरिक गतिविधियाँ उम्र अौर अपनी क्षमता के अनुसार बढ़ाएँ अौर स्वस्थ रहें।

जागरूकता –  मानसिक स्वास्थ mental health awareness


Indian Bloggers

 

 

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Great initiative by Accio health – event on spreading mental health awareness.

What is psychosomatic problems ? Watch the video.

आज़ के भाग दौड़ के युग में  छोटी -छोटी मानसिक समस्याएँ बढ़ती जा रहीं हैं. जो आगे चल कर गम्भीर रुप लेने लगती हैं,  क्योंकि अक्सर हम इन समस्याओं पर उचित ध्यान नहीँ देते हैं. हमारे समाज में मानसिक समस्याओं को नकारात्मक रुप में देखा जाता हैं. इसलिये भी लोग इन समस्याओं   को  बताने  और सहायता लेने में झिझकते हैं.

Watch the video  – Conversation around mental health  

               जब कि,  मानसिक स्वस्थ पर भी शारीरिक स्वस्थ की  तरह ध्यान देना ज़रूरी हैं. बहुत सी स्वस्थ सम्बन्धित समस्याएँ साइकोसोमैटिक होतीं हैं. अर्थात मानसिक समस्याएँ गम्भीर शारीरिक बीमारियों का रुप लेने लगती हैं.

एकसीओ   हेल्थ ने  मनसिक स्वस्थ सम्बन्धित जागरूकता फैलने के लिये  ने एक सफल ऑनलाइन, लाईव कार्यक्रम आयोजित किया. जिसका लाईव शो फेस बुक पर भी आया.

इसमें अपने विचार स्मिता, समेँथा और डा रेखा ने प्रस्तुत किये हैं और  अनु के अपनी खूबसुरत कविता सुनाई . इसे आप इस लिंक पर देख सकते हैं –

Watch the video- Conversations around mental health

My Blog-  Narrative transportation ( A theory of psychology)    मेरा ब्लॉग -“नरेटिव ट्रांसपोटेशन ” या “परिवहन कल्पना मॉडल

Narrative transportation theory proposes the mental state,  when people lose themselves in a story.   Story receivers  transported through two main components: empathy and mental imagery.

 

मेरा ब्लॉग  नरेटिवे ट्रांसपोटेशन ” या “परिवहन कल्पना मॉडल”के नाम से है।नाम कुछ अलग सा है। इसलिए मैं इस बारे में कुछ बातें करना चाहूंगी।
कभी-कभी हम किसी रचना को पढ़ कर उसमें डूब जाते हैं। उसमें खो जाते हैं। उस में कुछ अपना सा लगने लगता है।

ऐसी कहानी या गाथा जो आप को अपने साथ बहा ले जाये। इसे “कथा परिवहन अनुभव” या “नरेटिवे ट्रांसपोटेशन कहते हैं। यह एक मनोवैज्ञानिक मनः स्थिति होती है।

मैं चाहती हूँ कि मेरे रचनाओं को पढ़ने वाले पाठक भी ऐसा महसूस करें। इसमें हीं मेरे लेखनी की सार्थकता है। शब्दों का ऐसा मायाजाल बुनना बहुत कठिन काम है। फिर भी मैं प्रयास करती रहती हूँ। अगर मेरा यह प्रयास थोड़ा भी पसंद आए। तब बताएं जरूर। यह मेरा हौसला बढ़ाएगा।

 

 

Source: मेरा ब्लॉग -“नरेटिवे ट्रांसपोट ” या “परिवहन कल्पना मॉडल” ( मेरे ब्लॉग के नाम के विषय में )

 

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मानसिक स्वास्थ्य अौर भारत – समाचार ( India’s mental health scenario)

 

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                       मानसिक स्वास्थ्य अौर भारत

क्या आप जानते हैं , दुनिया में सबसे ज्यादा आत्महत्या हमारे देश (2012 )में  होता है। जिसे यहाँ अपराध माना जाता था। जबकि  विश्व भर  में आत्महत्या  को गंभीर मानसिक तनाव व अवसाद का परिणाम बताया जा रहा है।  अफसोस की बात है, भारत की आबादी का 27% अवसाद /depression  से (विश्व स्वास्थ्य संगठन/ WHO के अनुसार)  पीड़ित है। भारत जैसे विशाल देश में मानसिक स्वास्थ्य  चिकित्सा सुविधाओं और संसाधनों की भारी कमी है।

           मानसिक स्वास्थ्य देखभाल विधेयक

विश्व में  अनेक देशों में मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक रोगों जैसा महत्व दिया जा रहा है। पर हमारे देश में मानसिक स्वास्थ्य / रोग को  छुपाया जाता है। अच्छी खबर है ,  कि सरकार द्वारा  मानसिक स्वास्थ्य को महत्व देते हुए मानसिक स्वास्थ्य देखभाल विधेयक बिल  तैयार किया गया है। उम्मीद है यह जल्दी हीं ठोस रूप लेगा।

                    जागरुकता

आज सबसे जरुरी है, लोगों में जागरुकता लाना।  मानसिक समस्या  को संकोच अौर शर्मिदगी नहीं समझना चाहिये। इसे छुपाने के बदले चिकित्सकिय सहायता लेना चाहिये।

 

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मनोविज्ञन#3- धर्म मेँ मनोविज्ञन का छिपा रहस्य Psychology and religion / spirituality

 

 Psychology in religion – Religion is a learned behaviour, which has a strong and positive impact on human personality, if followed properly.

धर्म बचपन से सीखा हुआ व्यवहार है. अपने अराध्य या  ईश्वर के सामने अपनी मनोकामनायेँ कहना या अपनी भूल  कबुलना, ये  हमारे सभी बातेँ व्यवहार को साकारात्मक रुप से प्रभावित करती हैँ. जो मनोविज्ञान का भी उद्देश्य  है.

 प्रार्थना, उपदेश, आध्यात्मिक वार्ता, ध्यान, भक्ति गीत, भजन आदि सभी गतिविधियाँ  धर्म का हिस्सा हैँ. ध्यान देँ तब पायेंगेँ , ये सभी किसी ना किसी रुप मेँ हम पर साकारात्मक असर  डालतीँ  हैँ. अगर गौर करेँ, तब पयेँगेँ ये सभी व्यवहार किसी ना किसी रुप में  मनोवैज्ञानिक

  • ये आत्म प्रेरणा या  autosuggestion देते हैँ.
  • अपनी गलतियोँ को स्वीकार करने से मन से अपराध  बोध/ गिल्ट कम होता है
  • अंतरात्मा की आवाज सुनने की सीख, अपनी गलतियोँ को समझने की प्रेरणा देता है.
  • सोने के पहले अपने दिन भर के व्यवहार की समिक्षा करने की धार्मिक शिक्षा मनोविज्ञान का  आत्म निरीक्षण या introspection है.

अध्ययनोँ से भी पता चला है – ध्यान, क्षमा, स्वीकृति, आभार, आशा और प्रेम जैसी धार्मिक परंपराएँ हमारे व्यक्तित्व पर प्रभावशाली मनोवैज्ञानिक असर डलता हैं।

 

clinical reports suggest that rehabilitation services can integrate attention to spirituality in a number of ways.

(“Spirituality and religion in psychiatric rehabilitation and recovery from mental illness”- ROGER D. FALLOT Community Connections, Inc., Washington, DC, USA International Review of Psychiatry (2001), 13, 110–116)

 

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मनोविज्ञान#3 मन मेँ गिल्ट/ अपराध  बोध ना पालेँ (व्यक्तित्व पर प्रभाव) Guilt (emotion)

 

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( Alice Miller claims that “many people suffer all their lives from this oppressive feeling of guilt.”

Feelings of guilt can prompt subsequent virtuous behaviour. Guilt’s  are one of the most powerful forces in undermining one’s self image and self-esteem.  Try to resolve it.)

 गिल्ट या  अपराध  बोध एक तरह की  भावना है. यह हमारे नैतिकता का उल्लंघन, गलत आचरण जैसी बातोँ से   उत्पन्न होता है. इसके ये कारण हो सकतेँ हैँ –

  • बच्चोँ/ बचपन मेँ  अपने माता-पिता की उम्मीदों पर खरा ना उतरने की भावना.

  • अपने को दोषी/ अपराधी महसूस करना.

  • किसी को चाह कर भी मदद/ पर्याप्त मदद न कर पाने का अह्सास.

  • अपने आप को किसी और की तुलना में कम पाना.

 हम सब के  जीवन मेँ कभी ना कभी ऐसा होता हैँ. हम ऐसा व्यवहार कर जाते हैँ,  जिससे पश्चाताप और आंतरिक मानसिक संघर्ष की भावना पैदा होती है. यह हमारे अंदर तनाव उत्पन्न करता है. जब यह अपराध-बोध ज्यादा होने लगता है, तब यह किसी ना किसी रुप मेँ हमारे व्यवहार को प्रभावित करता है.

अपने व्यवहार को समझे और सुधारेँ –

  • अपने गिल्ट को समझने की कोशिश करेँ.

  • अपनी गलतियोँ को स्वीकार कर सुधार लायेँ. अस्विकार ना करेँ.

  • तर्कसंगत तरीके से ध्यान देँ गिल्ट अनुचित तो नहीँ है

  • तर्कसंगत गिल्ट व्यवहार सुधारने मेँ मदद करता है.

  • माफी माँगना सीखे.

  • भूलवश गलती हो, जरुर माफी मांगे.

  • अपनी गलतियोँ को अनदेखी ना करेँ.

  • बच्चोँ / लोगोँ से अत्यधिक अपेक्षा ना रखेँ. वे जैसे हैँ वैसे हीँ उन्हेँ स्वीकार करेँ.

  • पूर्णता किसी में मौजूद नहीं है।

  • अपने आप को जैसे आप हैँ वैसे हीँ पसंद करेँ. तुलना के बदले आत्म स्वीकृति की भावना मह्त्वपुर्ण है.

  • बच्चोँ को हमेशा टोक कर शर्मिंदा ना करेँ.

  • जरुरत हो तब बेझिझक कौंसिलर से मदद लेँ.

गिल्ट आत्म छवि, आत्मविश्वास, और आत्म सम्मान कम करता हैं । गहरा गिल्ट चिंता, अवसाद , बेचैनी या विभिन्न मनोदैहिक समस्याओं के रूप में दिखाता है. इसलिये गिल्ट की  भावनाओं को दूर करना चाहिये.

 

 

 

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मनोविज्ञान#2 आत्म प्रेरणा से अपना व्यक्तित्व निखारे. Self-improvement by autosuggestion

Auto suggestion – A process by which an individual may train subconscious mind for self- improvement.

यह एक मनोवैज्ञानिक तकनीक है. आत्म प्रेरित सुझाव विचारों, भावनाओं और व्यवहारोँ को प्रभावित करता हैँ. किसी बात को बारबार दोहरा कर अपने व्यवहार को सुधारा जा सकता है.

अपनी कमियाँ और परेशानियाँ हम सभी को दुखी करती हैँ. हम सभी इस में बदलाव या सुधार चाह्ते हैँ और जीवन मेँ सफलता चाहतेँ हैँ. किसी आदत को बदलना हो, बीमारी को नियंत्रित करने में अक्षम महसुस करतेँ होँ, परीक्षा या साक्षात्कार में सफलता चाह्तेँ हैँ. पर आत्मविश्वास की कमी हो.

ऐसे मेँ अगर पुर्ण विश्वास से मन की चाह्त निरंतर मन हीँ मन दोहराया जाये. या अपने आप से बार-बार कहा जाये. तब आप स्व- प्रेरित संकल्प शक्ति से अपनी कामना काफी हद तक पुर्ण कर सकतेँ हैँ और अपना व्यवहार सुधार सकते हैँ। जैसे बार-बार अपनी बुरी आदत बदलने, साकारात्मक विचार, साक्षात्कार मेँ सफल होने, की बात दोहराया जाये तब सफलता की सम्भावना बढ़ जाती है.

ऐसा कैसे होता है?
हमारा अवचेतन मन बहुत शक्तिशाली है. बार बार बातोँ को दोहरा कर अचेतन मन की सहायता से व्यवहार मेँ परिवर्तन सम्भव है. साकारात्मक सोच दिमाग और शरीर दोनों को प्रोत्साहित करतेँ हैँ. इच्छाशक्ति, कल्पना शक्ति तथा सकारात्मक विचार सम्मिलित रुप से काम करते हैँ. पर यह ध्यान रखना जरुरी है कि हम अवस्तविक कामना ना रखेँ और इन्हेँ लम्बे समय तक प्रयास जारी रखेँ.a s

 

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Psychology #understandyourbehavior /मनोविज्ञान #अपने व्यवहार को समझने का विज्ञान

 

 

मनोविज्ञान – क्या यह मन का विज्ञान है?  इसके नाम से लगता हे, जैसे यह मन का विज्ञान है।  यह अनुभव अौर व्यवहार का विज्ञान है। यह एक एेसा विषय है जो हमारे व्यवहार को समझने में मदद करता है। यह हमारी मानसिक प्रक्रियाओं, अनुभवों अौर  व्यवहार का अध्ययन करता है। हम कब, क्या , क्यों, अौर कैसे य्यवहार करते हैं। इसे समझने का  विज्ञान है।

आज के समय में मनोविज्ञान बङा महत्वपुर्ण  हो गया है। यह  विज्ञापन, व्यावसाय, लोगों के  प्रतिक्रियाओं, जनमत या बाजार का रुझान,  खेल अौर खिलाङियों , अपराध का व्यवहार सब कुछ समझने के काम आता है।

क्यों नहीं अपने व्यवहार को समझा जाये?– विचार, चिन्तन, भाव ,आसपास के वातावरण अौर घटनाअों का असर हम पर पङता है। हमारा व्यक्तित्व , बौद्भिकता, संवेदन, सीखना, स्मृति, चिन्तन  हमारे व्यवहार पर असर ङालतें हैं। दरअसल,  हमारे व्यवहार एवं मानसिक प्रक्रियाएं आपस में जुटे होते  हैं। अतः अपने  व्यक्तित्व  को समझना जरुरी है।  ताकि अपने व्यवहार को समझा जा सके।

 

 

 

 

मेरा ब्लॉग -“नरेटिवे ट्रांसपोट ” या “परिवहन कल्पना मॉडल” ( मेरे ब्लॉग के नाम के विषय में )

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मेरा ब्लॉग –“नरेटिवे ट्रांसपोटेशन ” या “परिवहन कल्पना मॉडल” के नाम से है।नाम कुछ अलग सा है। इसलिए मैं इस बारे में कुछ बातें करना चाहूंगी।


कभी-कभी हम किसी रचना को पढ़ कर उसमें डूब जाते हैं। उसमें  खो जाते हैं। उस में कुछ अपना सा लगने लगता है।

ऐसी कहानी या गाथा जो आप को अपने साथ बहा ले जाये।  इसे “कथा परिवहन अनुभव” या “नरेटिवे ट्रांसपोटेशन कहते हैं। यह एक मनोवैज्ञानिक  मनः  स्थिति होती है।

मैं चाहती हूँ कि मेरे रचनाओं को पढ़ने वाले पाठक भी ऐसा महसूस करें। इसमें हीं मेरे लेखनी की सार्थकता है। शब्दों का  ऐसा मायाजाल बुनना बहुत कठिन काम है। फिर भी मैं प्रयास करती रहती हूँ। अगर मेरा यह प्रयास थोड़ा भी पसंद आए। तब बताएं जरूर। यह मेरा हौसला  बढ़ाएगा।

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बर्न-आउट ( एक सामान्य मनोवैज्ञानिक समस्या )

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बर्न-आउट क्या है ?

ज़िंदगी की भागम-भाग, तनाव, काम की अधिकता अक्सर हमे शारीरिक और मानसिक रूप से थका देती है। जब यह थकान और परेशानी काफी ऊंचे स्तर तक चला जाता है तब ऐसा लगने लगता है जैसे जिंदगी की सामान्य समस्याओ को भी सुलझाना कठिन हो गया है। बर्न-आउट मानसिक या शारीरिक कारणो से हो सकता है। यह लंबे दवाब तथा थकान का परिणाम होता है।बर्न-आउट कार्य-संबंधी या व्यक्तिगत या दोनों कारणो से हो सकता है। ऐसे में मानसिक तनाव व स्ट्रैस बढ़ जाता है। स्वभाव में चिड़चिड़Iपन बढ़ जाता है। व्यक्ति अपने को ऊर्जा-विहीन, असहाय व दुविधाग्रस्त महसूस करने लगता है।

बर्न-आउट कैसे पहचाने ?
ऐसे मे नकारात्मक सोच ज्यादा बढ़ जाती है। आत्मविश्वास व प्रेरणा मे कमी , अकेलापन, आक्रोश, नशे की लत, जिम्मेदारियो से भागने जैसे व्यवहार बढ़ जाते है। ऐसा व्यक्ति अपना फ्रस्टेशन दूसरों पर उतारने लगता है। ऐसे मे व्यक्ति हमेशा थका-थका व बीमार महसूस करता है। लगातार सिर और मांसपेशिओ मे दर्द, भूख व नींद मे कमी होने लगती है। अपने कार्य मे रुचि मे कमी, हमेशा असफलता का डर, अपना हर दिन बेकार लगने लगता है। ऐसे व्यक्ति दूसरों के साथ जरूरत से ज्यादा कठोर, असहनशील और चिड़चिड़ा हो जाता  है। गैस्ट्रिक व ब्लड-प्रेशर का उतार-चढ़ाओ असामान्य हो जा सकता है।
ऐसे परिवर्तनो का मतलब है कि अपने शारीरिक व मानसिक कार्य भार को सही तरीके से संभालने की जरूरत है। अगर संभव है तो कार्य-भार को कम कर देना चाहिए। साथ ही अपने लाइफ-स्टाइल को संयमित करना कहिए। अपनी आवश्यकताओ तथा समस्याओं को समझ कर उनका ध्यान रखना चाहिए।

समाधान-
ऐसी समस्याए अक्सर काम को लत (वर्कहोलिक) बना लेने वाले लोगों में ज्यादा पाया जाता है। इसलिए काम के साथ-साथ मनोरंजन, रचनात्मकता, मित्रों और परिवार के साथ समय बिताना भी जरूरी है। जीवन की खुशिया मानसिक तनाव काम करती है। हर काम का ध्येय सिर्फ जीत-हार, जल्दीबाजी या लक्ष्य-प्राप्ति नहीं रखना चाहिए। सकारात्मक सोच और दूसरों को समझने की कोशिश भी आवश्यक है। जिंदगी की परेशानियों  और समस्याओं  को सही नजरिए से समझना भी जरूरी है। समस्याओं  से बचने के बदले उनका सामना करना चाहिए। काल्पनिक दुनिया से हट कर वास्तविकता और जरूरत के मुताबिक कठिनाइयों  को सुलझाना चाहिए। कार्य-स्थल पर  टीम मे काम करना, अपनी समस्यओं  को बताना, नयी जिम्मेदारियों  को सीखना भी सहायक होती है। कुछ लोग ‘ना’ नहीं बोल पाने के कारण अपने को काम के भार तले दबा लेते है। ‘ना’कहना सीखना चाहिए।
प्राणायाम, योग, योगनिद्रा, ध्यान, मुद्रा आदि की  भी मदद  ली  जा सकती है। इससे तनावमुक्ति होती है। स्फूर्ति और आत्मविश्वास बढ़ता है। यह पूरे व्यक्तित्व को सकारात्मक और रचनात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। आयुर्वेद मे तुलसी को नर्व-टानिक तथा एंटि-स्ट्रैस कहा गया है। अतः इसका भी सेवन लाभदायक हो सकता है,पर गर्भावस्था में  बिना सलाह इसे ना लें।