दिल से निकली बाते ही
अक्सर दिल को छू पाती है.
पुराने लोगों से मिलो ….बाते करो …
तो पुराने दिन याद आते है .
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दिल से निकली बाते ही
अक्सर दिल को छू पाती है.
पुराने लोगों से मिलो ….बाते करो …
तो पुराने दिन याद आते है .
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कुछ ख्वाहिशें बेलगाम उडती,
बिखरती रहती है हवा के झोंकों सी.
सभी अरमानों को पूरा करना मुशकिल है,
और बंधनों में बाँधना भी मुश्किल है.
We are stars wrapped in skin,
The light you are seeking has always been within.
~ Rumi
जिंदगी की राहें सड़कों की तरह कभी खत्म नहीं होती है,
मंजिल की दूरी से ङरने से अच्छा है,
एक -एक कदम उठा कर चलते जाना।
जब लगे, सारे रास्ते बंद हैं, शुन्य से भी शुरु करने में भी क्या हर्ज़ है?
सफेद पन्ने पर फिर से जो चाहे लिखने का मौका मिला है।
बस अपने अंदर की आग को जलते रहने देना है।
जब किसी बात से हमारे कदम लङखङा जाते हैं, यह कविता उस वक्त के लिये है। पर विशष कर
उन बच्चों को समर्पित है, जिन्हों ने परीक्षा में अपने मन लायक सफलता – उपलब्धि नहीं पाई है।
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मित्र आगमन पर नंगे पैर दौङ पङे कृष्ण,
ना कान्हा ने सुदामा को आंका।
ना राम ने सबरी , हनुमान को नापा।
हम किसी से मिलते हीं सबसे पहले,
एक- दूसरे को भांपते है, आंकते है,
आलोचना -समालोचना करते हैं।
तभी सामने वाले का मोल तय करते हैं।
रुप, रंग, अौकात …..
देख कर लोगों को पहचानते हैं।
भूल जाते हैं , अगर ऊपरवाला हमारा मोल लगाने लगेगा,
तब हमारी पहचान क्या होगी ? हमारा मोल क्या होगा?
Indispose, Edition 172 –How do you feel when people judge you? Do you judge people as well? #JudgingPeople
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“A good head and good heart are always a formidable combination. But when you add to that a literate tongue or pen, then you have something very special.”
― Nelson Mandela
मन में भरे हो असीमित, बेहिसाब विचार,
दिल में हों जमाने भर के ख़याल।
लिपिबद्ध,
कुछ वर्णमालायें, कुछ अक्षर….शब्द,
अल्फाबेट, अलिफ़-बे,
हीं वे माध्यम हैं, जो
लिखे-बेलिखे विचारों को
ऊतार देते है पन्नों पर।

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जिंदगी के बीते लम्हों ,
और हर तजुर्बे ने ,
बताया है.
खुशियाँ और मुस्कुराहटे ,
उतने अपने नहीँ होते ,
जितने दर्द और तकलीफ के,
निजी एकांत पल.
You have to grow from the inside out. None can teach you, none can make you spiritual. There is no other teacher but your own soul.
Swami Vivekananda
जीवन की परिपूर्णता —-
अगर यह लौकिक हो – बुद्ध के राजसी जीवन की तरह,
या संतृप्ति हो , कबीर की आध्यात्मिक आलौकिक जीवन की तरह।
तब मन कुछ अौर खोजने लगता है।
क्या खोजता है यह ?
क्या खींचती है इसे अपनी अोर?
यह खोज…….यह आध्यात्मिक तलाश कहाँ ले जायेगी?
शायद अपने आप को ढूँढ़ने
मैं कौन हूँ??
या
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सप्तपर्णी / एल्स्टोनिया स्कोलरिस – Apocynaceae / Alstonia scholaris
‘यक्षिणी वृक्ष’ कहलाने वाला सप्तपर्णी वृक्ष के नीचे कविन्द्र रवींद्रनाथ ठाकुर ने ‘गीतांजलि’ के कुछ अंश लिखे थे। शांति निकेतन में दीक्षांत समारोह में छात्रों को सप्तपर्णी के गुच्छे देने का प्रचलन हैं। थरवडा बौद्ध धर्म में भी इस वृक्ष की पत्तियों के इस्तेमाल की बात है। ये फूल मंदिरों और पूजा में भी काम आता है , हालाकि इसके पराग से कुछ लोगों को एलर्जी भी होती है।आयुर्वेद व आदिवासी लोग प्राकृतिक उपचार में इस पेड़ की छाल, पत्तियों आदि को अनेक हर्बल नुस्खों के तौर पर अपनाते हैं।
बिन बुलाये घुस आई रातों में अपनी खुशबू लिये ,
यक्षिणी वृक्ष के फूलों की मादक सम्मोहक सुगंध।
अौर
कस्तूरी मृग की तरह, खुशबू की खोज खींच लाई,
चक्राकार सात पत्तियो के बीच खिले
सप्तपर्णी के सदाबहार फूलों के पास।
जिसकी सुरभी शामिल है,
रवींद्रनाथ ठाकुर ने ‘गीतांजलि’ में भी ।

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Are we really aware of how much we know? While Writing and teaching one can examine or validate his/her knowledge. Reading, Writing and Teaching may help you find an answer of this question.
जब कुछ लिखने बैठती हूँ, तब समझ आता है,
कितना कम जानती हूँ।
जब पढ़ाना होता है, तब भी समझ आता है,
कितना कम जानती हूँ।
अपने ज्ञान को मापने का है क्या कोई तरीका?
कि
हम क्या जानते हैं? अौर कितना जानते हैं?
प्रश्न में हीं उत्तर छुपा है……..
लिखना, पढ़ना अौर पढ़ाना हीं
ज्ञान को आत्मसात अौर अभिव्यक्त करने का सबसे आसान तरीका है,
अौर अपने को परखने का तरीका भी लेखन और शिक्षण हीं है!!!!!
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Wherever you are, and in whatever circumstances, strive to love and to be a lover.
~ Rumi
जीवन रुकता नहीँ
हर पल , हर क्षण नया है
दरिया के बहते पानी की तरह.
जो बह गया वह बीत गया.
वह पानी लौट कर आता नहीँ.
यह जीवन चक्र चलता रहता है.
हर पल कुछ नया ले कर आता है.
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