ज़िंदगी के रंग – 224

ज़िंदगी के सफ़र में

अब जहाँ आ गए हैं।

बातें अब हम छुपाते नहीं।

लोगों के सिखाए

अदब के लिए,

अपनी ख्वाहिशें दबाते नहीं।

नक़ली सहानुभूति

दिखाने वालों से घबराते नहीं।

कड़वी बोली अब डराती नहीं।

गुनगुनी धूप

मुस्कुराना सिखाती है।

ख़ुद ज़िंदगी खुल कर

जीना सीखती है।

अधूरी मुहब्बत

अधूरी मुहब्बतों की

दास्ताँ लिखी जाती है।

राधा और कृष्ण,

मीरा और कान्हा को

सब याद करते हैं।

किसे याद है कृष्ण की

आठ पटरानियों और

16 हजार 108 रानियों की?

बे-लौस मोहब्बत

चाँद को रोशन

करता है सूरज,

ख़ुद को जला-तपा कर,

अनंत काल से ।

क्या इंतज़ार है उसे,

कभी तो मिलन होगा?

नहीं, आफ़ताब को मालूम,

मिलन नहीं होगा कभी।

फिर भी जल रहा है…….

बे-लौस, निस्वार्थ मोहब्बत में ।

गुरु

ज़िंदगी में ज़ख़्म

लगते रहेंगे।

उन्हें भूल जाओ

तो कोई बात नहीं।

पर सबक़ ना भूलना।

ग़र भूल गए तो

ज़िंदगी गुरु बन

फिर-फिर सिखाएगी।

मोतियाँ

लेखक, कवि औ

कलाकार कल्पना और

ख़्वाबों की दुनिया से

मोतियाँ चुन

सजाते हैं अपनी रचायें।

यह ख़ज़ाना खुली आँखों

से नहीं दिखता।

दिल से हीं महसूस

किया जा सकता है,

ख़्वाबों की यह तिज़ारत।

मुनाफ़ा-नुक़सान में

उलझने वाले क्या जाने

दिल की ये ख़ूबसूरत बातें?

मरते रिश्ते

ग़र रिश्ते रुलाने लगे,

थकाने लगे।

रूह की ताक़त निचोड़ दे।

तब दूरी है ज़रूरी।

जो नहीं किया उसकी

सफ़ाई क्यों है देनी?

जब अन्तरात्मा थक जाए।

तब आत्मसम्मान का

सम्मान है ज़रूरी।

दुनिया में बहुत कुछ

ख़त्म हो रहा है।

मारती नदियाँ, मृत सागर,

और मरते रिश्ते।

किसी को फ़र्क़ पड़ता है क्या?

जिन्हें फ़र्क़ पड़ेगा।

वे संभलना और रिश्ते

बचाना सीख लेंगे।

अधूरी ख्वाहिशें

क्यों कुरेदते हो

पुरानी बातें?

रूह पर उकेरे

यादों और दर्द के,

निशां कभी मिटते हैं क्या ?

खुरच कर हटाने की

कोशिश में कुछ ज़ख़्मों

के निशां रह जातें हैं

नक़्क़ाशियों से।

कई अधूरी ख़्वाहिशें,

गहनों में जड़े नागिनों सी

अपनी याद दिलाती हैं।

जब करो चर्चा,

गुज़रते हैं उसी दौर से।

ज़िंदगी के रंग – 220

घर के छत की ढलाई

के लिए लगे बल्ले, बाँस

और लकड़ियों के तख़्ते ने

बिखरे रेत-सीमेंट को

देख कर कहा –

हम ना हो तो तुम्हें

सहारा दे मकान का

छत कौन बनाएगा?

कुछ दिनों के बाद

मज़बूत बन चुका छत

बिन सहारा तना था।

और ज़मीन पर बिखरे थे

कुछ समय पहले

के अहंकार में डूबे बाँस,

बल्ले और तख़्तियाँ।

ज़िंदगी रोज़ नए रंग दिखाती है ।

भरोसा और यक़ीं

उनसे सच की

क्या उम्मीद करना,

जो ख़ुद से भी झूठ बोलतें हैं?

बड़े सलीक़े से झूठ बोलते हैं।

तय है, हर लफ़्ज़ से, बेख़ौफ़ टपकते झूठ का हुनर ,

मुद्दतों में सीखा होगा।

वे हमें नादाँ कहते हैं।

हैं नादान क्योंकि

हमने भी भरोसा करना ,

यक़ीं करना अरसे

से सीखा है।

कसक

ठंड में बढ़ जाती है,

गुम चोट की कसक।

रातों में बढ़ जाती हैं,

गुम और भूली-बिसरीं

यादों की कसक।