ना समझो इसे मौन,
खोज़ रहें है, हम हैं कौन?
कर रहे हैं अपने आप से गुफ़्तगू।
हमें है खोज़ अपनी, अपनी है जुस्तजू ।
इश्क़ अपने आप से, अपने हैं हमसफ़र।
छोटी सी ज़िंदगी, छोटी सी रहगुज़र।
रेत हो या वक्त ,
फिसल जाएगा मुट्ठी से कब।
लगेगा नहीं कुछ खबर। 
ना समझो इसे मौन,
खोज़ रहें है, हम हैं कौन?
कर रहे हैं अपने आप से गुफ़्तगू।
हमें है खोज़ अपनी, अपनी है जुस्तजू ।
इश्क़ अपने आप से, अपने हैं हमसफ़र।
छोटी सी ज़िंदगी, छोटी सी रहगुज़र।
रेत हो या वक्त ,
फिसल जाएगा मुट्ठी से कब।
लगेगा नहीं कुछ खबर। 
पैरों में लगे धूल झड़ाते, पूछा उनसे-
क्यों बिखरे हो यूँ? राहों में पड़े हो पैरों तले?
खिलखिला कर राहों के रज ने कहा –
कभी बन जाओ ख़ाक…माटी।
हो जाओ रेत-औ-रज,
ईश्वर और इश्क़ की राहों पर।
समझ आ जाएगा,
ना खबसूरती रहती है, ना जुनून।
जब अहं खो जाए, हो जाए इश्क़ उससे।
दुनिया हसीन बन जाती है गर्द बन कर।
ज़र्रा-ज़र्रा मुस्कुरा उठता है।

जीवन के संघर्ष हमें रुलातें हैं ज़रूर,
लेकिन दृढ़ और मज़बूत बनातें हैं.
तट के पत्थरों और रेत पर
सर पटकती लहरें बिखर जातीं हैं ज़रूर.
पर फिर दुगने उत्साह….साहस के साथ
नई ताक़त से फिर वापस आतीं हैं,
नई लहरें बन कर, किनारे पर अपनी छाप छोड़ने.
News – Saudi Arabia’s proposed $500 billion mega-city
जहाँ चारो अोर रेत का समंदर है,
वे भी बिना ङरे सबसे आगे जाने ,
नये हौसले दिखाने का साहस कर रहें हैं,
फिर हम तो सामर्थवान हैं।
युवा शक्ति अौर योग गुरु हैं।
बस सुनहरे सपने देखने अौर
उसे पूरा करने के हौसले की हीं तो जरुरत है।
रेत पर, तपते रेगिस्तान में
खिल आये कैक्टस
ने बिना ङरे
चटक रंगों को बिखेरा।
किसी ख़ूबसूरत नज़्म या कविता की तरह ……
गर्म बयार अौर
आग उगलते सूरज
ने नन्हे से कैक्टस के हौसले देख
नज़रें झुका ली ।

आँखों की चमक ,
होठों की मुस्कुराहटों ,
तले दबे
आँसुओं के सैलाब ,
और दिल के ग़म
नज़र आने के लिये
नज़र भी पैनी चाहिये.
कि
रेत के नीचे बहती एक नदी भी है.
समंदर हँसा रेत पर – देखो हमारी गहराई अौ लहराती लहरें,
तुम ना एक बुँद जल थाम सकते हो, ना किसी काम के हो।
रेत बोला —
यह तो तुम्हारा खारापन बोल रहा है,
वरना तुम्हारे सामने – बाहर अौर अंदर भी हम हीं हम हैं
— बस रेत हीं रेत !!!




images from internet.
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