वक्त फिसलता है
रेत की तरह,
कितना भी पकङो
मुट्ठी मे या रेत घड़ी में।
नदी के जल में हो
या
रेगिस्तान के बालुका ढेर में हो।
सरक हीं जाता है जकङ से।
रेत हो या वक्त
बस रह जाती हैं यादें !!!!!!
वक्त फिसलता है
रेत की तरह,
कितना भी पकङो
मुट्ठी मे या रेत घड़ी में।
नदी के जल में हो
या
रेगिस्तान के बालुका ढेर में हो।
सरक हीं जाता है जकङ से।
रेत हो या वक्त
बस रह जाती हैं यादें !!!!!!
IndiSpire – Ideas for Edition 185
Do you have that one person who was once your best companion but now a complete stranger? What changed?
जिंदगी के सफर में जब भी रिश्तों की
कश्ती ङूबती है
कभी माँझी, कभी मौसम अौर
कभी नदी के भँवर ………. बदनाम होते हैं।
पर जब नाव का छुपा सुराख़ ही उसे
ङूबाने लगे ,
तब वफा – वेवफा, टूटना – छूटना,
अपना -पराया क्या मतलब रखतें हैं?
धोखा… अविश्वास का सुराख़…..
किसी को मार ङालने
के लिये अकेले हीं काफी है।
यह
रिश्तों को जीने नहीं देता………

ढेर सारी मीठी मीठी हँसी
छलक छलक कर बिखर गई।
बरसाती, उफनती नदी सी बह कर सभी को
अपने साथ गीली करती भिगो गई।
कांटों भरी, संघर्ष शिखर लगते हालातों में
हौसले , ताकत, सबक दे जाती हैं
बच्चों की यह मासूमियत ।
इसलिये बचपना बचाये रखना !!!!!

आँखों की चमक ,
होठों की मुस्कुराहटों ,
तले दबे
आँसुओं के सैलाब ,
और दिल के ग़म
नज़र आने के लिये
नज़र भी पैनी चाहिये.
कि
रेत के नीचे बहती एक नदी भी है.
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