कसौटी पर स्वर्ण

अक्सर फ़रेब करने वाले,

आज़माते रहते हैं दूसरों को।
भूल जाते हैं, फ़िज़ा में घुली

ख़ुशबुएँ आज़माई नहीं जाती।
गुमान करने वाले परखनते रहते हैं, दूसरों को।

कसौटी पर स्वर्ण ही परखते हैं।
भूल जातें हैं लोहे परखे नहीं जाते।

दूसरों में कमियाँ ढूँढने वाले

धूल आईना की साफ़ करते रहते है,

भूल जातें है ख़ुद के चेहरे साफ़ करना।

यादों से भागे फिरते हैं!

कभी अज़ान में, कभी आरती की

आवाज़ में खोजते रहे सुकून।

यादों से भागे फिरते रहे फ़िज़ूल।

पलकों के दहलीज़ पर चमकते रहे

कुछ सितारे और टूट कर बरसते रहे।

इंद्रधनुष के रंग, बेरंग हो गए।

यादों के चराग़ मज़ारों में टिमटिमाते रह गए।

लफ़्ज़ लफ़्ज़

लफ़्ज़ों के इस्तेमाल का दाम नहीं लगता।

पर लफ़्ज़ लफ़्ज़ मिल इज़हार करते हैं,

कई नई तस्वीर और तहज़ीब।

कलम के क़ैद-ओ-रिहाई से निकले

लफ़्ज़ ख़ूबसूरत मंज़र हैं ढालते,

या हैं रंग बिगाड़ते।

कविता, खबर, कहानियाँ….

अमूल्य या मूल्यहीन,

शालीन, सभ्य या अश्लील।

लफ़्ज़ों में हैं जादू-मिसाल,

टूटे लफ़्ज़ हैं तोड़ते, मीठे लफ़्ज़ हैं जोड़ते।

यादें

जिसे भूलना चाहा, उम्र कट गई भुलाने में।

जो याद रखना चाहा, ना जाने कब भूल गए।

भूलना-भुलाना नहीं कोई ख़ता,

यह इंसानी फ़ितरत है ज़रूरी,

दिल-औ-दिमाग के सुकून के लिए।

Interesting Psychological Fact- For proper

balance in life, both conservation of memory

and forgetting are important. The ability to

forget helps us prioritize, think better, make

decisions, and be more creative. Normal

forgetting, in balance with memory, gives us

the mental flexibility to grasp abstract concept

from a morass of stored Information.

तिमिर या रौशनी

ज़िंदगी में मिलतीं कई हैं राहें।

कुछ राहें जातीं हैं

तिमिर से तिमिर… अंधकार की ओर।

कुछ अंधकार से रोशनी की ओर,

कुछ ज्‍योति से तिमिर की ओर,

कुछ ज्‍योति से ज्‍योति की ओर।

इन मुख़्तलिफ़ राहों से चुन लो

किधर है जाना।

इन राहों में जिसे चाहो चुनो,

वापस लौटने की नहीं है गुंजाइश,

शर्त-ए-ज़िंदगी बस इतनी है।

जीवन संग्राम

जीवन संग्राम में सबसे बड़ा समर है,

जीतना अपने आप से।

अपने आप को स्वीकार करना,

साथ अपनी कमियों के।

अपने आप को प्यार करना।

अपने एहसासों पर इख़्तियार रखना,

अपने एहसासों के इख़्तियार में नहीं रहना।

नज़्म-ए-ज़िंदगी अधूरी रह गई

कुछ कहना था, कुछ सुनना था।

पर बात अधूरी रह गई।

क़िस्सा-ए-इश्क़ छेड़ा,

पर कहानी अधूरी रह गई।

क्या शिकवा आल्फ़ाज़ो और

लफ़्ज़ों की ग़र वे अनसुनी रह गई।

जब नज़्म-ए-ज़िंदगी अधूरी रह गई।

सर्वोतम या उत्कृष्ट?

अपूर्णता में भी पूर्णता हैं,

कमियों में भी सौंदर्य।

जुनून में होता है नशा।

धुन में होती है खुमारी।

सर्वोतम या उत्कृष्ट होने से

बेहतर है सच्चा होना।

तन्हा तन्हा सफ़र

जहान में आए तन्हा,

जाना है यहाँ से तन्हा।

तन्हाई अकेलापन नहीं, है एकांत।

ग़र मिलना है ख़ुदा से, ख़ुद से।

तन्हाईयाँ हीं मुलाक़ात हैं करातीं।

अक्सर जीवन का सफ़र होता है क़ाफ़िले में,

फिर भी होती हैं दिल में तनहाइयाँ।

मिलो सबों से,

पर करो अपने साथ सफ़र।

ना जाने क्यों ख़ूबसूरत तन्हाईयाँ हैं बदनाम।

क्या सुनाए दास्तान?

लगता था, क्या सुनाए दास्तान?

उम्र गुज़र जाएगी, पर पूरी नहीं होगी।

हर लफ़्ज़ पर आँसू थे छलकते,

गला था रुँधता।

दर्द में डूबी कहानी अधूरी रह जाती।

ज़िंदगी औ समय ने बना दी आदत,

आँसू पी कहानी सुनाने की।

समुंदर के साथ भी यही हुआ था क्या?

अपने हीं आँसुओं को पी-पी कर खारा हो गया क्या?

अपने हीं आँसुओं को पी-पी कर खारा हो गया क्या?