जीवन के संघर्ष हमें रुलातें हैं ज़रूर,
लेकिन दृढ़ और मज़बूत बनातें हैं.
तट के पत्थरों और रेत पर
सर पटकती लहरें बिखर जातीं हैं ज़रूर.
पर फिर दुगने उत्साह….साहस के साथ
नई ताक़त से फिर वापस आतीं हैं,
नई लहरें बन कर, किनारे पर अपनी छाप छोड़ने.
जीवन के संघर्ष हमें रुलातें हैं ज़रूर,
लेकिन दृढ़ और मज़बूत बनातें हैं.
तट के पत्थरों और रेत पर
सर पटकती लहरें बिखर जातीं हैं ज़रूर.
पर फिर दुगने उत्साह….साहस के साथ
नई ताक़त से फिर वापस आतीं हैं,
नई लहरें बन कर, किनारे पर अपनी छाप छोड़ने.
साँस के साथ बुनी गई जो ज़िंदगी,
वह अस्तित्व खो गया क्षितिज के चक्रव्यूह में.
अब अक्सर क्षितिज के दर्पण में
किसी का चेहरा ढूँढते-ढूँढते रात हो जाती है.
और टिमटिमाते सितारों के साथ फिर वही खोज शुरू हो जाती है –
अपने सितारे की खोज!!!!

Image courtesy- Aneesh
जी लो ज़िंदगी, जैसी सामने आती है.
सबक़ लो उस से …..
क्योंकि ज़िंदगी कभी वायदे नहीं करती.
इसलिए उससे शिकायतें बेकार है.
और जिन बातों को हम बदल नहीं सकते.
उनके लिए अपने आप से शिकायतें बेकार है.
छोटी-छोटी खुशियां हीं बड़ी खुशियों में बदल जाती हैं
जैसे छोटी दिवाली….से बड़ी दिवाली ।


“You have to keep breaking your heart until it opens.”
― Rumi
चुभते, बेलगाम, नुकीले आघातों से टूटना,
दस्तुर-ए- ज़िदंगी है।
पर किसी को तोङना क़सूर है।
दूसरों को तोड़ने की कोशिश
वही करते हैं, जो ख़ुद टूटे रहते हैं.
इसलिये हौसला हारे बिना
लगे रहना, आगाज-ए- जीत है।
वर्षा सी बरसती,
अर्ध खुली भीगी आँखों के
गीले पलको के चिलमन से
कभी कभी दुनियाइंद्रधनुष सी,
सतरंगी दिखती है.
आँखों के खुलते ही सारे
इंद्रधनुष के रंग बिखर जाते हैं.
ख़्वाबों का पीछा करती
ज़िंदगी कुछ ऐसी हीं होतीं.

हमें तुम से प्यार कितना,
ये हम नहीं जानते
मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना
जाने ज़िंदगी कैसे, बिताते हैं लोग.

ज़िंदगी में जंग
और ज़िंदगी से जंग
चलती रहती है.
अगर लड़ाई जारी रखो बिना डरे……
कोई साथ दे या ना दे तब भी ….
जीत मिल ही जाती है.

कहते है – यह ज़िंदगी बुलबुला है.
पर जीवन के रंगमंच पर
ना तो इसे फूँक मार
अस्तित्व मिटाया जा सकता है
ना नियति के झोंके से
बचाया जा सकता है .
हम सब किसी और की
ऊँगलियों से बँधे,
नियंता के हाथों
की कठपुतलिया हैं.
और सब जानते – समझते भी
ज़िंदगी और मौत का रंग
अंदर तक हिला जाता है……….
…
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