कहानी

सदायें

मिट्टी

विचारों के गहरे सागर में अकेले

ङूबते-उतराते  मन में एक ख्याल,

एक प्रश्न आया।

हम सब मिट्टी से उपज़ें हैं,

एक दिन मिट्टी में मिल जायेंगें।

यह जानते हुए भी,

जीवन से मोह इतना गहरा क्यों होते है?

दरिया पर बरसते बादल !!

दोनों ने एक दूसरे को देखा ग़ौर से,

फिर दरिया पर बरसते बादल से पूछा

दरिया ने –

मुझे मेरा दिया हीं लौटा रहे हो?

या अपने राज मेरे कानों में गुनगुना रहे हो …

क्या अपने दिल की बातें मुझे सुना रहे हो?

 

आफ़ताब

इसे इबादत कहें या डूबना?

ज़र्रे – ज़र्रे को रौशन कर 

क्लांत आतिश-ए-आफ़ताब,

अपनी सुनहरी, पिघलती, बहती,

रौशन आग के साथ डूब कर 

सितारों और चिराग़ों को रौशन होने का मौका दे जाता  है.

 

 

अर्थ:

आफ़ताब-सूरज

आतिश – आग

इबादत-पूजा

क्लांत –थका हुआ

खबरें

सब कहते हैं –  प्रकृति  निष्ठुर हो गई है।

पर क़ुदरत से बेरुखी किया हम सब नें ।

कभी सोंचा नहीं यह  क्या कहती है?

 क्यों कहती हैं?

कटते पेङ, मरती नदियाँ आवाज़ें देतीं रहीं। 

जहर बना जल, सागर, गगन। 

हवाएँ कहती रहीं

 अनुकूल बनो या नष्ट हो जाअो…….

अब, पता नही खफ़ा है ? 

 दिल्लगी कर रही है?

या अपने  नियम, कानून, सिद्धांतों पर चल रही है यह ?

खबरें पढ़ कर विचार आता है –

आज हम पढ़तें हैं हङप्पा अौर मोहनजोदाङो,

हजारों साल बाद क्या कोई हमें पढ़ेगा?

 

जिंदगी के रंग -206

कलम थामे

     लिखती उंगलियाँ आगे बढ़ती जातीं हैं।

           तब  एक जीवंत रचना उभरती हैं।

                ये उंगलियाँ संदेश हैं –

                        जिंदगी आगे बढ़ते जाने का नाम है।

                                 आधे पर रुक कर,

पंक्तियोँ…लाइनों को अधूरा छोङ कर,

       लिखे अक्षरों को आँसूअों से धुँधला कर,

                 सृजनशीलता…रचनात्मकता का अस्तित्व संभव नहीं।

                         यही पंक्तियाँ… कहानियाँ… कविताएँ,

                                   पन्नों पर उतर,

                                             आगे बढ़नें  की राहें  बन जातीं हैं। 

 

दर-ओ-दीवार

दूरियाँ- नज़दीकियाँ तो दिलों के बीच की बातें हैं।

 दीवारों पर इल्ज़ाम क्यों? 

जो खुद चल नहीं सकतीं वे दूसरों की दूरियाँ क्या बढ़ाएँगीं?

अक्सर  दीवारें रोक लेतीं हैं ग़म अौर राज़ सारे अपने तक,

अौर समेटे रहतीं हैं इन्हें  दिलों में अपने।

किलों, महलों, हवेलियों, मकानों, घरों से पूछो……

इनके दिलों में छुपे  हैं कितने राज़, कितनी कहानियाँ।

अगर बोल सकतीं दर-ओ-दीवारें…….

बतातीं दीवार-ए-ज़ुबान से,  सीलन नहीं आँसू हैं ये उसके।

वह तो गनिमत है कि….. 

दीवारों के सिर्फ कान होते हैं ज़ुबान नहीं।

दर्पण का सच !

जब सच्चा अक्स देखना या दिखाना हो,

 तब आईना याद आता है।

पर सब  भूल जाते हैं दर्पण तो छल करता है।

वह हमेशा उलटी छवि दिखाता है। 

  इंसानों की फितरत भी ऐसी होती है शायद ।

पर अंतर्मन….अपने मन का  आंतरिक दर्पण क्या कहता है?

वह तो कभी छल नहीं करता।

 

मानव माइग्रेशन #LockdownIndianMigrants

ग्रेट वाइल्डबीस्ट माइग्रेशन – हर साल अफ्रीका में आश्चर्य जनक दृश्य दिखता है। तंजानिया के सेरेन्गेटी और केन्या के मसाई मारा में भोजन के लिये लाखों जानवरों का महा प्रवास।

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देखा था पशुअों का माइग्रेशन

केन्या, अफ्रिका के जंगलों में।

एक हीं दिशा में,

स्कूल के बच्चों जैसे अनुशासित और अनंत लंबी पंक्तियों में लयबद्ध दौङते,

भागते वाइल्डबीस्ट और ज़ेबरा के झुंङों को।

नदियों मे मगरमच्छों, धरा पर शेरों के शिकार बनते,

मैदान, नदीनाले पार करतेक्रूर मौत से बचतेबचाते।

अौर सुना था…..

 बसंत आने के साथ होता है दुनिया भर में पक्षियों का माइग्रेशन।

पंखों के उड़ान की अद्भुत शक्ति के साथ

अपने घरों को लौटते हैं

  आर्कटिक टर्न पक्षीचमगादड़व्हेल, सामन मछलियां, तितलियाँ पेंगुइन……

 इन विश्व यात्रियों  की महा यात्रा युगों-युगों से

ऋतु परिवर्तन के साथ नियमित चली आ रही है।

यह प्रकृति का विधान है।

लेकिन देखा है पहली बार मानव-माइग्रेशन।

भूखे-प्यासे जलती-तपती धूप में जलते अौ चलते लोग,

अपने घरों की अोर………