
चाँद ने सूरज को आवाज़ दे कर कहा –
ज़िंदगी की राहों में कुछ पाना,
कुछ खोना लगा रहता है।
कम ज़्यादा होना लगा रहता है।
भला या बुरा किया किसी के साथ,
उसका जवाब मिलता रहता है।
आवाज़ की गूंजें लौट कर है आती रहतीं हैं।
सागर और ब्रह्मांड का यह है फ़लसफ़ा।

चाँद ने सूरज को आवाज़ दे कर कहा –
ज़िंदगी की राहों में कुछ पाना,
कुछ खोना लगा रहता है।
कम ज़्यादा होना लगा रहता है।
भला या बुरा किया किसी के साथ,
उसका जवाब मिलता रहता है।
आवाज़ की गूंजें लौट कर है आती रहतीं हैं।
सागर और ब्रह्मांड का यह है फ़लसफ़ा।
छुआ-छूत और जात की बात,
हमबिस्तर की रात नहीं रहती याद।
ब्लड की बोतल हो जाती है पाक।
आर्गन डोनेशन लेने में
नहीं रहती कोई बात।
बस विवाह, इश्क़ और पानी पात्र में
आड़े आती है जात।
News- Tank Cleaned With Cow Urine
In Karnataka After Dalit Woman
Drinks Water. There are several tanks
in the village with written messages that
everyone can drink water from there.


कुछ आवाज़ें दिल-औ-दिमाग़ को
हैं देतीं शांति और सुकून,
जैसे दूर मंदिरों में टुनटुनाती घंटियाँ
या कहीं बज रहा हो शांत, धीर-गंभीर शंख।
लहजा मानो, हलकी से आ रही हो
ख़ुश्बू या आरती की आवाज़ें।
जैसे ये कहतीं हैं गले लगा लो,
मीठी बोली की बहती कलकल-छलछल
चंचल बहते पानी को।
अमन और शांति की बहा दो निर्झर।
The International Day of Peace (or World Peace Day) celebrated annually on September 21 is devoted to strengthening the ideals of peace, both within and among all nations and peoples.

दर्द हो या ख़ुशियाँ,
सुनाने-बताने के कई होते हैं तरीक़े।
लफ़्ज़ों….शब्दों में बयाँ करते हैं,
जब मिल जाए सुनने वाले।
कभी काग़ज़ों पर बयाँ करते है,
जब ना मिले सुनने वाले।
संगीत में ढाल देते हैं,
जब मिल जाए सुरों को महसूस करने वाले।
वरना दर्द महसूस कर और चेहरे पढ़
समझने वाले रहे कहाँ ज़माने में?

कहते हैं त्रुटि कपड़ों में हैं।
पर वे प्राचीन मूर्तियाँ जो मंदिरों में पाषाणों पर
युगों-युगों पहले उकेरी गई सौंदर्यपूर्ण मान।
उन्हें अश्लील या अर्ध नग्न तो नहीं कहते।
आज़ कहते हैं ग़लती लड़कियों की है।
क्या तब लोगों की निगाहें सात्विक थीं
या तब सौंदर्य बोध अलग था।
सुनते है, सब दोष मोबाइल का है।
बौद्ध भिक्षुकों के तप स्थली अजन्ता गुफाओँ में
उकेरे बौद्ध धर्म दृश्य और नारी सौंदर्य शिल्पकारी,
उत्कृष्ट कलात्मकता की है पराकाष्ठा।
हमारी प्राचीन संस्कृति कहती कुछ और है।
और आज कुछ और कहा जाता है।
भूल कहाँ है? गलती किसकी है?
चूक कहाँ हुई? क़सूर किसका?
सज़ा किसे?
गुनाहगार कोई, सज़ा पाए बेगुनाह?
