प्लास्टिक बनते इंसान

प्लास्टिक हीं प्लास्टिक है चारों ओर।

चाहे जितना मचा लो शोर।

आज धरा की ख़ुदाई में मिलते हैं प्राचीन अवशेष।

कुछ सौ साल बाद क्या रहेगा शेष?

ख़ुदाई में मिलेंगे क्या प्लास्टिक के मानव अवशेष?

चिटियाँ और इंसान

चींटियाँ हों या इंसान।

ज़िंदगी जीने की

जद्दो-जहद में,

क्या दोनों

एक सी ज़िंदगी

नहीं जी रहे?

रौशन जहाँ -कविता 

golden

माँ के गर्भ में अजन्मा शिशु अपने 

को सुरक्षित समझ ,बाहर आने पर 

रोता हैं.

इस दुनिया को अपना घर मान 

इंसान भी , इसे छोड़ने के 

डर से रोता हैं.

क्यों यह नहीँ सोचता ?

आगे रौशन  और भी “जहाँ ” हैं.

 

 

 

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धुआँ (कविता)

smoke

 

नज़रों के सामने धुन्ध सा
छाया था.
सब कुछ धुआँ धुआँ सा था.
तभी हवा चली , धुंध छ्टी
और देखा , ये तो परछाइयां हैं ,
जिन्हे हम इंसान समझ बैठे.

 

shadow

 

 

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