जो मिला उसमें जीना सीखा लिया।
जो ना मिला उसमें गुज़ारा करना सीख लिया।
चाहना, पसंद करना छोड़ना सीख लिया।
घूमते रही इर्दगिर्द तुम्हारे,
घड़ी की सुइयों की तरह।
क्या अपने आप को था जीत लिया?
या खो दिया अस्तित्व अपना?
यही होती है बज़्म-ए-हस्ती औरत की।

जो मिला उसमें जीना सीखा लिया।
जो ना मिला उसमें गुज़ारा करना सीख लिया।
चाहना, पसंद करना छोड़ना सीख लिया।
घूमते रही इर्दगिर्द तुम्हारे,
घड़ी की सुइयों की तरह।
क्या अपने आप को था जीत लिया?
या खो दिया अस्तित्व अपना?
यही होती है बज़्म-ए-हस्ती औरत की।


कलम थामे
लिखती उंगलियाँ आगे बढ़ती जातीं हैं।
तब एक जीवंत रचना उभरती हैं।
ये उंगलियाँ संदेश हैं –
जिंदगी आगे बढ़ते जाने का नाम है।
आधे पर रुक कर,
पंक्तियोँ…लाइनों को अधूरा छोङ कर,
लिखे अक्षरों को आँसूअों से धुँधला कर,
सृजनशीलता…रचनात्मकता का अस्तित्व संभव नहीं।
यही पंक्तियाँ… कहानियाँ… कविताएँ,
पन्नों पर उतर,
आगे बढ़नें की राहें बन जातीं हैं।
जीवन है इसलिए परेशनियाँ हैं.
जीवन का अर्थ है सीखना अौर आगे बढ़ना ।
हम सजीव हैं, इसलिए चुनौतियाँ हैं.
बदलते रहते जीवन की चुनौती है हर पल में हौसला बनाये रखना।
हम हैं, क्योंकि अपनों ने हमें ऐसा बनाया.
अतः जीवन सार है अौरों की मदद करना।
दुःख है, इसलिए ख़ुशियों का मोल है.
जीवन का रहस्य है खुश रहना।
प्यार है इसलिए जीवन का अस्तित्व है.
अतः जीवन का सौंदर्य प्रेम है।
साँस के साथ बुनी गई जो ज़िंदगी,
वह अस्तित्व खो गया क्षितिज के चक्रव्यूह में.
अब अक्सर क्षितिज के दर्पण में
किसी का चेहरा ढूँढते-ढूँढते रात हो जाती है.
और टिमटिमाते सितारों के साथ फिर वही खोज शुरू हो जाती है –
अपने सितारे की खोज!!!!

Image courtesy- Aneesh
फारसी कवि उमर खय्याम की रूबैयात जीवन की संक्षिप्तता अौर अल्प अस्तित्व को दर्शाता है । कवि के लिए, जीवन एक शाश्वत वर्तमान है, जो अतीत और भविष्य दोनों से परे है।
इस जीवन के बाद के जीवन के सत्य को जानने की लालसा में
अपने अदृश्य आत्मा…..अंतरात्मा को टटोला।
अन्त:मन से जवाब मिला-
स्वर्ग-नर्क, जन्नत-दोजख सब यही हैं, हमारे अंदर है
I sent my Soul through the Invisible,
Some letter of that After-life to spell:
And by and by my Soul return’d to me,
And answer’d: ‘I Myself am Heav’n and Hell
Omar Khayyám ❤
Translation by- Rekha Sahay
Image courtesy – Aneesh
कहते है – यह ज़िंदगी बुलबुला है.
पर जीवन के रंगमंच पर
ना तो इसे फूँक मार
अस्तित्व मिटाया जा सकता है
ना नियति के झोंके से
बचाया जा सकता है .
हम सब किसी और की
ऊँगलियों से बँधे,
नियंता के हाथों
की कठपुतलिया हैं.
और सब जानते – समझते भी
ज़िंदगी और मौत का रंग
अंदर तक हिला जाता है……….
…
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