
कुछ आवाज़ें कभी नहीं मरती
सुर साम्राज्ञी, माँ शारदा की पुत्री,
शारदेय आराधना कर
स्वयं भी विसर्जित हो रहीं,
सरस्वती संग।

कुछ आवाज़ें कभी नहीं मरती
सुर साम्राज्ञी, माँ शारदा की पुत्री,
शारदेय आराधना कर
स्वयं भी विसर्जित हो रहीं,
सरस्वती संग।
Generally People-pleasers do whatever it takes to make other people happy. Such people put someone else’s needs ahead of their own. Being kind and helpful is good, but going too far to please others will develop the feeling of emotionally depleted, stressed, and anxious.
How to overcome it ? – If you feel people-pleaser behaviour is interfering your well-being, than Remind yourself that you can’t please everyone, it’s better to set boundaries and priorities.Don’t worry about, what people will think or say about you. Learn to say ‘no’ when needed. Enjoy your own time and happiness. If needed talk to a mental health professional or therapist.


अपने दर्द औ तकलीफ़ को बहाना ना बनाओ,
दूसरों के ठेस पहुँचाने का।
वरना ना तुम्हारा चोट ठीक होगा ना दर्द जाएगा।
यह अपने घाव को कुरेदते रहने जैसा है।


Happy Saraswati Puja!!!
Saraswati is the Hindu goddess of knowledge, music, art, speech, wisdom, and learning. She is a part of the tridevi of Saraswati, along with Lakshmiand Parvati.

अनसुना किए जाने पर मौन हो
परखना बेहतर है।
अनदेखा किए जाने पर बातें
लिखना बेहतर है।
तब अनदेखा अनसुना करने वाले
हर बात पर गौर करने लगते हैं।

स्टेशन के बाहर भीख मांगतीं दो विक्षिप्त सी लगती महिलाएं बैठी थी। उनका विलाप इतना करुण था कि सभी का ध्यान खींच लेता। उनके पुराने ,धूल भरे, फटे कपड़े, गंदे बिखरे बाल देखकर सभी द्रवित हो जाते। तीन दिनों से उन्होंने कुछ नहीं खाया है। यह सुनकर हर आने जाने वाले कुछ ना कुछ पैसे उनके सामने रखें डाल देते। उनके टेढ़े ,पिचके, टूटे और गंदले से अल्मुनियम के कटोरी में डाले सिक्कों की खनक से उनके चेहरे पर राहत के भाव आ जाते थे।
आज अपनी अपनी जिंदगी के भागदौड़ में सभी व्यस्त हैं। जिंदगी इतनी कठिन और रूखी हो गई है कि किसी के पास किसी दूसरे के लिए समय नहीं है। इन महिलाओं को देखकर शायद ही किसी को ख्याल आता होगा कि इनसे इनकी परेशानियां पूछी जाए। इनकी कुछ उचित सहायता की जाए। जिससे इनको इस दर्द भरी, श्रापित जिंदगी से मुक्ति मिले। भीख में कुछ छुट्टे पैसे डाल कर सभी अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।
दरअसल भिक्षा में पैसे देकर कर्तव्य मुक्त हो जाने का हमारा इतिहास पुराना है। प्राचीन समय से हमारा देश और हम सभी बेहद सहनशील रहे हैं। हमारे भारत में बहुत पुराने समय से भिक्षावृत्ति एक सामाजिक प्रथा रही है। प्राचीन समय से साधु-संतों और विद्यार्थियों को भिक्षा देने का चलन था। ईश्वर की खोज में लगे साधु-संत भिक्षुक के रूप में ही जिंदगी बिताते थे।
वैदिक काल से उन्हें भोजन या धन दान में देना पुण्य माना जाता रहा है। प्राचीन गुरुकुलों और आश्रमों में शिक्षण निशुल्क होती थी। वहां पढ़ने वाले विद्यार्थी अक्सर आसपास के ग्रामों से भिक्षा मांग कर जीवन चलाते थे। इस प्रथा को सामाजिक व्यवस्था के रूप में देखा जाता था।
कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं कि खास दिनों पर भिक्षा या दान देखकर ग्रहों के बुरे असर को कम किया जा सकता है। इसलिए हमारे सहिष्णु समाज में, भीख देने की एक सहज प्रवृत्ति है। जरूरतमंदों को मदद करने का यह एक तरीका है। पर आज इस भिक्षावृत्ति का रूप बिगड़ गया है। कुछ लोगों ने इससे गलत तरीके से धन अर्जित करने का धंधा बना लिया हैं।
स्टेशन के बाहर पीपल के विशाल पेड़ के नीचे धूप और छाया खेल रही थी। वहां बैठी दोनों भिखारी महिलाएं बेहद कमजोर और दुबली पतली थी। उनकी हड्डियां तक नजर आ रही थीं। दोपहर की धूप तेज हो गई थी । सूरज सिर के ऊपर चमक रहा था। गर्मी और तपिश बढ़ गई थी। स्टेशन पर भीड़ काफी कम हो चुकी थी। शायद अभी किसी ट्रेन के आने का समय नहीं था। भीड़-भाड़ कम देखकर दोनों भिखारन ने एक दूसरे को देखा। नजरों ही नजरों में दोनों में कुछ बातें हुई।
दोनों फटे मोटे से टाट पर बैठी थीं। एक भिखारन ने टाट के एक कोने का हिस्से उठाते हुए दूसरे को कहा – “विमला ताई, देख इधर। आज तो दिन अच्छा है। मुझे बहुत पैसे मिले हैं।” विमला ने नजरें उठाकर देखा। ढेर सारे सिक्के और रुपए देखकर बोल पड़ी – ” हां, आज तूने तो बहुत कमाएँ हैं। मुझे तो आज बिल्कुल ही पैसे नहीं मिले हैं। ना जाने जग्गू दादा आज क्या करेगा? संजू, अच्छा है तू आज मार नहीं खाएगी। लगता है आज मेरा दिन ही खराब है। दो दिनों बाद आज तो रोटी मिलने का दिन है। कम पैसे देखकर ना जाने वह हरामी ठीक से खाना भी देगा या नहीं? “
संजू ने बड़ी सावधानी से दाएं बाएं देखा। फिर धीरे से मुस्कुराकर हाथ बढ़ा कर एक मुट्ठी सिक्के विमला के अल्मुनियम के कटोरी में डाल दिया और बोली – “अब तो तू भी मार नहीं खाएगी। पर आज तु देर से क्यों आई? तू तो जानती है कि सुबह में ज्यादा लोकल ट्रेनें गुजरती है। इसलिए सुबह के समय ही ज्यादा पैसे मिलते हैं। अच्छा जाने दे, आज तो हमें रोटियां देगा ना जग्गू दादा? अच्छा बता ताई, हम इन्हें इतने पैसे कमा कर रोज-रोज देते रहते हैं। फिर भी ये हमें ठीक से खाना क्यों नहीं देता है?”
विमला ने कड़वा सा मुंह बनाया। फिर अपने होठों को विद्रूप से बिचका कर बोल पड़ी – ” तू भी बिल्कुल पागल है संजू। हम खा पी कर मोटे दिखे, तो किसे हम पर दया आएगी? सारा खेल तो पैसों का है। ज्यादा पैसे भीख में मिलने के लिए हमें गरीब, गंदा और दुर्बल तो दिखना ही होगा ना?” फिर वह सावधानी से चारों ओर नजरें दौड़ाने लगी। धूप अब तक तीखी हो गई थी। विमला ने फटी साड़ी के पल्लू से अपने चेहरा पर बह आए पसीने को पोछा। फिर बड़ी धीमी आवाज में फुसफुसा कर बोली – “ना जाने क्यों जग्गू दादा नजर नहीं आ रहा है। बड़ा कमीना है यह भी। ना जाने आज भी कहां से एक भली सी लड़की को उठा लाया है। उस लड़की ने होश में आते रोना-धोना और शोर मचाना शुरू कर दिया था।
जग्गू और उसके गुंडो के कहने पर भी जब वो चुप नहीं हुई। तब उन्होंने बेरहमी से उसे मारना शुरू कर दिया। तूने तो देखा ही है यह सब। बड़ी मुश्किल से उस लड़की को समझा-बुझाकर चुप करा पाई हूं। इन्हीं सब में इतना समय लग गया।” विमला की आंखों से आंसू बहा आए थे। उसके नाक से भी पानी बहने लगा था। उसने अपना बाहँ मोड़ा और अपने सिलाई उधड़े ब्लाउज के बाजू से अपनी आंख और नाक पोछने लगी। फिर वह धीमी आवाज में फुसफुसाने लगी – ” भले घर की लड़की लगती है। अभी कच्ची उम्र की है। जग्गू और उसके गुंडों को कीड़े पड़े।”
दोनों की बातें अभी चल ही रही थी तभी संजू ने गौर किया। उसके बिल्कुल सामने कोई व्यक्ति आकर खड़ा है। उसने संजू के कटोरे में 5 रुपए का सिक्का ऊपर से गिराया। सिक्कों की खनखनाहट से चौंक कर संजू ने बातें बंद कर दी। संजू नजरें उठाकर उसे देखने लगी। एक उम्रदराज़ पुरुष वहाँ खड़ा होकर उसे बड़े गौर से देख रहा था। उसके सारे बाल सफ़ेद थे। जिस हाँथ से उसने संजू की कटोरे में पैसा डाला, वे अधिक उम्र की वजह से काँप रहे थे।
संजू और विमला को पुरुषों की गंदी और ललची नजरों का सामना करने की आदत पड़ गई थी। इसलिए संजू ने उस व्यक्ति को देख कर भी अनदेखा कर दिया। फिर संजू ने अपनी फटी साड़ी से अपने फटे ब्लाउज को ढकने की कोशिश करने लगी। फटे ब्लाउज में आधी नग्न पीठ नजर आ रही थी। नंगी पीठ को ढकने की उसकी कोशिश असफल रही। वह व्यक्ति वही खड़ा रहा। शायद उसे कहीं जाने की जल्दी नहीं थी या कुछ कहना चाहता था।
इस बार विमला ने कड़वी और तीखी आवाज में कहा – ” क्या बात है? साहब आगे जाओ ना?” विमला, संजू से उम्र में काफी बड़ी थी। उसके आधे से ज्यादा बाल सफेद हो चुके थे। चेहरे पर झुर्रियां ही झुर्रियां थी। आंखों के नीचे कालापन था। जबकि संजू की उम्र ज्यादा नहीं थी। गरीबी की मार से दबी संजू को गौर से देखने पर वह खूबसूरत लगती थी। यह उसे देख कर समझा जा सकता था, कि उसकी खूबसूरती मैंले कपड़ों में छुप गई है।
महिला सौंदर्य के लोलुप पुरुषों के ललचाई नजरों को देखकर विमला अक्सर संजू की हिफाजत के लिए लड़ पड़ती थी। उस व्यक्ति को तब भी जाते नहीं देखकर, संजू ने अपना पुराना पैंतरा चला। वह पागलों की तरह हरकतें करने लगी और धीमी आवाज में फुसफुसा कर बोली – ” क्यों खाली पीली परेशान हो रही है ताई? जग्गू रहता तो अभी रेट तय करने लगता। देखो ज़रा बुड्ढे को। पैर क़ब्र में लटकें हैं। फिर भी…..।”
संजू ने अपनी बातें पूरी भी नहीं की थी। तभी उस व्यक्ति ने उसे धीरे से पुकारा – ” संजना, संजना, तुम संजना होना? मैं तुम्हें पहचान गया। तुम बिरार में रहने वाली गोकुल काले की बिटिया संजना ही होना ना? मैं तुम्हारा राघव काका हूं बिटिया। तू मेरी बेटी गुड़िया के साथ खेल कर बड़ी हुई है। मैं तुझे कैसे नहीं पहचानूगां? पहचाना नहीं क्या तुमने मुझे?” इसके साथ हीं उस व्यक्ति ने अपने चेहरे पर लगा हुआ मास्क हटाया।
विमला और संजू ने चौंक कर उस व्यक्ति को गौर से देखा। वह वृद्ध अपने आप हीं बोलता जा रहा था – ” तुम कहां गायब हो गई थी? तुम्हारे सारे परिवार वाले और तुम्हारे पति ने तुम्हें खोजने की बहुत कोशिश की थी। फिर थक हार कर दूसरी शादी कर ली तुम्हारे पति ने। वह बेचारा भी कितने साल इंतज़ार करता?
इतने सालों बाद आज तुम मुझे यहां, ऐसी हालत में मिली हो। तुम्हारी बेटी अब बड़ी हो गई है। बड़ी प्यारी बच्ची है। चलो मैं तुम्हें उनके पास ले चलता हूं। मेरे साथ घर चलो” संजू की आँखें ना जाने क्यों गीली हों गईं। वह अपने आप में बुदबुदाई – इतने साल? कितने साल? पर उसने कुछ जवाब नहीं दिया। संजू को चुप देख कर, उस व्यक्ति ने संजू की कलाई पकड़ ली और खींच कर अपने साथ ले जाने लगा। विमला घबराहट में संजू की दूसरी कलाई पकड़कर अपनी ओर खींचने लगी और शोर मचाने लगी। इतने हो हल्ला का नतीजा यह हुआ कि वह चारों तरफ भीड़ इकट्ठी हो गई।
कुछ देर संजू खाली-खाली नजरों से उस व्यक्ति को घूरती रही। तभी अचानक ना जाने क्या हुआ। संजू पर जैसे पागलपन का दौरा पड़ गया संजू अपना माथे के बाल खींच खींच कर पागलों की तरह चिल्लाने लगी। विमला ताई ने संजू का। चेहरा देखा और वह भी अचानक बिल्कुल गुमसुम और चुप हो गई।
उस वृद्ध व्यक्ति ने हार नहीं मानी। उसने संजू का हाथ ज़ोरों से पकड़ लिया और अपने साथ खींच कर ले जाने लगा। इतनी भीड़ और हल्ला सुनकर पास की चाय की गुमटी पर बैठकर चाय पीते हुए पुलिस के कुछ सिपाही वहां आ गए। पुलिस वाले ने बीच-बचाव किया। पर वह व्यक्ति टस से मस नहीं हो रहा था। वह अपनी बात पर अड़ा हुआ था। अंत में पुलिस वाले संजू, विमला और उस व्यक्ति को लेकर पुलिस स्टेशन चले गए।
वह व्यक्ति राघव, पुलिस इंस्पेक्टर को पूरी कहानी सुनाने लगा। यह घटना 1983 की है। संजना एक बैंक में काम करती थी। रोज वह अपने सहयोगियों के साथ लोकल ट्रेन से ऑफिस चर्चगेट आती जाती थी। वह बड़ी खुशमिजाज, जिंदगी से भरपूर, कम उम्र की एक खूबसूरत विवाहित महिला थी।
उस दिन वह बड़ी ख़ुश थी। अगले दिन उसकी बेटी का जन्मदिन था। जिसे वह बड़े धूमधाम से मनाना चाहती थी। उसने अपने ऑफिस में सभी को अपने घर, विरार आमंत्रित किया। उस दिन ऑफिस से घर से लौटते समय वह लोकल ट्रेन से जोगेश्वरी में उतर गई। उसने अपनी सहेलियों को बताया, उसे वहां अपनी ननद के घर उन्हें निमंत्रण देने जाना है।
लेकिन उसके बाद वह कभी घर नहीं लौटी। पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई काफी छानबीन होती रहा। पर कुछ नतीजा नहीं निकला। इतने वर्षों में उसके पति ने दूसरी शादी कर ली है। संजना की बेटी बड़ी हो चुकी है। संजना के माता पिता नहीं रहे। उसके भाई की शादी हो गई है। संजू और विमला वहीं सामने बेंच पर बैठी सब बातें सुनती रहीं।
आज वर्षों बाद संजना अपने पड़ोसी को इस हालत में मिली है। राघव ने इंस्पेक्टर से थोड़ा वक्त मांगा ताकि वह संजना के भाई को बुला कर ला सके। इंस्पेक्टर के आश्वासन देने पर राघव संजना के भाई को बुलाने चला गया। पुलिस इन्स्पेक्टर ने विमला और संजू वही एक बेंच बैठ कर इंतज़ार करने कहा।
वृद्ध राघव के जाने के बाद विमला ताई संजू के बिल्कुल बगल में खिसक आई और बिलकुल धीमी आवाज़ में बोली – “घबरा मत संजू। पर मुझे तू एक बात बता, कि क्या यह आदमी सच बोल रहा था?” संजू ने विमला ताई की हथेलियां अपनी हथेली में कसकर पकड़ लिया। अपने सूखे पापड़ीयाये होठों पर अपनी जीभ फेराई । उसकी आँखें डबडबा आईं थी। बेहद सहमी और धीमी आवाज में संजू बोल पड़ी – ” हां यह बिल्कुल सच बोल रहा है ताई। जिस दिन मेरी किडनैपिंग हुई। उस दिन मैं लोकल ट्रेन से जोगेश्वरी में से उतर कर ऑटो में बैठी। वहाँ सड़कें थोड़ी सुनसान थीं। अँधेरा घिर आया था।अचानक ना जाने बगल में बैठे व्यक्ति ने क्या किया। मैं बेहोश हो गई। होश में आने पर मैंने अपने को जग्गू दादा के अड्डे पर पाया। तब समझ आया की ऑटो में बैठे अन्य दो लोग और ड्राइवर सभी जग्गू के आदमी थे।
आगे की तो सारी कहानी और मेरी सारी जिंदगी तू जानती है।” विमला ताई ने उसकी हथेलियों को और कसकर पकड़ लिया और बोल पड़ी – ” पागल है क्या तू? इतना अच्छा मौका मिला है। चुपचाप चली क्यों नहीं जाती वापस? इस नर्क में जीने का क्या फायदा? संजू के दुबले-पतले गालों पर आंसू बहने लगे थे। उसने उन्हें पोंछने की कोशिश नहीं की। विमल ताई को देख कर बोल पड़ी – ” ताई तुझे क्या लगता है मैं वापस नहीं जाना चाहती हूं? आज तक हर रात यही सपना देखा कि मेरा पति और परिवार वाले मुझे यहां से बचा कर ले जाएंगे। मैं फिर से अपनी खुशहाल जिंदगी में वापस लौट जाऊंगी।”
संजू दो मिनट मौन हो गई। फिर उसने दबी जबान में बोलना शुरू किया – ” ताई तूने गौर किया ना? राघव काका मुझे ले जाना चाह रहे थे। तब चारों तरफ से जग्गू के गुंडों ने घेर रखा था। एक नें मेरे कानों में धीरे से कहा – ” बिल्कुल चुप रह। चाकू के एक हीं वार से बुड्ढे की आँतें यहां जमीन पर फैल जाएंगी। इस बुड्ढे की बेटी-वेटी है क्या? तेरी सहेली थी ना इसकी बेटी? बता उसे भी उठा लाएंगे। उसके साथ तेरा मन लगा रहेगा।”
अब तू ही बता ताई क्या वह हमें इतनी आसानी से यहां से जाने देंगे? और अगर मैं निकल कर चली भी गई, तब कहां जाऊंगी? तूने सुना नहीं क्या ? पति ने दूसरी शादी कर ली है। बेटी बड़ी हो गई है। मेरी जिंदगी की कहानी उसकी जिंदगी बर्बाद कर देगी। भाई अपने परिवार के साथ व्यस्त होगा। माता-पिता रहे नहीं। मेरी नौकरी भी जा चुकी है। मुझे तो याद हीं नहीं रहा था कि कितने साल बीत गए हैं। दुनिया बहुत आगे निकल गई है। इस नई दुनिया के लोगों के बीच मेरी कोई जगह नहीं।
इतने साल तक इस माहौल में रहने के बाद, बदनामियां क्या पीछा छोड़ेंगीं? क्या उस दुनिया में किसी को मेरा इंतजार है? क्या कोई मुझे अपने साथ रखना चाहेगा? शुरू के कुछ साल तो नशीली दवाओं के इंजेक्शन में मुझे कुछ होश ही नहीं रहा। अब तो उस नशे की आदी हो चुकी हूं। दिमाग भी इन नशे की दवाइयों के बिना पागल हो जाता है। अब बाकी जिंदगी भी अब इसी नर्क में कटेगी। यही अब हमारी दुनिया बन गई है ताई।” बोलते बोलते धीरे से सिसक पड़ी संजू। संजू थोड़ा रुकी और फिर बोल पड़ी – “ताई, जब तक यह बाजार सजता रहेगा। तब तक औरतों किड्नैप होतीं रहेंगी, बिकती रहेंगी । यह सब चलता रहेगा। अगर खरीदारी ना रहे। तब ना समय बदल सकता है। जहां भी चरित्र की बात होती है, लोग औरतों पर क्यों उंगलियां उठाते हैं? क्या औरत कभी भी अकेली चरित्रहीन हो सकती है?
तभी पुलिस स्टेशन में जग्गू दादा अपने कुछ गुंडों के साथ पहुंचा। उसने इंस्पेक्टर को देखते हुए कहा – ” साहब यह मेरी बहन है। इसका दिमाग बिल्कुल खराब है। बिल्कुल पगला गई है। पागलपन में या ना जाने क्या-क्या करती रहती है। हम लोग गरीब आदमी हैं साहब। पेट भरने के लिए भीख मांगने चली आती है यह। क्या इसे मैं अपने साथ घर ले जा सकता हूं?” पुलिस इंस्पेक्टर ने प्रश्न भरी नजरों से संजू की ओर देखा। वह देर कुछ सोचता रहा। फिर उसने संजू से पूछा – ” क्या तेरा नाम संजना है? जो बात राघव ने कही क्या वह सच है? या यह तेरा भाई है?” संजू की हथेलियां पसीने से भीग गई थी। उसकी कांपती हथेलियों को विमला ने धीरे से सहलाया। इस बार संजू ने सिर उठाया। इंस्पेक्टर को देखकर बोली – ” साहब मैं किसी को नहीं जानती। किसी संजना को भी नहीं जानती। यह तो मेरा भाऊ मुझे लेने आ गया है। मैं तो गरीब औरत है। मैं क्या जानेगी बैंक की नौकरी? मैं घर जाएगी। मैं इसके साथ घर जाएगी।”
अपनी बात पूरी करते-करते संजू उठ खड़ी हुई। विमला की बाँहें खींचते खींचते वह पुलिस स्टेशन से निकली और चुपचाप आगे बढ़ गई। पीछे पीछे जग्गू भी निकल आया।
यह एक सच्ची घटना पर आधारित है। मेरी एक करीबी मित्र के अनुरोध पर मैंने इसे कहानी का रूप दिया है। अफसोस की बात है कि दुनिया इतनी आगे बढ़ गई है। फिर भी समाज में महिलाओं और बच्चों के साथ इस तरह के अन्याय होते रहते हैं। भिक्षावृत्ति, फ्लेश ट्रेडिंग, ह्यूमन ट्रैफिकिंग, और्गेन ट्रैफ़िकिंग जैसे अनेकों अपराध आज के सभ्य समाज पर कलंक है।


कुछ लड़ाई-झगड़े
मोहब्बत भरें होतें है।
ग़र नाराज़गी में मीठास,
ग़ुस्से में प्यार,
लहजे में अपनापा हो।
तो रिश्तों की ख़ुशबू
फैलती रहती है।

रिश्तों के अहमियत
रिश्तों के अहमियत
को ना समझाने वाले
हल्की सी चोट से भी
तिलमिला उठतें है।
फिर क्यों दूसरों
पर चोट करते है?
किसी के मौन को
कमजोरी समझ कर?
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