चाँद को रोशन
करता है सूरज,
ख़ुद को जला-तपा कर,
अनंत काल से ।
क्या इंतज़ार है उसे,
कभी तो मिलन होगा?
नहीं, आफ़ताब को मालूम,
मिलन नहीं होगा कभी।
फिर भी जल रहा है…….
बे-लौस, निस्वार्थ मोहब्बत में ।
चाँद को रोशन
करता है सूरज,
ख़ुद को जला-तपा कर,
अनंत काल से ।
क्या इंतज़ार है उसे,
कभी तो मिलन होगा?
नहीं, आफ़ताब को मालूम,
मिलन नहीं होगा कभी।
फिर भी जल रहा है…….
बे-लौस, निस्वार्थ मोहब्बत में ।

ज़िंदगी में ज़ख़्म
लगते रहेंगे।
उन्हें भूल जाओ
तो कोई बात नहीं।
पर सबक़ ना भूलना।
ग़र भूल गए तो
ज़िंदगी गुरु बन
फिर-फिर सिखाएगी।

लेखक, कवि औ
कलाकार कल्पना और
ख़्वाबों की दुनिया से
मोतियाँ चुन
सजाते हैं अपनी रचायें।
यह ख़ज़ाना खुली आँखों
से नहीं दिखता।
दिल से हीं महसूस
किया जा सकता है,
ख़्वाबों की यह तिज़ारत।
मुनाफ़ा-नुक़सान में
उलझने वाले क्या जाने
दिल की ये ख़ूबसूरत बातें?
महाभारत युद्ध के समय
श्री कृष्ण उपदेश देते है।
कर्म-धर्म के सच्चे ज्ञान की,
जब अर्जुन अपनों से युद्ध करने
से हिचकिचाता हैं तब।
क्या महाभारत और गीता
नहीं है, हम सब के अंदर।
मानसिक द्वन्द के समय
हमारा दिल कृष्ण बन
समझाता है,
दिमाग़ अर्जुन बन
दुविधा में घिर जाता है।
शुभ गीता जयंती!!
Happy Geeta Jayanti !!!
मार्गशीर्ष महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी को गीता जयंती मनाई जाती है। इस दिन मोक्षदा एकादशी भी कहते है। इस बार गीता जयंती 14 दिसंबर को मनाई जा रही है। मान्यता है गीता ग्रंथ का प्रादुर्भाव मार्गशीर्ष मास में शुक्लपक्ष की एकादशी को हुआ था।

ग़र रिश्ते रुलाने लगे,
थकाने लगे।
रूह की ताक़त निचोड़ दे।
तब दूरी है ज़रूरी।
जो नहीं किया उसकी
सफ़ाई क्यों है देनी?
जब अन्तरात्मा थक जाए।
तब आत्मसम्मान का
सम्मान है ज़रूरी।
दुनिया में बहुत कुछ
ख़त्म हो रहा है।
मारती नदियाँ, मृत सागर,
और मरते रिश्ते।
किसी को फ़र्क़ पड़ता है क्या?
जिन्हें फ़र्क़ पड़ेगा।
वे संभलना और रिश्ते
बचाना सीख लेंगे।

क्यों कुरेदते हो
पुरानी बातें?
रूह पर उकेरे
यादों और दर्द के,
निशां कभी मिटते हैं क्या ?
खुरच कर हटाने की
कोशिश में कुछ ज़ख़्मों
के निशां रह जातें हैं
नक़्क़ाशियों से।
कई अधूरी ख़्वाहिशें,
गहनों में जड़े नागिनों सी
अपनी याद दिलाती हैं।
जब करो चर्चा,
गुज़रते हैं उसी दौर से।

घर के छत की ढलाई
के लिए लगे बल्ले, बाँस
और लकड़ियों के तख़्ते ने
बिखरे रेत-सीमेंट को
देख कर कहा –
हम ना हो तो तुम्हें
सहारा दे मकान का
छत कौन बनाएगा?
कुछ दिनों के बाद
मज़बूत बन चुका छत
बिन सहारा तना था।
और ज़मीन पर बिखरे थे
कुछ समय पहले
के अहंकार में डूबे बाँस,
बल्ले और तख़्तियाँ।
ज़िंदगी रोज़ नए रंग दिखाती है ।

कहते हैं,
शादियाँ बिकने लगीं हैं।
जब देखने वाले ख़रीदार बैठे है,
ज़रूर बिकेंगी।
टिकें या ना टिकें,
क्या फ़र्क़ पड़ता है?
नई हुईं फिर बिकेंगी।
शादियों में, दिखावे के
बाज़ार बिकेंगे।
नई-नई अदायें बिकेंगी।
शो बिज़नेस की दुनिया है।
सिंपल लिविंग हाई थिंकिंग,
सादा जीवन उच्च विचार
का नहीं है बाज़ार।
ग़र हो निहारने वाली हुजूम,
तो क्या ग़म है?
शादियाँ बिकेंगी।

उनसे सच की
क्या उम्मीद करना,
जो ख़ुद से भी झूठ बोलतें हैं?
बड़े सलीक़े से झूठ बोलते हैं।
तय है, हर लफ़्ज़ से, बेख़ौफ़ टपकते झूठ का हुनर ,
मुद्दतों में सीखा होगा।
वे हमें नादाँ कहते हैं।
हैं नादान क्योंकि
हमने भी भरोसा करना ,
यक़ीं करना अरसे
से सीखा है।

ठंड में बढ़ जाती है,
गुम चोट की कसक।
रातों में बढ़ जाती हैं,
गुम और भूली-बिसरीं
यादों की कसक।
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