
सागर की लहरों
की तरह समय
की लहरों के साथ
हम भी उठते-गिरते
रहतें है।
समय की लहरें
जब हमारा हौसला
ऊपर ले जाये,
तब समय होता है
ऊपर उठने का।
William Wordsworth was spot on when he said “Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings: it takes its origin from emotion recollected in tranquility.” When my pen meets the paper, it always captures the many moods and their wild swings and emotions and their detours which overflows from my heart spontaneously into the paper transmogrifying into verses!!

सागर की लहरों
की तरह समय
की लहरों के साथ
हम भी उठते-गिरते
रहतें है।
समय की लहरें
जब हमारा हौसला
ऊपर ले जाये,
तब समय होता है
ऊपर उठने का।

ज़िंदगी के महाभारत में
कई चेहरे आए गए।
देखी कितनों की फ़ितरतें
नक़ाबों में छिपी।
जीवन जयकाव्य में
सारथी बन मिलते रहे
कई कृष्ण से।
हम दुआओं में
याद रखते हैं
उन्हें संजीदगी से।

फ़िक्र में डूबे हुए क्यों हैं हम?
अपने वजूद की अहमियत छोड़?
फ़िक्र में डूबे दिलो-दिमाग़
और भटकते ख़्वाब
सुकून कैसे पहुँचाएगें?
क्यों गँवानी आधी ज़िंदगी
फ़िक्र के अंधेरे में?
जहाँ ना पता चले
रौशनी और बहार
कब आए कब गये?
Psychological fact
Overthinking is caused by a single emotion: fear. When you focus on all the negative things that might happen,

दर्द की कायनात और
हिसाब भी कुछ अजीब है।
क़र्ज़ की तरह बढ़ता है।
ना तरकीब किश्तों की,
ना सूद-ब्याज का हिसाब।
ना ठहरता है
ना गुजरता है।
हँस कर छलो तो दर्द बढ़ता है।
जितना भागो, पकड़ता है।
दर्द कहाँ ले जाता है?
यह तय है ज़िंदगी
की राहें और लोगों
को बदलता है।

स्वाभिमान अच्छा है
ग़ुरूर नहीं।
कितने हिचक के बाद
माँगते हैं लोग मदद,
अपनी ख़ुद्दारी दरकिनार कर।
मदद ना करो तो है अच्छा,
मदद कर याद दिलाने से।
स्वाभिमान अच्छा है,
ग़ुरूर दिखाने से।

ज़िंदगी की हर जंग में,
हर महाभारत में आश्वस्त हैं।
क्योंकि जीवन के
हर सैलाब में तुम्हें साथ
ले कर चल रहें हैं।
भरोसा है,
जब तुमने जंग दिया है
तो जय दिलाने सारथी
बन तुम आओगे हीं।

ज़िंदगी के जंग में,
जब हम अपना सम्मान करना,
अपने लिए खड़े होना
सीखने लगते है।
तब कई लोग हम से
दूर हो जातें है।
वे साथ नहीं छोड़ते
क्योंकि वे कभी
साथ थे हीं नहीं।
बस दिखने लगती है
सब की फ़ितरत।
जो अपने हैं,
साथ खड़े मिलेंगे।

किसी और की बातों
और राय को बोझ
ना बनने दो।
सुन सब की लो।
पर सुनो अपने दिल की।

चींटियाँ हों या इंसान।
ज़िंदगी जीने की
जद्दो-जहद में,
क्या दोनों
एक सी ज़िंदगी
नहीं जी रहे?

जो उलझ गई वो है
ज़िंदगी साहब।
सब की है अपनी ज़िंदगी
अपनी राहें।
कई बार सुलझती सी,
कई बार उलझने और
उलझती सी।
ना सज्दा ना जप के
मनके राह सुझाते है।
दिल परेशान है,
ये रास्ते किधर जातें है?
अब उलझनों को
आपस में उलझने
छोड़ दिया है।
यह सोंच कर कि
उन्हें बढ़ाने से
क्या है फ़ायदा?
ज़िंदगी ना उलझी
तो क्या है मज़ा?
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