जुस्तुजू
उलझी बातें, उलझी चालें।
दूसरों को गिराने के ख़्याल।
ईश्वर की अजीब मख़्लूक़… रचना है इंसान।
यह सब करके भी है जुस्तुजू
पाने के सीधे -सच्चे मख़्लूक़-ए-ख़ुदा…इंसान।
जो दुनिया को दोगे, वही मिलेगा।
क्यों नहीं आता ऐसा ख़्याल।

William Wordsworth was spot on when he said “Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings: it takes its origin from emotion recollected in tranquility.” When my pen meets the paper, it always captures the many moods and their wild swings and emotions and their detours which overflows from my heart spontaneously into the paper transmogrifying into verses!!
जुस्तुजू
उलझी बातें, उलझी चालें।
दूसरों को गिराने के ख़्याल।
ईश्वर की अजीब मख़्लूक़… रचना है इंसान।
यह सब करके भी है जुस्तुजू
पाने के सीधे -सच्चे मख़्लूक़-ए-ख़ुदा…इंसान।
जो दुनिया को दोगे, वही मिलेगा।
क्यों नहीं आता ऐसा ख़्याल।



नारी के झुकने, झुक कर उठने,
झुकी नज़रों को उठाने की अदा में
दिखती है कायनात की ख़ूबसूरती।
पर नहीं दिखता रूह-ए-दुर्गा ।
क्यों दिखता है सिर्फ़ हुस्न औ जिस्म?
कुछ लोगों की तस्वीर नहीं फ़क़त फ़्रेम
देखने की अजब है आदत।
औरत को तवायफ़….नगरवधु
बनाने की परम्परा जाती नहीं
कि नज़र आते नहीं तवायफ़ को
वधू बनाने वाले।
बदन पे गिरवी निगाहों से आगे देख,
उसका वजूद नज़र आएगा।
NEWS Ankita Bhandari Murder Case –
Main kya 10k mein bik jaungi’: Ankita
told her friend in WhatsApp chat.

नींद और ख़्वाबों की दुनिया
है तिलस्म सी रहस्यों भरी।
झिलमिलाते आधे-अधूरे-पूरे ख़्वाब,
सिर्फ़ स्याह रातों की नींद में नहीं,
जागती आँखों में भी रंग हैं भरते।
ज़िंदगी की दौड़ ख़्वाब और
उसकी ताबीर की है कहानी।
उन्हें बुनने-ख़रीदने-बेचने में
बीत जाती है ज़िंदगानी।
The World Dream Day is a strong reminder of our ability to recognize our strength and make positive change in our lives and in the world. The theme for celebrating World Dream Day 2022 will be “The Higher Dream”.


चटख़ कर बिना शोर टूटते हैं दिल।
यक़ीन और विश्वास बेआवाज़ टूटते है।
तय है, खामोशी में भी है शोर।
ग़र सुन सके, तो हैं अलफ़ाज़ बेमानी।
कहने वाले कहते हैं –
खामोशी होती है बेआवाज़ …. शांत।
खामोशी की है अपनी धुन
सुन सके तो सुन।

कुछ आवाज़ें दिल-औ-दिमाग़ को
हैं देतीं शांति और सुकून,
जैसे दूर मंदिरों में टुनटुनाती घंटियाँ
या कहीं बज रहा हो शांत, धीर-गंभीर शंख।
लहजा मानो, हलकी से आ रही हो
ख़ुश्बू या आरती की आवाज़ें।
जैसे ये कहतीं हैं गले लगा लो,
मीठी बोली की बहती कलकल-छलछल
चंचल बहते पानी को।
अमन और शांति की बहा दो निर्झर।
The International Day of Peace (or World Peace Day) celebrated annually on September 21 is devoted to strengthening the ideals of peace, both within and among all nations and peoples.

दर्द हो या ख़ुशियाँ,
सुनाने-बताने के कई होते हैं तरीक़े।
लफ़्ज़ों….शब्दों में बयाँ करते हैं,
जब मिल जाए सुनने वाले।
कभी काग़ज़ों पर बयाँ करते है,
जब ना मिले सुनने वाले।
संगीत में ढाल देते हैं,
जब मिल जाए सुरों को महसूस करने वाले।
वरना दर्द महसूस कर और चेहरे पढ़
समझने वाले रहे कहाँ ज़माने में?

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