जिनके पास अपने हैं,
वो अपनों से झगड़ते हैं.
जिनका कोई नहीं अपना,
वो अपनों को तरसते हैं.
कल न हम होंगे न गिला होगा।
सिर्फ सिमटी हुई यादों का सिललिसा होगा।
जो लम्हे हैं चलो हंसकर बिता लें।
जाने कल जिंदगी का क्या फैसला होगा।

Unknown
William Wordsworth was spot on when he said “Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings: it takes its origin from emotion recollected in tranquility.” When my pen meets the paper, it always captures the many moods and their wild swings and emotions and their detours which overflows from my heart spontaneously into the paper transmogrifying into verses!!
जिनके पास अपने हैं,
वो अपनों से झगड़ते हैं.
जिनका कोई नहीं अपना,
वो अपनों को तरसते हैं.
कल न हम होंगे न गिला होगा।
सिर्फ सिमटी हुई यादों का सिललिसा होगा।
जो लम्हे हैं चलो हंसकर बिता लें।
जाने कल जिंदगी का क्या फैसला होगा।

Unknown
जाने कौन सी शौहरत
पर आदमी को नाज़ है,
जो आखरी सफर के लिए भी
औरों का मोहताज़ है….

Unknown
कोई हुनर ,
कोई राज ,
कोई राह ,
कोई तो तरीका बताओ….
दिल टूटे भी न,
साथ छूटे भी न , कोई रूठे भी न ,
और ज़िन्दगी गुजर जाए।
Unknown
गुज़र जाते हैं खूबसूरत लम्हें ,
यूँ ही मुसाफिरों की तरह .
यादें वहीं खडी रह जाती हैं ,
रूके रास्तों की तरह .

Unknown
तहज़ीब के ख़िलाफ़ हुआ,
सच का बोलना..!!
अब झूठ ज़िन्दगी के ,
सलीक़े में आ गया…!!
– Unknown

ग़ज़ल: बशीर बद्र
खुद को इतना भी मत बचाया कर,
बारिशें हो तो भीग जाया कर.
चाँद लाकर कोई नहीं देगा,
अपने चेहरे से जगमगाया कर.
दर्द हीरा है, दर्द मोती है,
दर्द आँखों से मत बहाया कर.
काम ले कुछ हसीन होंठो से,
बातों-बातों में मुस्कुराया कर.
धूप मायूस लौट जाती है,
छत पे किसी बहाने आया कर.
कौन कहता है दिल मिलाने को,
कम-से-कम हाथ तो मिलाया कर.

वर्षा की चंद बूँदों ने
सतरंगा इंद्रधनुष……
सोन्धी सी ख़ुशबू फैला
तन मन को गीला कर दिया .
काग़ज़ पर बारिश को बूँदों
को उतारने …..लिखने की कोशिश की.
पर लिखने का मज़ा तब है जब
पढ़ने वाले का मन उस में भीग जाए .
और दिल कोई गीत गुनगुनाये.

कहते है –
जीत कर, फिर से हार जाना..
यही तो रवायत है, रिश्ता निभाने की…
पर जब किसी को सिर्फ़ जीतने की
आदत हो जाए .
झुकना नहीं सिर्फ़ झुकाना
ही नियम बन जाय……..
तब ?????
हारते और झुकते रहने
से अच्छा है –
अपने लिए खड़े होना सीखना ……

वक़्त बहुत कुछ दिखलाता है .
कभी ख़ुशियों की बरसात ,
कभी ग़मों की धूल भरी आँधी .
ख़ूबी तो तब है , जब
अपने ऊपर से …….
हर आँधी को बस गुज़र जाने दें
घास की तरह .
वृक्ष की तरह तने रहे तो
टूट भी सकते है .

भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है इसका भय अौर चिन्ता,
भूत काल की यादें, दुख ….अफसोस ….पछतावा
क्या कुछ बदल सकता है ?
फिर क्यों नहीं चैन से साँस लिया जाय
अौर वर्तमान में …..
जिया जाये ? ?
You must be logged in to post a comment.