जुम्बिश-ए-नज़र

ओंठों को जुंबिश दे

कुछ बोलने की कोशिश में

उसकी बङी-बङी  आँखें पहले हीं हँस पङीं।

जुम्बिश-ए-नज़र ने शायद

बिना लब खोले

बिना कुछ बोले,

अपनी  हर बात कह दी थी।

सुननेवाला समझ  गया।

…………पता चला वह तो मूक है।

कुछ बोल हीं नहीं सकती।

शायद इसलिये नज़रों से बातें करतं थी।

 

 

 

 

 

 

 

चुम्बक magnet

 

पल पल बदलता यह मन

ना जाने क्या ढूँढता रहता है .

शायद यह खींचता  है कुछ

अौर ख़ुद खींच जाता  है किसी ओर।

चुम्बक की तरह लगता है ….

 

गुलाबों जैसी हंसी

उसकी

गुलाबों जैसी हंसी

मीठी मधुर

जो बिखेरती है

इत्र….जैसी खुशबू

हर अोर।

 आंखें सूरज सी

जीवन की सुगंध अौर

 सुबह की ताज़गी से भरी….

शुकून देती है।

दिलों दिमाग़ का बोझ

दिलों दिमाग़ का बोझ

जब तन तक उतर आए …..

जिस्म को उदास , मायूस बीमार बनाए .

तब ज़रूरी है इसे ऊतार फेंकना.

वरना तन और मन दोनो

व्यथा …दर्द में डूब जाएँगे .

जन्नत

Best I have ever read on Kashmir situation…

उम्र जन्नत में रह कर,

उसे उजाड़ने में गुज़ार दी,

और जिहाद बस इस बात का था,

की मरने के बाद जन्नत मिले…!!!

ज़िंदगी के रंग – 63

अक्सर मायूस ….उदास …..दिल

ज़िंदगी के रंगो से

छोटी छोटी ख़ुशियाँ ढूँढ ही लेता है .

जैसे

अंधेरे में रौशनी खोजती ये आँखे ,

अपने आप को ढाल

कुछ ना कुछ रौशनी खोज ही लेती है .

चार दीवार

कहते हैं घर की चार दीवारों में रहो !

सीता,  द्रौपदी,अहिल्या अपने घरों में

रहीं  क्या सुरक्षित  ?

पर कहलाईं सती,  पवित्र  अौर दिव्य ।

आज ना कृष्ण हैं ना राम उद्धार को ,

है मात्र अपमान अौर नसीहतें।

काश स्त्री सम्मान की नसीहतें सभी को दीं जाएँ ।  

 

सीता का हरण उनकी कुटिया से रावण ने कामांध हो कर किया था। 

द्रौपदी का चीर हरण परिवार जनों के बीच भरे दरबार में हुआ था। उनके  सखा कृष्ण ने उनकी रक्षा की।

गौतम ऋषि  की पत्नी अहिल्या से   इन्द्र ने कामेच्छाग्रस्त हो, धोखे से संबंध उनके  कुटिया में बनाया । उनके पति का रूप धारण कर छल-कपट से  उनका स्त्रीत्व भंग किया। कुपित गौतम ऋषि से अपनी पत्नी को शिला में बदल दिया। बाद में  भगवान राम ने उनका अपने पैरों से स्पर्श कर उद्धार किया।

 

 

ज़िंदगी के रंग – 63

पलक झपकते कभी कभी

कितना कुछ बदल जाता है .

कभी मन आँखों के रास्ते

बरस जाता है.

कभी आसमान के आँसू

बरसात बन बरस जाते है.

इन्हें पन्ने पर उतारने की कोशिश …..

शब्दों में बाँधने की हर कोशिश

बहा ले जाती है ये बरसाती बूँदे……

ज़िंदगी के रंग -62

समंदर ने पैरों के पास

अपने झागो के साथ

कुछ सीपियाँ ऐसे

ला कर

छोड़ गया ,

जैसे कुछ लौटा रहा है.

ज़िंदगी भी अक्सर बड़ी मासूमियत से

बहुत कुछ अचानक लौटा देती है.

ठीक ही कहते है ,

जो दो वह लौट कर ज़रूर आता है .

जिंदगी के रंग – 61

ना करना चाहो तो हजार बहाने है ……

करने वाले कर जातें है बिना कुछ कहे -सुने.