
एक नौजवान लेखक के कलम में ऐसी
क्या ताक़त थी कि कुछ लोगों
में इतना डर भर गया ?
क्यों कहते हैं कलम आज़ाद होती है .
यह दुर्घटना है या लिखने की सज़ा?
William Wordsworth was spot on when he said “Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings: it takes its origin from emotion recollected in tranquility.” When my pen meets the paper, it always captures the many moods and their wild swings and emotions and their detours which overflows from my heart spontaneously into the paper transmogrifying into verses!!

एक नौजवान लेखक के कलम में ऐसी
क्या ताक़त थी कि कुछ लोगों
में इतना डर भर गया ?
क्यों कहते हैं कलम आज़ाद होती है .
यह दुर्घटना है या लिखने की सज़ा?
श्रद्धांजलि Tribute to my husband.
We donated his eyes. I know He is still somewhere, watching this beautiful world.
जब देखा तुम्हें
शांत, नींद में डूबी आँखें
शीतल चेहरा …..
चले गए ऐसा तो लगा नहीं.
वह पल, वह समय, वह दिन ….
ज़िंदगी के कैलेंडर का असहनीय दिन बन गया .
उस दिन लगा –
ऐसा क्या करूँ कि तुम ना जाओ?
कुछ तो उपाय होगा रोकने का.
रोके रखने का, लौटाने का ……
कुछ समझ नहीं आ रहा था.
कुछ भी नहीं ….
पर इतना पता था –
रोकना है, बस रोकना है .
तुम्हें जाने से रोकना है .
और रोक भी लिया ………
अब किसी भी अजनबी से मिलती हूँ
तब उसकी आँखों में देखतीं हूँ ….
कुछ जाना पहचाना खोजने की कोशिश में .
कहीं तुम तो नहीं …….
शायद किसी दिन कहीं तुम्हें देख लूँ.
किसी की आँखों में जीता जागता .
बस दिल को यही तस्सली है ,
तुम हो, कहीं तो हो, मालूम नहीं कहाँ ?
पर कहीं, किसी की आँखों में.
हमारी इसी दुनिया में.
या क्षितिज के उस पार ………?
श्रद्धा सुमन हैं ये अश्रु बिंदु
जो लिखते वक़्त आँखों से टपक
इन पंक्तियों को गीला कर गए .


बर्बरता और क्रूरता की इंतिहा हो गई .
किसी की आँखों का मोल नहीं है
किसी के जीवन का मूल्य नहीं .
मासूमियत भी नज़र नहीं आई .
है अनमोल सिर्फ़ अपनी दुश्मनी, 5 हज़ार
रुपये और अपनी हैवानियत !!!

पृथ्वी को हमने डस्टबीन बना दिया ,
दिल नहीं भरा है तब सागर की ओर मुड़ गए .
फिर भी तसल्ली नहीं हुई तो
एवरेस्ट का भी यह हाल कर दिया .
हद है स्वार्थ परस्ता और नासमझी की.
यह भी ख़ूब रही !!!
असम पुलिस की दिल्लगी की
यह अदा भी लाजवाब रही.
इस “खोया पाया” ख़बर को पाकर
अपराधी ‘कभी खुशी कभी ग़म’
मना रहे होंगे, या बिलों में छुपे होंगे?
इस इनोवेटिव , मज़ेदार विचार के लिए
असम पुलिस को सलाम !!!!

इन आँसुओं से एक बात पूछनी है।
इतना नमक कहाँ से ढूँढ लाते हो?
कहाँ से बार बार चले आते हो?
रुक क्यों नहीं जाते ?
बातें क्यों नहीं सुनते ?
जब देखो आँखें धुँधली कर जाते हो।

मातृत्व के मर्मांतक और
असहनीय कष्ट को
रात्रि के नीरवता में
अकेले सहना क्या सरल है?
उस माँ के साहस और
हौसले को सलाम है।
क्या हम पाषाण युग में रहते हैं?
या लोगों के दिल पाषाण …
पत्थर …. के हो चुके हैं?
इंसान की फ़ितरत होती है ,
मधुर यादों और
सुहानी कल्पनाओं में जीने की.
अपने अतीत की यादों
और भविष्य की संभावनाओं में
अपने को सीमित न करें .

In April 2018, the United Nations General Assembly declared 3 June as International World Bicycle Day. The resolution for World Bicycle Day recognizes “the uniqueness, longevity and versatility of the bicycle, which has been in use for two centuries, and that it is a simple, affordable, reliable, clean and environmentally fit sustainable means of transportation.
साईकिल- एक नई पहल
एक अच्छी शुरुआत .
स्वास्थ्य की समझदारी से
अब बच्चों की सवारी ने
हमारे देश में भी रंग जमा लिया.

अपनी मौत से तो अब भी डर नहीं लगता .
पर अपनों को खोने की बात से भी डर लगता है.


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