अप्रैल फूल – कहानी.

मँजुल और बीनू बड़ी अच्छी  साखियाँ थी. मँजुल की शादी पैसेवाले घर में हुई. तत्काल उसने बीनू की दोस्ती अपने देवर कुमार से करवा दी. पहली होली मनाने  मँजुल पति  और देवर के साथ मैके पहुँची. रंग और भंग के नशे में डूबे बीनू और कुमार को मँजुल ने  अपने कमरे में एकांत भी उपलब्ध करा दिया.

अगले वर्ष कुमार के बैंक  पीओ बनने के साथ मँजुल को एक ख़बर बीनू ने भी दिया  – वह कुमार के बच्चे की कुंवारी माँ बनने वाली है और कुमार ने उसे शादी का आश्वासन दिया है.काफी सोंचा विचार कर  बीनू को मँजुला ने आश्वाशन दिया , घबराने की बात नहीँ है. बस, वह  अपनी  माँ बनने की ख़बर गुप्त रखे.  तकि वह अपने  रूढिवादी  ससुराल वालों को राजी कर सके. एक दिन शाम के समय मँजुल मिठाई के डब्बे के साथ बीनू के पास पहुँची.

छत पर, बीनू के  एकांत कमरे  में मँजुल ने हमेशा की तरह अपनी शादीशुदा खुशनुमा जीवन के रंगीन किस्से सुनायें. साथ ही उसे एक खुशखबरी दी. जल्दी ही कुमार उसके घरवालो से उनके शादी की बात करने आने वाला है.

मँजुल आनेवाले एक अप्रैल को अपने पति को अप्रैल फूल बनाने की योजना बना रही थी. दोनो हँसती -खिलखिलाती सखियों ने तय किया, मँजुल अपने पति को अपने  आत्महत्या की झूठी  चिठ्ठी  भेजेगी और जब  वह डर कर  भागता- दौड़ता आयेगा तब उसका चेहरा देखने में बड़ा मज़ा आयेगा.

मँजुल ने बीनू को चट कलम पकड़ा दिया. बीनू ने दो पंक्तियों में आत्महत्या की धमकी लिख दी. चिट्ठी पूरी होती मँजुल ने उसकी प्रतिलिपि अपने लिखावट में  बनाई और नीचे अपना नाम लिख दिया.  तभी ,मँजुल को मिठाई के डब्बे की याद आई. उसने डब्बे से लड्डू निकाल बीनू के मुँह में दो -तीन लड्डू ठूँस दिये और दोनो साखियाँ जेठानी – देवरानी बनने के सपने सजाने लगीं.

थोड़ी देर  में  मँजुल जाने के लिये उठ खड़ी हुई  और बोल पड़ी – ” मेरा नकारा पति अपने पिता के काले पैसों पर जीता है  और तुम  पीओ की पत्नी बनोगी ? मुझे तुम्हारी  अच्छाईयाँ हमेशा चुभती थी. जान बुझ कर  मैंने   कुमार से तुम्हारी दोस्ती करवाई थी. उसे तुममें कोई दिलचस्पी नहीँ है. वह तो हमेशा से ढीले चरित्र का है.”

तभी बीनू अपना पेट पकड़ कर छटपटा कर अर्ध बेहोशी में ज़मीन पर गिर पड़ी. मँजुल ने  कुटिल हँसी के साथ कहा – “ओह … लड्डूओं वे अपना काम कर दिया ?” बचे लड्डुओ के डब्बे को बैग में रख , बीनू की  लिखावट में लिखी आत्महत्या की  चिठ्ठी  टेबल पर  पेपर वेट से दबा वह  चुपचाप निकल गई.

आशु की जादुई घड़ी ( बाल मनोविज्ञान और बॉडी क्लॉक पर आधारित कहानी ) #ChildrensDay

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(यह कहानी बच्चों को बॉडी क्लॉक और इच्छा शक्ति के बारे में जानकारी देती है। यह कहानीबच्चों के साथ-साथ बड़ों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह कहानी बतलाती है कि, बाल मनोविज्ञान को समझते हुए मनोवैज्ञानिक तरीके से बच्चों को अच्छी बातें सरलता से सिखलायी जा सकती हैं। सही तरीके और छोटी-छोटी प्रेरणाओं की सहायता से बच्चों को समझाना बहुत आसान होता है। यह कहानी इन्ही बातों पर आधारित है। बाल दिवस – १४ नवंबर, के अवसर पर ।)

नन्हा आशु थोड़ी देर पहले ही जागा था। वह कमरे से बाहर आया, तभी उसने दादी को बाहर से आते देखा। दादी ने मुस्कुराते हुए कहा- “अरे, तू जाग गया है?” आशु ने पूछा- दादी तुम सुबह-सुबह कहाँ गई थी? दादी ने कहा- “मैं रोज़ सुबह मंदिर जाती हूँ बेटा। ये ले प्रसाद।” दादी ने उसके हथेली पर बताशे और मिश्री रख दिये। आशु को बताशे चूसने में बड़ा मज़ा आ रहा था। यह तो नए तरह की टाफ़ी है। उसने मन ही मन सोंचा।

उसके मन में ख्याल आया कि अगर वह दादी के साथ मंदिर जाए, तब उसे और बताशे-मिश्री खाने के लिए मिलेंगे। कुछ सोचते हुए उसने दादी से पूछा – ‘दादी, मुझे भी मंदिर ले चलोगी क्या?” दादी ने उसे गौर से देखते हुए कहा –“तुम सुबह तैयार हो जाओगे तो जरूर ले चलूँगी।‘ दादी पूजा की थाली लिए पूजा-घर की ओर बढ़ गईं। “दादी मेरी नींद सुबह कैसे खुलेगी? बताओ ना”- आशु ने दादी की साड़ी का पल्ला खींचते हुए पूछा। तुम रोज़ सुबह कैसे जाग जाती हो?

दादी ने हँस कर पूछा-“और बताशे-मिश्री चाहिए क्या?” आशु ने सिर हाँ में हिलाया। दादी ने उसके मुँह में बताशे डाल कर कहा – ‘मेरे तकिये में जादुई घड़ी है बेटा। वही मुझे सुबह-सुबह जगा देती है। अगर तुम्हें सुबह जागना है। तब रात में मुझ से वह तकिया ले लेना। सोते समय सच्चे मन से तकिये को अपने जागने का समय बता कर सोना। वह तुम्हें जरूर जगा देगा। लेकिन एक बात का ध्यान रखना। रात में देर तक मत जागना। क्यों दादी?– आशु ने पूछा। दादी ने जवाब दिया – “वह इसलिए ताकि तुम्हारी नींद पूरी हो सके। वरना तकिये के जगाने के बाद भी तुम्हें बिस्तर से निकलने का मन नहीं करेगा।“

आशु मम्मी-पापा के साथ दादा-दादी के पास आया था। उसके स्कूल की छुट्टियाँ चल रही थी। वह दादी के जादुई तकिये की बात से बड़ा खुश था क्योंकि उसे रोज़ सुबह स्कूल के लिए जागने में देर हो जाती थी। जल्दीबाजी में तैयार होना पड़ता। मम्मी से डांट भी पड़ती। कभी-कभी स्कूल की बस भी छूट जाती थी।

रात में वह दादी के पास पहुँचा। बड़े ध्यान से उनके बिस्तर पर रखे हुए तकियों को देख कर सोंच रहा था – इनमें से कौन सा तकिया जादुई है? देखने में तो सब एक जैसे लग रहे हैं। तभी मम्मी ने पीछे से आ कर पूछा – ‘तुम यहाँ क्या कर रहे हो आशु? तुम्हारा प्रिय कार्टून कार्यक्रम टीवी पर आ रहा है।“ आशु ने जवाब दिया – “नहीं मम्मी, मैं आज देर रात तक टीवी नहीं देखूंगा। आज मुझे समय पर सोना है।“ मम्मी हैरानी से उसे देखती हुई बाहर चली गईं।

आशु ने दादी की ओर देखा। दादी ने एक छोटा तकिया उसकी ओर बढ़ाया और पूछा – “तुमने खाना खा लिया है ना?” आशु ने खुशी से तकिये को बाँहों में पकड़ लिया और चहकते हुए कहा –“हाँ दादी। मैंने खाना खा कर ब्रश भी कर लिया है दादी।“ वह अपने कमरे में सोने चला गया। वह तकिये को बड़े प्यार से सवेरे जल्दी जगाने कह कर सो गया।

अगले दिन सचमुच वह सवेरे-सवेरे जाग कर दादी के पास पहुँच गया। दोनों तैयार हो कर मंदिर चले गए। मंदिर में एक बड़ा बरगद का पेड़ था। बरगद के लंबी-लंबी जटाएँ जमीन तक लटकी हुईं थीं। पेड़ पर ढेरो चिड़ियाँ चहचहा रहीं थी। बगल में गंगा नदी बहती थी। आशु को यह सब देखने मे बड़ा मज़ा आ रहा था। दादी नदी से लोटे में जल भरने सीढ़ियों से नीचे उतर गईं। आशु बरगद की जटाओं को पकड़ कर झूला झूलने लगा। दादी लोटे में जल ले कर मंदिर की ओर बढ़ गईं। आशु दौड़ कर दादी के पास पहुँच कर पूछा – ‘दादी तुम मेरे लिए जल नहीं लाई क्या?” दादी मुस्कुरा पड़ी। उन्होंने पूजा की डलिया से एक छोटा जल भरा लोटा निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दिया। वह दादी का अनुसरण करने लगा। पूजा के बाद दादी ने उसे ढेर सारे बताशे और मिश्री दिये।

आशु दादी के साथ रोज़ मंदिर जाने लगा। जादुई तकिया रोज़ उसे समय पर जगा देता था। दरअसल आशु को सवेरे का लाल सूरज, ठंडी हवा, पेड़, पंछी, नदी, प्रसाद और मंदिर की घंटिया सब बड़े लुभावने लगने लगे थे। आज मंदिर जाते समय दादी ने गौर किया कि आशु कुछ अनमना है। उन्हों ने आशु से पूछा – आज किस सोंच मे डूबे हो बेटा?” आशु दादी की ओर देखते हुए बोल पड़ा – “दादी, अब तो मेरी छुट्टियाँ समाप्त हो रही है। घर जा कर मैं कैसे सुबह जल्दी जागूँगा? मेरे पास तो जादुई तकिया नहीं है।‘

दादी उसका हाथ पकड़ कर नदी की सीढ़ियों पर बैठ गईं। दादी प्यार से उसके बालों पर हाथ फेरते हुए कहने लगी – “आशु, मेरा तकिया जादुई नहीं है बेटा। यह काम रोज़ तकिया नहीं बल्कि तुम्हारा मन या दिमाग करता है। जब तुम सच्चे मन से कोशिश करते हो , तब तुम्हारा प्रयास सफल होता है। यह तुम्हारे मजबूत इच्छा शक्ति का कमाल है। जब हम मन में कुछ करने का ठान लेते है, तब हमारी मानसिक शक्तियाँ उसे पूरा करने में मदद करती हैं। हाँ आशु, एक और खास बात तुम्हें बताती हूँ। दरअसल हमारा शरीर अपनी एक घड़ी के सहारे चलता है। जिससे हम नियत समय पर सोते-जागते है। हमें नियत समय पर भोजन की जरूरत महसूस होती है। जिसे हम मन की घड़ी या बॉडी क्लॉक कह सकते हैं। यह घड़ी प्रकृतिक रूप से मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों सभी में मौजूद रहता है। इसे अभ्यास द्वारा हम मजबूत बना सकतें हैं।“

आशु हैरानी से दादी की बातें सुन रहा था। उसने दादी से पूछा –“ इसका मतलब है दादी कि मुझे तुम्हारा तकिया नहीं बल्कि मेरा मन सवेर जागने में मदद कर रहा था? मैं अपनी इच्छा शक्ति से बॉडी क्लॉक को नियंत्रित कर सवेरे जागने लगा हूँ?” दादी ने हाँ मे माथा हिलाया और कहा – “आज रात तुम अपने मन में सवेरे जागने का निश्चय करके सोना। ताकिया की मदद मत लेना। रात में सोते समय आशु नें वैसा ही किया, जैसा दादी ने कहा था। सचमुच सवेरे वह सही समय पर जाग गया। आज आशु बहुत खुश था। उसने अपने मन के जादुई घड़ी को पहचान लिया था।

आशु की जादुई घड़ी ( बाल मनोविज्ञान और बॉडी क्लॉक पर आधारित कहानी ) #ChildrensDay

(यह कहानी बच्चों को बॉडी क्लॉक और इच्छा शक्ति के बारे में जानकारी देती है। यह कहानीबच्चों के साथ-साथ बड़ों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि  यह कहानी बतलाती है कि, बाल मनोविज्ञान को समझते हुए मनोवैज्ञानिक तरीके से बच्चों को अच्छी बातें सरलता से सिखलायी जा सकती हैं। सही तरीके और छोटी-छोटी प्रेरणाओं की सहायता से बच्चों को समझाना बहुत आसान होता है। यह कहानी इन्ही बातों पर आधारित है। बाल दिवस – १४  नवंबर, के अवसर पर ।)

नन्हा आशु थोड़ी देर पहले ही जागा था। वह कमरे से बाहर आया, तभी उसने दादी को बाहर से आते देखा। दादी ने मुस्कुराते हुए कहा- “अरे, तू जाग गया है?” आशु ने पूछा- दादी तुम सुबह-सुबह कहाँ गई थी? दादी ने कहा- “मैं रोज़ सुबह मंदिर जाती हूँ बेटा। ये ले प्रसाद।” दादी ने उसके हथेली पर बताशे और मिश्री रख दिये। आशु को बताशे चूसने में बड़ा मज़ा आ रहा था। यह तो नए तरह की टाफ़ी है। उसने मन ही मन सोंचा।

उसके मन में ख्याल आया कि अगर वह दादी के साथ मंदिर जाए, तब उसे और बताशे-मिश्री खाने के लिए मिलेंगे। कुछ सोचते हुए उसने दादी से पूछा – ‘दादी, मुझे भी मंदिर ले चलोगी क्या?” दादी ने उसे गौर से देखते हुए कहा –“तुम सुबह तैयार हो जाओगे तो जरूर ले चलूँगी।‘ दादी पूजा की थाली लिए पूजा-घर की ओर बढ़ गईं। “दादी मेरी नींद सुबह कैसे खुलेगी? बताओ ना”- आशु ने दादी की साड़ी का पल्ला खींचते हुए पूछा। तुम रोज़ सुबह कैसे जाग जाती हो?

दादी ने हँस कर पूछा-“और बताशे-मिश्री चाहिए क्या?” आशु ने सिर हाँ में हिलाया। दादी ने उसके मुँह में बताशे डाल कर कहा – ‘मेरे तकिये में जादुई घड़ी है बेटा। वही मुझे सुबह-सुबह जगा देती है। अगर तुम्हें सुबह जागना है। तब रात में मुझ से वह तकिया ले लेना। सोते समय सच्चे मन से तकिये को अपने जागने का समय बता कर सोना। वह तुम्हें जरूर जगा देगा। लेकिन एक बात का ध्यान रखना। रात में देर तक मत जागना। क्यों दादी?– आशु ने पूछा। दादी ने जवाब दिया – “वह इसलिए ताकि तुम्हारी नींद पूरी हो सके। वरना तकिये के जगाने के बाद भी तुम्हें बिस्तर से निकलने का मन नहीं करेगा।“

आशु मम्मी-पापा के साथ दादा-दादी के पास आया था। उसके स्कूल की छुट्टियाँ चल रही थी। वह दादी के जादुई तकिये की बात से बड़ा खुश था क्योंकि उसे रोज़ सुबह स्कूल के लिए जागने में देर हो जाती थी। जल्दीबाजी में तैयार होना पड़ता। मम्मी से डांट भी पड़ती। कभी-कभी स्कूल की बस भी छूट जाती थी।

रात में वह दादी के पास पहुँचा। बड़े ध्यान से उनके बिस्तर पर रखे हुए तकियों को देख कर सोंच रहा था – इनमें से कौन सा तकिया जादुई है? देखने में तो सब एक जैसे लग रहे हैं। तभी मम्मी ने पीछे से आ कर पूछा – ‘तुम यहाँ क्या कर रहे हो आशु? तुम्हारा प्रिय कार्टून कार्यक्रम टीवी पर आ रहा है।“ आशु ने जवाब दिया – “नहीं मम्मी, मैं आज देर रात तक टीवी नहीं देखूंगा। आज मुझे समय पर सोना है।“ मम्मी हैरानी से उसे देखती हुई बाहर चली गईं।

आशु ने दादी की ओर देखा। दादी ने एक छोटा तकिया उसकी ओर बढ़ाया और पूछा – “तुमने खाना खा लिया है ना?” आशु ने खुशी से तकिये को बाँहों में पकड़ लिया और चहकते हुए कहा –“हाँ दादी। मैंने खाना खा कर ब्रश भी कर लिया है दादी।“ वह अपने कमरे में सोने चला गया। वह तकिये को बड़े प्यार से सवेरे जल्दी जगाने कह कर सो गया।

अगले दिन सचमुच वह सवेरे-सवेरे जाग कर दादी के पास पहुँच गया। दोनों तैयार हो कर मंदिर चले गए। मंदिर में एक बड़ा बरगद का पेड़ था। बरगद के लंबी-लंबी जटाएँ जमीन तक लटकी हुईं थीं। पेड़ पर ढेरो चिड़ियाँ चहचहा रहीं थी। बगल में गंगा नदी बहती थी। आशु को यह सब देखने मे बड़ा मज़ा आ रहा था। दादी नदी से लोटे में जल भरने सीढ़ियों से नीचे उतर गईं। आशु बरगद की जटाओं को पकड़ कर झूला झूलने लगा। दादी लोटे में जल ले कर मंदिर की ओर बढ़ गईं। आशु दौड़ कर दादी के पास पहुँच कर पूछा – ‘दादी तुम मेरे लिए जल नहीं लाई क्या?” दादी मुस्कुरा पड़ी। उन्होंने पूजा की डलिया से एक छोटा जल भरा लोटा निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दिया। वह दादी का अनुसरण करने लगा। पूजा के बाद दादी ने उसे ढेर सारे बताशे और मिश्री दिये।

आशु दादी के साथ रोज़ मंदिर जाने लगा। जादुई तकिया रोज़ उसे समय पर जगा देता था। दरअसल आशु को सवेरे का लाल सूरज, ठंडी हवा, पेड़, पंछी, नदी, प्रसाद और मंदिर की घंटिया सब बड़े लुभावने लगने लगे थे। आज मंदिर जाते समय दादी ने गौर किया कि आशु कुछ अनमना है। उन्हों ने आशु से पूछा – आज किस सोंच मे डूबे हो बेटा?” आशु दादी की ओर देखते हुए बोल पड़ा – “दादी, अब तो मेरी छुट्टियाँ समाप्त हो रही है। घर जा कर मैं कैसे सुबह जल्दी जागूँगा? मेरे पास तो जादुई तकिया नहीं है।‘

दादी उसका हाथ पकड़ कर नदी की सीढ़ियों पर बैठ गईं। दादी प्यार से उसके बालों पर हाथ फेरते हुए कहने लगी – “आशु, मेरा तकिया जादुई नहीं है बेटा। यह काम रोज़ तकिया नहीं बल्कि तुम्हारा मन या दिमाग करता है। जब तुम सच्चे मन से कोशिश करते हो , तब तुम्हारा प्रयास सफल होता है। यह तुम्हारे मजबूत इच्छा शक्ति का कमाल है। जब हम मन में कुछ करने का ठान लेते है, तब हमारी मानसिक शक्तियाँ उसे पूरा करने में मदद करती हैं। हाँ आशु, एक और खास बात तुम्हें बताती हूँ। दरअसल हमारा शरीर अपनी एक घड़ी के सहारे चलता है। जिससे हम नियत समय पर सोते-जागते है। हमें नियत समय पर भोजन की जरूरत महसूस होती है। जिसे हम मन की घड़ी या बॉडी क्लॉक कह सकते हैं। यह घड़ी प्रकृतिक रूप से मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों सभी में मौजूद रहता है। इसे अभ्यास द्वारा हम मजबूत बना सकतें हैं।“

आशु हैरानी से दादी की बातें सुन रहा था। उसने दादी से पूछा –“ इसका मतलब है दादी कि मुझे तुम्हारा तकिया नहीं बल्कि मेरा मन सवेर जागने में मदद कर रहा था? मैं अपनी इच्छा शक्ति से बॉडी क्लॉक को नियंत्रित कर सवेरे जागने लगा हूँ?” दादी ने हाँ मे माथा हिलाया और कहा – “आज रात तुम अपने मन में सवेरे जागने का निश्चय करके सोना। ताकिया की मदद मत लेना। रात में सोते समय आशु नें वैसा ही किया, जैसा दादी ने कहा था। सचमुच सवेरे वह सही समय पर जाग गया। आज आशु बहुत खुश था। उसने अपने मन के जादुई घड़ी को पहचान लिया था।

 

 

 

Source: आशु की जादुई घड़ी ( बाल मनोविज्ञान और बॉडी क्लॉक पर आधारित कहानी )

 शरद पूर्णिमा 15.10.2016

 

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आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं।  इस साल शरद पूर्णिमा 15 अक्टूबर को है। यह शरद ऋतु या जाडे के मौसम के आगमन  का   सूचक हैं.

मान्यता –

माना जाता हैं  इस रात चंद्रमा से अमृत बरसता हैं और चंद्रमा की किरणें विशेष गुणों से भरी  रहती हैं. अत  शरद पूर्णिमा की रात कई  लोग घरों की छतों पर खीर रखते हैं. अगले दिन इस खीर को  आरोग्य वर्धक प्रसाद  के रुप में खाया  जाता है।

यह भी किंवदन्ति  हैं भगवान श्रीकृष्ण ने शरद पूर्णिमा की रात रास रचाया था .एक  मान्यता के अनुसार इस रात  लक्ष्मी जी रात्रि भ्रमण के लिये निकलती हैं.

इन सब मान्चयताओं    की वजह से इस  रात कुछ  समय चाँद  को देखना और चाँदनी में समय बिताना अच्छा माना जता हैं.|

हर लम्हा लाता है, नई उम्मीद ( कहानी) #YaaronKiBaraat #यारोंकीबारात

           बात कुछ पुरानी है। मैं, बेटी की शादी  के सिलसिले में लखनऊ गई हुई थी। सुबह का समय था। मौसम थोङा सर्द था। गुलाबी जाङा खुशगवार लग रहा था। हम सब लङके वालों से मिल कर बातें कर हीं रहे थे। तभी, मेरे पति को उनके आफिस से फोन आया। उन्हों  ने बताया, उन्हें तुरंत किसी  जरुरी काम के सिलसिले में दिल्ली जाना होगा। जबकी मेरा अौर मेरे पति का पटना लौटने का रात, लगभग 11 बजे के ट्रेन का टिकट कटा  हुआ था।

          तब, हमारी बेटी पुणे में नौकरी कर रही थी। उसे भी रात  7:45  की ट्रेन पुष्पक एक्सप्रेस से  लखनऊ से मुंम्बई अौर फिर वँहा से पुणे जाना था। हम सब थोङा चिंतित हो गये क्योंकि, नई जगह पर रात के समय हमें अपने-आप ट्रेनें पकङनी थीं। पर हमारे पास कोई हल नहीं था।

               मेरे पति तत्काल दिल्ली निकल गये। मुझे लखनऊ चिकेनकारी के कपङे खरीदने की बङी ललक थी, अौर मेरी बिटीया को रिक्शे में बैठ लखनऊ घुमने की तमन्ना थी। हम दोनों ने सोंचा, रिक्शे में हजरत गंज चलते हैं। एक पंथ दो काज हो जायेगा। हमारे पास समय भी था। वहाँ घुमते हुए मुझे नीवा याद आने लगी। वह लखनऊ में हीं रहती थी। पहले फोन पर हम हमेशा बातें करतें थे।   हम दोनों में दाँत काटी  दोस्ती  थी।  साथ बैठ कर चित्रकारी करना, किताबें पढ़ना, बोनसाई पौधे लगाना हमारा शगल था। वह हमेशा कुछ नया करने की कोशिश में रहती, अौर मैं उसकी राजदार होती थी।  रेलवे में पदाधिकारी  बन हम सहेलियों के बीच उसने एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया था। वह प्रकाश पादुकोन की बहुत बङी प्रशंसक थी।

         1980 में, जब पादुकोन ङॉनिश व स्विङिश अोपेन को जीतने वाले एकल बैङमिंटन  के पहले भारतीय खिलाङी  बने, तब वह खुशी के मारे  वे सारी पत्रिकायें ले कर भागती हुई  मेरे पास पहुचीं थी, जिनमें यह समाचार अौर तस्वीरें छपी थीं। उस साल यानि 1980 में  अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा अौर  जीनत अमान  की फिल्म दोस्ताना हम दोनों ने अपनी दोस्ती के नाम करते हुए साथ-साथ देखा था। यह फिल्म भी विजय (अमिताभ बच्चन) और रवि (शत्रुघ्न सिन्हा) की  दोस्ती पर आधारित थी। उसके बाद हम दोनों की शादी हो गई।  काफी समय तक हम फोन से एक दूसरे  से जुङे रहे। फिर ना जाने क्यों उसने अचानक  फोन उठाना अौर बातें करना बंद कर दिया। मन में थोङा आक्रोश हुआ। मुझे लगने लगा शायद वह बदल गई है। अब  ना जाने लखनऊ में कहाँ रहती होगी?  

**

मैं अौर मेरी बेटी   दोनों रिक्शे पर हजरत गंज पहुँचे। मन खुश हो गया, हजरत गंज की रौनक अौर खुबसूरती देख कर। खरीदारी करते-करते जब, अचानक घङी पर नज़र पङी। तब, देखा देर हो रही थी। हम दोनों घबरा गये। जल्दी- जल्दी वापस लौटे। सामान समेट कर भागते हुए स्टेशन के लिये निकल पङे।

                  पर वहाँ की सङकों के भीङ में उलझ गये। आपाधापी में स्टेशन पहुँचने पर देखा ट्रेन खुलने हीं वाली है। खैर ! बेटी को विदा कर मैं अपनी ट्रेन पकङने दूसरे स्टेशन की अोर रवाना हुई। दोनों स्टेशन पास-पास हीं थे। एक हाथ में सामान अौर दूसरे कंधे पर बैग ले कर ढ़ेरों सीढ़ियाँ चढ़ती-उतरती, ढ़ूँढ़ती-ढ़ूँढ़ती अपने गंतव्य प्लेटफार्म पर पहुँची। रात, लगभग 10:30 बजे उदघोषणा हुई। 10:45 की लखनऊ एल टी टी एक्सप्रेस एक घंटे विलंब से आयेगी। 
 

                उस रात, मैं अकेले प्लेटफार्म पर घबराने लगी। रात में ठंड बढ गई थी। हलका -हलका कोहरा चारो अोर पसर गया था। प्लेटफार्म भी सुनसान हो चला था। बहुत से लोग रात में अकेली महिला देख अजीब नजरों से घुरते हुए गुजर जाते। मैं शाॅल से अपने चेहरे को अौर अपने आप को ढंकने का असफल प्रयास करने लगी। घङी की गति जैसे धीमी हो गई थी। मानो समय आगे बढना भूल गया था। तभी मुझे याद आया, मैंने हङबङी में अपने खाने का ङब्बा बेटी के हाथों में पकङा दिया था अौर वापस लेना भूल गई थी। मुझे नींद, भूख,ठंड अौर भय ने घेर लिया। जब ट्रेन के आने की उदघोषणा हुई। तब मेरी जान में जान आई।

              तब लखनऊ मेरे लिये नई जगह थी। बाद में वहाँ काफी साल रहने का मौका मिला। यह नवाबों का बसाया एक खुबसूरत शहर है। जहाँ गोमती नदी लगभग शहर के बीच से बहती, कई जगहों पर मिल जाती है। लोग दोस्ताना हैं। अनेकों दर्शनिय पर्यटन स्थल हैं।

**

        मैं सामान ले कर ट्रेन की अोर बढ रही थी, तभी कोई झटके से मेरा बैग छीन अंधेरे में खो गया। मैं अवाक रह गई। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था, किस से मदद मागूँ? अब क्या करुँ? मेरे टिकट अौर पैसे उस बैग में हीं थे। ट्रेन भी खुलनेवाली थी। मैं रुआसीँ खङी रह गई। बिना टिकट ट्रेन  में चढना चाहिये या नहीं? अगर ट्रेन छोङ देती हूँ, तब कहाँ रहूँगी इस अनजान शहर में ? पैसे भी नहीं हैं।

               तभी, पीछे से किसी ने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, – “मैं तो तुम्हें पीछे से देख कर हीं पहचान गई। तुम्हारी लंबी-मोटी चोटी आज भी वैसी हीं है। ” मैं हैरान थी। ऐसे मुसीबत की घङी में कौन है जो बिना मेरा चेहरा देखे मुझे पहचान गई? घुम कर देखा। कुछ पल लग गये पहचानने में। गुजरे समय ने हम दोनों को थोङा बदल दिया था। मेरे सामने  नीवा खङी थी। मेरी आपबीती सुन कर उसने मुझे हिम्मत बंधाई, हौसला दिया। उसका अपनापन  देख मैं उससे लिपट गई। उस पल मुझे एहसास हुआ – हर लम्हा लाता है, नई उम्मीद । 

     वह भी उसी ट्रेन में सफर करने वाली थी। उसने मुझे अपने साथ ट्रेन में बैठाया। ट्रेन खुल गई, तब उसने खाना निकाल कर खिलाया। परंतु, बिना टिकट अौर बिना पैसे मैं बेचैन थी। तब उसने मेरे बैग छिनतई की शिकायत दर्ज कराई।  नीवा के प्रति मेरे  पुराने आक्रोश ने भी मुझे अनमना कर रखा था।  उसने बताया  उसका  मोबाईल  खो जाने अौर फिर उसका फोन नंबर बदल जाने की वजह से वह मुझसे बातें नहीं कर पा रही थी। फोन के साथ  सारे फोन नंबर भी खो गये थे।

मैं बैग खोने की तकलिफ भूल  दोस्त  को वापस पाने की खुशी से अह्लादित थी। मेरे सारे गिले – शिकवे आँसुअों  में बह गये। वह रात हमनें दोस्ती के नाम कर दिया। पूरी रात, रास्ते भर हम दोनों गुजरे जमाने की कहानियों को याद करते रहे। अपनी-अपनी कहानी सुनाते अौर सुनते रहे।  साथ हीं  मैं  ये पंक्तियाँ गुनगुना रही थी –

जी करता है ये पल रोक लूं ,

दोस्तों के साथ बिताने को ।

दोस्त ही तो होते हैं असली दौलत,

        यूँ तो पूरी ज़िन्दगी पड़ी है कमाने को ।      

#@ZeeTV #YaaronKiBaraat.
http://www.ozee.com/shows/yaaron-ki-baraat.

इंडोनेशिया पितृपूजा – एक विचित्र प्रथा

 

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पूर्वजों की उपासना के लिये पितृपक्ष, श्राद्ध  की परंपरा या पितृपूजा किसी न किसी रूप में प्राय हर जगह होती  है। हमारे यहाँ नव रात्री के पहले के १५ दिन पितृपक्ष कहलाता है। इस समय लोग अपने गुजरे स्वजनों को सम्मान देते हुए पितर या पितृपूजन करते हैं।

  इंडोनेशिया के  तोजारान लोगपितृपूजा को एक  महोत्सव के  रूप में मनाते हैं। वे हर तीन साल के बाद कब्र से अपने मृत रिश्तेदारों के शव को घर लाते हैं।  उनकी लाशों को साफ कर  नये कपड़े पहनाते हैं। वे परिजनों को हमेशा अपने बीच बनाये रखना चाहते है। यह वहाँ की प्राचीन पर विचित्र  परंपरा है।

 

 

शुभ नवरात्री – शक्ति उपासना

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देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् |
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ||

मां दुर्गा जीवन में आरोग्य और सौभाग्य  प्रदान करो।

God is watching us! Part-2

whenever you are sad……

Shekhar Srivastava's avatarTravelling Krishnaite

Whenever you’re sad remember someone’s watching you who laughs when you laugh smiles when you smile and feels devastated when you feel sad and what to say about his mental condition when you are depressed. Remember he loves you so much that he keeps an eye on you even when you are asleep. I know he does all these things. He is God. You may call him by different names as per your ideology and religion.

When he created us all with nature and all other creatures; he had done so so that we can enjoy it all with each other. It was all like a game, he made us forget him; that he only had sent us all, that he had played a game that we have to find him without knowing that he only had sent us. It was the task of game that we should find him…

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Keep calm & be highest… — Tanay Soni

Keep your head high & your spirit even higher!! #Thethoughtoftheday, #Theclam, #Thekeep, #Thehigh, #Thehead, #Thespirit,

via Keep calm & be highest… — Tanay Soni

आज की द्रौपदी (कहानी )

baby
वह हमारे घर के पीछे रहती थी। वहाँ पर कुछ कच्ची झोपङियाँ थीं। वह वहीं रहती थी। कुछ घरों में काम करती थी। दूध भी बेचती थी। लंबी ,पतली, श्यामल रंग, तीखे नयन नक्श अौर थोङी उम्र दराज़। उसका सौंदर्यपुर्ण, सलोना अौर नमकीन चेहरा था। उसकी बस्ती में जरुर उसे सब रुपवती मानते होंगे।

जब भी मैं उधर से गुजरती । वह मीठी सी मुसकान बिखेरती मिल जाती। उसकी मुसकान में कुछ खास बात थी। मोनालिसा की तरह कुछ रहस्यमयी , उदास, दर्द भरी हलकी सी हँसी हमेशा उसके होठों पर रहती। एक बार उसे खिलखिला कर हँसते देखा तब लगा मोनालिसा की मुसकान मेरे लेखक मन की कल्पना है।

एक दिन उसकी झोपङी के सामने से गुजर रही थी। वह बाहर हीं खङी थी। मुझे देखते हँस पङी अौर मजाक से बोल पङी – मेरे घर आ रही हो क्या? मैं उसका मन रखने के लिये उसके झोपङी के द्वार पर खङे-खङे उससे बातें करने लगी। उसका घर बेहद साफ-सुथरा, आईने की तरह चमक रहा था। मिट्टी की झोपङी इतनी साफ अौर व्यवस्थित देख मैं हैरान थी।

एक दिन, सुबह के समय वह अचानक अपने पति के साथ हमारे घर पहुँच गई। दोनों के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें थीं। पति के अधपके बाल बिखरे थे। उसके कपङे मैले-कुचैले थे। शायद उम्र में उससे कुछ ज्यादा हीं बङा था। पर वह बिलकुल साफ-सुथरी थी। तेल लगे काले बाल सलिके से बंधे थे। बहुत रोकने पर भी दोनों सामने ज़मीन पर बैठ गये।

पता चला, उनका बैंक पासबुक पति से कहीं खो गया था। वह बङी परेशान सी मुझ से पूछ बैठी -“ अब क्या होगा? पैसे मिलेंगे या नहीं ?” दोनों भयभीत थे। उन्हें लग रहा था, अब बैंक से पैसे नहीं मिलेगें। वह पति से नाराज़ थी। उसकी अोर इंगित कर बोलने लगी – “देखो ना, बूढे ने ना जाने “बेंक का किताब” कहाँ गिरा दिया है।” जब उसे समझ आया । पैसे अौर पासबुक दोनों बैंक जा कर बात करने से मिल जायेंगें, तब उसके चेहरे पर वही पुरानी , चिरपरिचित मोनालिसा सी मुसकान खेलने लगी।

उस दिन मैं उसके घर के सामने से गुजर रही थी। पर उसका कहीं पता नहीं था। मेरे मन में ख्याल आया, शायद काम पर गई होगी। तभी वह सामने एक पेंङ के नीचे दिखी। उसने नज़रें ऊपर की। उसकी हमेशा हँसती आखोँ में आसूँ भरे थे। मैं ने हङबङा कर पूछा – “ क्या हुआ? रो क्यों रही हो?”

***

उसका बाल विवाह हुआ था। कम वयस में दो बच्चे भी हो गये। वह पति अौर परिवार के साथ सुखी थी। उसके रुप, गुण अौर व्यवहार की हर जगह चर्चा अौर प्रशंसा होती थी। एक दिन उसका पति उसे जल्दी-जल्दी तैयार करा कर अपने साथ कचहरी ले गया। वहां एक अधेङ व्यक्ति को दिखा कर कहा – अब तुम इसके साथ रहोगी। मैं ने तुम्हें बेच दिया है।“ वह जब रो -रो कर ऐसा ना करने की याचना करने लगी। तब पति ने बताया, यह काम कचहरी में लिखित हुआ है। अब कुछ नहीं हो सकता है।

उसकी कहानी सुन कर , मुझे जैसे बिजली का झटका लगा। मैं अविश्वाश से चकित नेत्रों से उसे देखते हुए बोलने लगी – “ यह तो नाजायज़ है। तुम गाय-बकरी नहीं हो। तुम उसकी जायदाद नहीं । जो दाव पर लगा दे या तुम्हारा सौदा कर दे। उसने तुम से झूठ कहा है। यह सब आज़ के समय के लिये कलकं है।”

       उसने बङी ठंङी आवाज़ में कहा – “ तब मैं कम उम्र की थी। यह सब मालूम नहीं था। जब वह मुझे पैसे के लिये बेच सकता है। तब उसकी बातों का क्या मोल है। अब सब समझती हूँ। यह सब पुरानी बात हो गई।”  मैं अभी भी सदमें से बाहर नहीं आई थी। गुस्से से मेरा रक्त उबल रहा था। आक्रोश से मैं ने उससे पूछ लिया – “ फिर क्यों रो रही हो ऐसे नीच व्यक्ति के लिये।”

उसने सर्द आवाज़ में जवाब दिया – “ आज सुबह लंबी बीमारी के बाद उसकी मृत्यु हो गई। उसके परिवार के लोगों ने खबर किया है । पर तुम्हीं बताअो, क्या मैं विधवा हूँ? मेरा बूढा तो अभी जिंदा है। मैं उसके लिये नहीं रो रहीं हूँ। उसकी मौत की बात से मेरे बूढे ने कहा, अगर मैं चाहूँ, तो विधवा नियम पालन कर सकती हूँ। मैं रो रही हूँ , कि मैं किसके लिये पत्नी धर्म निभाऊँ? मैंने तो दोनों के साथ ईमानदारी से अपना धर्म निभाया है।
उसकी बङी-बङी आँखो में आँसू के साथ प्रश़्न चिंह थे। पर चेहरे पर वही पुरानी मोनालिसा की रहस्यमयी , उदास, दर्द भरी हलकी सी हँसी , जो हमेशा उसके होठों पर रहती थी।

 

 

छायाचित्र  इंद्रजाल से।